हिंदी विवेक : WE WORK FOR A BETTER WORLD...

अपने भारत वर्ष की पूर्व एवं पश्चिम दिशा में बहुत लंबा समुद्र किनारा है। परंतु इस किनारे के समुद्र में स्थित जीव सृष्टि की ओर हमारा ध्यान बहुत कम है। किनारे के शंख-सीपियों से लेकर समुद्र में पाये जाने वाली मछलियां एवं कछुओं तक समुद्री जीव सृष्टि का फैलाव बहुत विशाल और विविधता लिये हुए है। इसका एक अनोखा घटक याने समुद्री कछुए। समुद्र के रेप्टाइल्स (रेंगने वाले जीव) का प्रतिनिधित्व ये सागरी कछुए करते हैं। विश्व में समुद्री कछुओं की कुल सात प्रजातियां मिलती हैं। उसमे ऑलिव्ह रिडले, ग्रीन टर्टल्स, हॉक्सबिल, लॉगरहेड और लेदरबॅक इस प्रकार पांच प्रजातियां भारतीय किनारपट्टी पर पायी जाती हैं। इसमें ऑलिव्ह रिडले टर्टल्स, ये आकार में सबसे छोटे होते हैं, बडी मात्रा में पाये जाते हैं। अनुमानत: दो फिट तक बढ़नेवाले ये कछुए हरे रंग के होते हैं। इनका जीवनक्रम अनोखा है। इस प्रजाति के कछुए अरब देशों, जापान, दक्षिण अफ्रिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूझीलेंड के समुद्री किनारों पर भी पाये जाते हैं।

भारत के पश्चिम किनारे पर स्थित गुजरात, महाराष्ट्र एवं पूर्व किनारे पर स्थित उडीसा के किनारे के समुद्र तर पर ये ऑलिव्ह रिडले कछुए अंडे देते हैं। अक्टूबर से मार्च यह उनका अंडे देन का समय होता है। उडीसा के गहिरमाथश नामक स्थान पर लाखशें की संख्या में ये कछुए अंडे देने आते हैं। इस सामुदायिक घर बनाने को “अरिबाड़ा” कहते हैं। महाराष्ट्र के कोकण किनारे पर हरिहरेश्वर से लेकर मालवण तक अनेक जगहों पर ये कछुए घर बनाकर अंडे देते हैं। गर्भवती मादी आवश्यकतानुसार हजारों किलोमीटर का अंतर पार कर, जहां उसका जन्म हुआ है उसी तट पर अंडे देने आती है।

मध्यरात्री या सुबह किनारे पर आकर ज्वार की सीमारेखा के बाहर कुछ अंतर पर रेत में गढ्ढे खोदकर एक ही समय में चालीस से सौ अंडे देती है और उस गढ्ढे को रेत से ढंककर फिर से समुद्र में चली जाती है। 40 से पचास दिनों के बाद अंडे से बच्चे बाहर आने लगते हैं। ये बच्चे किनारे से समुद्र की ओर जब चलते जाते हैं तब उनके शरीर में स्थित चुंबकीय लहरें पृथ्वी के चुंबक की ओर आकर्षित होती हैं और उसी की सहायता से इन बच्चों में की मादा कछुए पंद्रह साल बाद अंडे देने के लिये इसी किनारे पर वापस आती हैं। परंतु इन कछुओं का जीवन अत्यंत अल्प होता है। साधारणत: एक हजार बच्चों में से एक पूरी तरह बढ़ता है और जीवन रहता है। इसके कारण इन कछुओं का संवर्धन आवश्यक है।

मनुष्य द्वारा फैलाये जा रहे प्रदूषण एवं समुद्र किनारों पर का बढ़ता पर्यटन, ऐसे अनेक कारणों से समुद्री कछुओं के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। महाराष्ट्र में सह्याद्री निसर्ग मंडल इस संस्था ने कोकण के किनारों पर जन-जागृति कर ऑलिव्ह रिडले कछुओं का संवर्धन करने का आव्हान किया है। इस आंदोलन से अनेक गांवो में कछुआ मित्र मंडल स्थापित हुई हैं। इस मंडल के सदस्य रोज सुबह गस्त लगाकर यदि कहीं कछुए का घर दिखता है तो वहां के अंडो को सुरक्षित रूप से दूसरे गढ्ढों में शिफ्ट कर देते हैं। इसके कारण भेडियों, कुत्तों से इनकी रक्षा होती है। इन अंडो से बच्चों के बाहर आने के बाद उन्हे सुरक्षित रूप से किनारे पर छोड़ दिया जाता है और फिर ये बच्चे समुद्र में निकल जाते हैं। भारतीय परंपरा में परमेश्वर ने कूर्मावतार धारण कर पृथ्वी बचाने की कथा है, परंतु अब इस कूर्मावतार को ही बचाने का समय आ गया है।

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu