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श्रीमती सुमन तुलसियानी जैसा व्यक्तित्व समाज में एक मिसाल के रूप में देखा जा सकता है। उम्र के सात दशक के पड़ाव पर भी उनका उत्साह कायम है।

मुंबई के उपनगर दादर में सुश्रुषा नामक अस्पताल विगत ४७ सालों से रोगियों की सेवा के लिए समर्पित है। उपचार की अद्यायावत सुविधाओं के साथ चल रहे इस अस्पताल का उद्घाटन सन १९६९ में तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने किया था। ५० वर्षों के पडाव के समीप आते हुए अस्पताल ने एक कदम आगे बढकर एक अन्य उपनगर विक्रोली में भी अपनी शाखा शुरू की है। यह अस्पताल भी सभी अत्याधुनिक सुविधाओं से पूर्ण होगा।

विक्रोली का अस्पताल शुरू करते समय अस्पताल के सामने सबसे बडी चुनौती थी निधि की। दादर स्थित अस्पताल को चार दशकों से सुव्यवस्थित रूप से चलाने के कारण अस्पताल के प्रभारियों को नए अस्पताल को भी व्यवस्थित रूप से चलाने का विश्वास था परंतु केवल निधि की कमी के कारण अस्पताल शुरू नहीं हो पा रहा था। सुमन रमेश तुलसियानी ट्रस्ट की कर्ताधर्ता सुमन तुलसियानी को जब यह बात पता चली तो उन्होंने अस्पताल का काम देखकर उसे आर्थिक सहायता देना का आश्वासन दिया। विक्रोली की नई शाखा के लिए उन्होंने २५ करोड रुपए की रकम अस्पताल को दी और अब ‘सुश्रुषा का सुमन रमेश तुलसियानी अस्पताल’ मरीजों के उपचार के लिए पूर्ण रूप से तैयार है। अमूमन यह देखा जाता है कि जब भी कोई व्यक्ति इतनी बडी आर्थिक सहायता करता है तो उसका व्यवसाय के दैनिक कार्यों में भी हस्तक्षेप होता है। परंतु सुमन तुलसियानी ने सुश्रुषा का सम्पूर्ण कार्यभार अस्पताल के अधिकारियों को ही सौंप दिया है। वे स्वयं या सुमन रमेश तुलसियानी चैरिटेबल ट्रस्ट इसमें किसी भी प्रकार का कोई भी हस्तक्षेप नहीं करता।

समाज सेवा की निस्वार्थ भावना को लेकर काम करने वाली सुमन रमेश तुलसियानी की सहायता निश्चित हो समाजोपयोगी सिद्ध होगी।
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के ललाट मरीन ड्राइव स्थित तुलसियानी चेंबर्स में दाखिल होते ही तमाम भौतिक अनुभवों के बीच उम्र के सात दशक पार कर चुकी सुमन तुलसियानी जी के केबिन में प्रवेश करते ही एक आध्यात्मिक और मातृत्वपूर्ण अनुभव के बीच उनकी सरल, विनीत और भावपूर्ण वाणी हर उस व्यक्ति के दुख को हर लेती है, जो कि अपने किसी परिजन के इलाज हेतु मदद की आस लिए पहुंचता है। चेहरे पर सात्विक भाव और वाणी में माधुर्य अपनापन लिए मृदु वाणी में उनका हालचाल ही नहीं पूछती बल्कि सामने बैठे जरूरतमंद की यथासंभव मदद भी करती हैं।

उनके पास मदद की गुहार लेकर आने वाले हर व्यक्ति को पूर्ण विश्वास होता है कि वह निराश होकर नहीं लौटेगा। सामने वाले व्यक्ति की तकलीफ उन्हें उसी तरह व्याकुल कर देती है जैसे कि स्वतः की संतान के लिए व्याकुल मां। अपनेपन की भावना से उनके द्वारा कहे गए शब्द न सिर्फ धैर्य रखने में सहायक होते हैं बल्कि उनमें जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की प्रेरणा भी बलवती करते हैं।

ऐसा नहीं है कि उनकी ममता का लाभ केवल कैंसर पीड़ितों को या अन्य खतरनाक बीमारियों से ग्रसितों को ही मिल पाता है अपितु कई युवाओं ने भी उनकी ममता की छांव से लाभान्वित होकर शैक्षणिक जीवन में सफल होकर देश और समाज को गौरवान्वित किया है। वे इन युवाओं द्वारा भेजे गए ग्रीटिंग कार्ड, पत्र या अन्य प्रपत्रों को बहुत सहेज कर रखती हैं; क्योंकि उनकी नजर में ये आत्मिक रिश्ते ही वास्तविक जमापूंजी होती हैं। यही आपको मानसिक और आध्यात्मिक सुख देती है। यही थातियां ऐसी हैं जो कि मानव जीवन को सारगर्भित भाव प्रदान करती हैं। किसी व्यक्तिमात्र के जीवन की सफलता का मूल्यांकन करते समय समाज इन उपलब्धियों की चर्चा ही सर्वाधिक करता है; क्योंकि परमार्थ ही आपकी वास्तविक सामाजिक पूंजी होती है। आपके द्वारा जीवन भर में कमाए धन में स्व का भाव समाहित होता है, वहीं पूंजी का सार्थक और परोपकारी उपयोग जीवन के यथार्थ और महत्व को ईश्वरीय रूप प्रदान करता है।

