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घर आये मेहमान किसी को अच्छे लगते हैं और किसी को नही क्यों कि आये हुए मेहमान कितनी एवं कैसी तकलीफ देंगे यह कहा नही जा सकता। परंतु प्रकृति के, हर वर्ष शीतऋतु में आने वाले, मेहमान, सभी को प्रिय होते हैं। हजारों किलोमीटर की यात्रा कर बिना भूले निश्चित स्थान पर आने वाले ये मेहमान याने सर्दी के मौसम में स्थलांतरित होकर आने वाले पक्षी। प्रत्येक साल शीत ऋुतु में शीतकटीबंध से सैकडों प्रकार के पक्षी हजारों की संख्या में उष्ण कटिबंध के निश्चित स्थानों पर आते हैं। भारत में महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, केरल, उडीसा ऐसे अनेक राज्यों में तालाब, सरोवर, नदी और सागर किनारों पर ये परदेसी मेहमान साधारणत: अक्टूबर महिने से आता प्रारंभ करते हैं।

केवल पक्षी ही उडकर स्थलांतर करते हैं ऐसा नही है। ध्रुवीय गोलार्ध के पेंग्विन सरीखे पक्षी हजारों किलोमीटर का अंतर तैरकर पार करते हैं। हमारे देश में मध्य यूरोप, उत्तर यूरोप, साई बेरिया, तिब्बत, अफ्रिका जैसे दूर दूर के देशों से पक्षी स्थलांतरित होकर आता हैं। मध्य एशिया से भारत में आनेवाला पक्षी पट्ट कांदब अर्थात बार हेडेड गीज यह बत्तख संसार का सबसे उंचा उडने वाला पक्षी माना जाता है कारण स्थलांतर करते समय वह एवरेस्ट शिखर के उपर से उडकर आता है। स्थलांतरित पक्षी जैसे अफ्रिका से आनेवाला पाईड ककू जिसे हम चातक कहते हैं और हिमालय की पर्वत माला लांघ कर आने वाला रूडी शेल डक जिसे हम चक्रवाम कहते हैं, ऐसे कुछ पक्षियों ने हिन्दी साहित्य में भी स्थान पाया है। जब स्थलांतरित पक्षियों का विषय आता है तब राजस्थान के खिचन इस गांव का उल्लेख अपरिहार्य है। कारण इस गांव में हिमॉइझल क्रेन्स याने कुर्जा इस पक्षी के लिये स्थान रिजर्व कर रखा गया है। इस गांव में कुर्जा पक्षियों के खाने के लिये रोज सैकडो किलो अनाडा डाला जाता है, इसके कारण इस गांव में एक ही समय में पंधरा से बीस हजार क्रेन्स पक्षी एक साथ देखे जा सकते हैं।

पक्षियों के स्थलांतरण की गुत्थी अर्भातक पूर्णरूप से सुलझ गई है ऐसा नही कहा जा सकता। प्रत्येक वर्ष नैसर्गिक प्रेरणा से पक्षी स्थलांतर करते हैं और बिना भूले निश्चित स्थान पर पहुंचते हैं। परंतु यह यात्रा वे किस आधार पर करते हैं? आकाश में उड़ते समय उन्हे दिशाज्ञान कैसे होता है? इस विषय में एक अंदाज है कि अधिकतर पक्षी रात्री के समय स्थलांतर करते हैं, इसके कारण आकाश में स्थित ग्रह-नक्षत्रों की मदद से उन्हे दिशाज्ञान होता होगा। वैसे ही पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की मदद से भी उन्हे दिशाज्ञान होता होगा। इस स्थलांतरण की आश्चर्यजनक बात यह है कि भारत में प्रौढ़ पक्षी ही स्थलांतरण कर आते हैं, यहां आने के बाद वे घर बनाते हैं, अंडे देते हैं, बच्चों को जन्म देते हैं और फिर अपना वापसी का प्रवास प्रारंभ करते हैं। आश्चर्यजनक बात यह भी है कि वापसी की यात्रा में नये जन्म लिये बच्चे अपने समूह का नेतृत्व करते हैं जबकि उन्होने यह यात्रा पहले की ही नही होती है। पक्षियों के स्थलांतरण का अभ्यास करने के लिये रिंगरिंग की जाती है अर्थात उनके पैरों में कडी पहनाई जाती है जिसकी सहायता से पक्षियों के स्थलांतरण का मार्ग जाना जा सके।

मुम्बई के समुद्रकिनारे पर आनेवाले गुलाबी फ्लेमिंगों से भरतपूर आनेवाले क्रेन्स तक ये शीतकालीन मेहमान प्रतिवर्ष आपके आसपास आते हैं, उनका स्वागत अवश्य करें।

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