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सेना के जवानों पर पत्थर फेंकने की क्रिया से लेकर उसका समर्थन करने की मानसिकता तक सभी बातें खतरे की घंटी हैं।

दो जानिब बंट रहा है मेरे देश का नौजवान
एक शहीद हो रहा है, एक पत्थर फेंक रहा है!!

कॉलेज के कैन्टीन में लगभग सभी विद्यार्थी एक साथ खड़े होने और अंदर चल रही लड़ाई के प्रत्यक्षदर्शी बनने का प्रयास कर रहे थे। हर कोई चाह रहा था कि उसे पता चले कि अंदर क्या हो रहा है। किस बात पर हमेशा एक साथ चाय की चुस्कियां लेने वाले, ठहाके लगाने वाले दो दोस्त बातों ही बातों में इतना लड़ने लगे कि उनके बीच हाथापाई की नौबत आ गई। भीड़ में खड़े लोगों को कानाफूसी और आंखों के इशारों से एक दूसरे से पूछने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा था। अंतत: प्रिन्सिपल सर के हस्तक्षेप के बाद वे दोनों थोड़ा रुके(शांत नहीं हुए) और उनके ऑफिस में जाकर बात करने को राजी हुए।

ऑफिस में जाकर जब सर ने दोनों से धीरे-धीरे सवाल जवाब करना शुरू किए तो यह बात ध्यान में आई कि दोनों के बीच गहरा वैचारिक मतभेद ही उनकी इस लड़ाई की वजह है। दोनों की उम्र, कॉलेज का नया-नया माहौल और पढ़ाई के लिए चुनी गई विधा एक होने के कारण अभी तक दोनों के बीच कोई गहन वैचारिक मुद्दे उठे ही नहीं। परंतु आज जब सेना के जवानों पर पत्थर फेंकने वाली घटना का जिक्र हुआ तो दोनों का वैचारिक मतभेद सामने आया।

खबर सुनकर दोनों उत्तेजित हो उठे, दोनों के मन में रोष था, लेकिन एक का रोष जवानों के प्रति था और दूसरे का पत्थर फेंकने वालों के प्रति। एक की दलील थी कि सेना के जवान हमारी सुरक्षा के लिए दिन-रात तैनात रहते हैं, हर मौसम में, हर भौगोलिक परिस्थिति में। ऐसे में उनपर ही पत्थर फें कना सरासर गलत है। दूसरे का कहना है कि अगर जवान हमारी रक्षा के लिए हैं तो उन्होंने पैलेट गन का उपयोग कर हमारे ही देश के नौजवानों पर हमला क्यों किया? क्यों वे अपनी जीप पर एक नौजवान को बांधकर ले गए? क्यों सेना ने इस क्रिया के लिए सेना के अफसर को क्लीन चिट दे दी? क्यों वे नक्सली क्षेत्रों में सामान्य लोगों तथा नक्सलियों के बीच का अंतर नहीं समझ पाते? उन्हें पत्थर फेंकने के बदले पैसे मिलते हैं, जिससे वे अपने परिवार की मदद कर सकते हैं। पैसों का अभाव उन्हें यह सब करने पर मजबूर करता है।

ये और ऐसे कई सवाल आज हमारे देश के युवाओं के सामने हैं, जिनका अगर तार्किक, भावनात्मक और प्रैक्टिकल उत्तर नहीं दिया गया तो युवाओं का मन भटकने में देर नहीं लगती। सेना के जवानों पर पत्थर फेंकने की क्रिया से लेकर उसका समर्थन करने की मानसिकता तक सभी बातें खतरे की घंटी हैं। जिन युवाओं ने प्रत्यक्ष रूप से पत्थर फेंकने का कार्य किया है उनमें से कुछ ने यह स्वीकार किया था कि चंद रुपयों के लिए उन्होंने सेना के जवानों पर पत्थर फेंके। परंतु जो युवा वहां के हालातों से अनभिज्ञ हैं उनके द्वारा पत्थर फेंकने की घटना का समर्थन करना बड़ी विपत्ति की ओर इशारा कर रहा है।

एक ही राष्ट्र के युवाओं की सोच में अगर इतना अंतर होगा तो क्या राष्ट्र प्रगति कर पाएगा? सत्ताधीशों, शासनकर्ताओं के खिलाफ आंदोलन करना, उनकी कार्यशैली का विरोध करना, समाज में हो रहे अपराधों, दुष्कृत्यों के विरोध में आंदोलन करना यहां तक सब कुछ मान्य है। परंतु किसी आतंकवादी कासमर्थन करने, फांसी के बाद उसकी शवयात्रा में हजारों की संख्या में शामिल होने, इसिस जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन में शामिल होने के लिए अपना परिवार, देश छोड़ देने जैसी घटनाएं इस बात का संकेत है कि देशद्रोह के अंगार सुलग रहे हैं और इन अंगारों को सुलगता रखने के लिए सुनियोजित तरीके से हवा दी जा रही है।

एक सर्वव्यापी अवधारणा यह है कि किसी राष्ट्र का विकास उसके नागरिकों विशेषत: युवाओं के एकत्रित विकास में ही निहित है। अब अगर देश के नौजवानों को सुनियोजित तरीके से पथभ्रष्ट करने के कारणों की मीमांसा की जाए तो मुख्य रूप से कुछ बातें सामने आती हैं। पहली तो यह कि देश के अंदर ऐसे कुछ (वामपंथी)लोग हैं जो अपने निजी, वैचारिक, सामूहिक या राजनैतिक स्वार्थ के लिए नौजवानों को भड़का रहे हैं क्योंकि मोदी सरकार के आने के बाद से नौजवानों में देशभक्ति और एकात्मता की भावना फिर से मुखर हो चुकी है। दूसरी यह कि देश के बाहर के लोग जैसे इसिस या पाकिस्तान से सम्बंधित अन्य आतंकी संगठन भारतीय नौजवानों का धर्म तथा पैसों के आधार पर हृदय परिवर्तन कर रहे हैं, जिससे उनमें देशभक्ति की भावना ही जागृत न हो। तीसरा यह कि स्वतंत्रता के बाद से युवाओं में देशभक्ति की भावना जागृत कर उस युवाशक्ति का उपयोग राष्ट्रविकास में करने का दृष्टिकोण देश के राजनैतिक नेतृत्व में दिखाई नहीं देता था। हालांकि कुछ संगठनों द्बारा सामाजिक स्तर पर यह कार्य प्रबल रूप से किया गया परंतु उसे राजनैतिक साथ न मिलने के कारण अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आए।

भारत आज विश्व पटल पर उभरते हुए देश के रूप में प्रस्तुत हो रहा है और भविष्य में उसकी ऊर्जा का मुख्य स्रोत आज के युवा ही होंगे। अत: आज के युवाओं की सामूहिक मानसिकता को सकरात्मक दिशा में मोड़ना ही सबसे बड़ा लक्ष्य है।

ज्यादातर युवाओं को इस बात की चिंता रहती है कि उन्हें रोजगार कहां और कैसे मिलेगा, कई दशकों से भारत में रोजगारपरक शिक्षा का अभाव रहा है। आमतौर पर ऐसा देखा गया है कि किसी नौकरी या रोजगार के लिए पहुंचे बहुत से युवाओं में मूलभूत शैक्षणिक योग्यता का भी अभाव रहता है। हम दुनिया के सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में से एक है, परंतु अप्रशिक्षित युवा बेरोजगारों की संख्या भी हमारे देश में बहुत अधिक है। अब चूंकि युवाओं के हाथों को रोजगार नहीं है और मस्तिष्क में सकारात्मक विचार नहीं हैं अत: ‘खाली दिमाग, शैतान का घर‘ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में स्वामी विवेकानंद के विचारों का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। वे अक्सर स्वामी विवेकानंद के जीवन की घटनाओं, उनके उद्धरणों की चर्चा करते हैं। जिस प्रकार स्वामी विवेकानंद को युवाओं से उम्मीदें थीं, उसी प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी है। वे जानते हैं कि आज के युवाओं के गलत दिशा में जाने के प्रमुख कारण हैं नैतिक मूल्यों का ह्रास, बेरोजगारी या जीवनयापन की आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध न होना। इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री पद का दायित्व स्वीकार करने के बाद ही राष्ट्रीय युवा नीति(२०१४) बनाई जिसमें इन सभी बातों का समावेश है।

अब सौभाग्य से भारत को ऐसा नेतृत्व प्राप्त हुआ है जो युवाओं के द्वारा किए जा सकने वाले राष्ट्रविकास को सकारात्मक दृष्टकोण से देखता है और उसके लिए प्रयत्नशील है। सकारात्मक बात यह है कि देश का युवा भी प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी से प्रभावित है। यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि नरेन्द्र मोदी को प्रधान मंत्री बनाने में युवाओं का ही योगदान अधिक है।

अब सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि प्रधान मंत्री द्वारा बनाई गई योजनाओं का युवाओं तक पहुंचना और युवाओं द्वारा उन पर अमल किया जाना। यह जिम्मेदारी प्रधान मंत्री, समाज और युवा सभी की है। अगर सभी ने अपनी-अपनी जिम्मेदारी का योग्य निर्वहन किया तो निश्चिर रूप से जागरूक युवा देश के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान करेगा, देश की विकास में कड़ी बनेगा, युवाओं की योग्यता राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होने के साथ-साथ अन्य लोगों को राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करेगा।

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