साधारणतया धनी परिवारों की महिलाएं किटी पार्टी या क्लब जैसे स्थानों को प्राथमिकता देती हैं परन्तु सुमन जी ने समाज के कमजोर तबके की भलाई का रास्ता चुना, उनके दुःखों में दिलचस्पी ली और दूर करने का प्रयत्न किया। श्रीमती तुलसियानी इसका बहुत खुबसूरत सा उत्तर देती हैं, ‘‘मेरे पति श्री रमेश तुलसियानी जी एक सफल और प्रतिष्ठित भवन निर्माता हैं पर सबसे पहले वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक निष्ठावान कार्यकर्ता हैं। मेरा परिवार राष्ट्र और समाज के प्रति हमेशा ही सजग रहा है। इसीलिए बेटे, नाती, पोतों आदि की जिम्मेदारियों से मुक्त होते ही हमने ‘सुमन रमेश तुलसियानी चैरिटेबल ट्रस्ट की, जिसका मुख्य उद्देश्य है- अपनी व्यावसायिक उपलब्धियों का समाज की सेवा में उपयोग करना। ’’
देश के ज्यादातर संपन्न लोगों ने चैरिटेबल ट्रस्ट बनाए हैं। उनमें से भी ज्यादातर ट्रस्ट अच्छा कार्य कर रहे हैं। पर बहुत कम संस्थाएं ऐसी होंगी जहां चैरिटेबल ट्रस्ट बनाने वाला व्यक्ति स्वयं हर कार्य पर नजर रखता हो। सुमन तुलसियानी जी उन चुनिंदा लोगों में से एक हैं। आखिर ये संस्कार आए कहां से? उनका बचपन से लेकर अबतक का समूचा जीवन संयुक्त परिवार में बीता है। अपनी मां, चाची, बड़े भाई, सास, ससुर आदि से यह भाव उनके अंदर आया। उन्होंने घर के बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी की सेवा का माहौल देखा है। परिवार के जिम्मेदार सदस्यों में कभी झुंझलाहट या गुस्से का भाव नहीं देखा। हर किसी के चेहरे पर हमेशा ही कर्तव्यपूर्ति का भाव देखा।

९ अक्टूबर १९३७ को गोवा के एक मराठी परिवार में जन्मी सुमन ने अपनी विद्यालयी शिक्षा का कुछ भाग न्यू एरा हाईस्कूल, मारगांव (गोवा) से पूरा करने के बाद मुंबई के गिरगांव स्थित सैनिक विद्यालय से एस.एस.सी. की शिक्षा पूरी की। आगे की शिक्षा पूरी करने हेतु सोफिया कालेज में दाखिला लिया जहां पर उन्होंने मनोविज्ञान और फ्रांसीसी भाषा का विशेष अध्ययन करते हुए स्नातक में प्रथम स्थान प्राप्त किया। उन्हें पेरिस के सर्बोन विश्वविद्यालय द्वारा छात्रवृत्ति भी मिली थी जिसे उन्होंने कुछ निजी कारणों के कारण अस्वीकार कर दिया था।

विवाहोपरांत संयुक्त मराठी परिवार की छोटी बेटी एक संयुक्त सिंधी परिवार की बड़ी बहू बनकर आई और इसी के साथ आई संयुक्त परिवार की बड़ी जिम्मेदारियां, जिन्हें उन्होंने बहुत ही शिद्दत से निभाया। दोनों परिवारों के पड़ोसी होने के कारण वे लोग आपस में काफी घुले-मिले थे इसलिए मराठी परिवार से सिंधी समुदाय के बीच पहुंचने पर उन्हें कुछ अलग सा नहीं महसूस हुआ। नई भाषाएं सीखने की ललक बचपन से ही होने की वजह से एक वर्ष के भीतर ही सिंधी भाषा पर उनकी मजबूत पकड़ हो गई। कुछ ऐसे ही संस्कार उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को भी दिए। विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद उन दोनों ने भारत में ही अपना कैरियर बनाने का निश्चय किया। पश्चिमी सभ्यता का अंधाधुंध अनुकरण करने वाली नव पीढ़ी और अपनी संतानों को विदेशी शिक्षा के साथ ही साथ विदेशी नौकरी के प्रति उकसाने वाले अभिभावकों के लिए सुमन तुलसियानी जी से प्रेरणा लेनी चाहिए।

‘सुमन रमेश तुलसियानी चवरिटेबल ट्रस्ट‘ के माध्यम से निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं –
१) गरीब और जरूरतमंद विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देना।
२) गरीब और जरुरतमंद रोगियों का आर्थिक व मानसिक सहयोग करना।
३) अस्पताल में बीमार के साथ आए उनके रिश्तेदारों को रोज दोपहर का भोजन देने की व्यवस्था करना।
४) गोवा में लड़कियों के अनाथालय का संचालन करना, वहां की लड़कियों को सबल बनाने का प्रयत्न करना।
५) भाईंदर के केशव सृष्टि में स्थित राम रतन विद्या मंदिर के हॉस्टल का निर्माण कार्य।
६) गोवा के बांदवाड़ा में भव्य और सभी सुविधाओं से युक्त वृद्धाश्रम ‘स्नेह मंदिर‘ का संचालन।
७) लोनावाला के कामशेत में अपने ट्रस्ट के माध्यम से ‘सुमन रमेश तुलसियानी टेक्निकल इंजीनियरिंग कालेज’ का संचालन।
८) नाना पालकर स्मृति भवन की ओर से बीमार लोगों की सहायता हेतु सतत् प्रयत्नशील।

इसके अलावा एशियन हार्ट इंस्टीट्यूट, रमाकांत पांडा कार्डियोलॉजी सेंटर और नर्मदा किडनी एसोसिएशन से भी संबद्ध सुमन जी एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व वाली महिला हैं और सृष्टि की रचना करने वाले ईश्वर में उनकी प्रबल आस्था है। घर पर गणपति पूजन और नवरात्रि पूजन के अलावा वे ब्रह्माकुमारी संस्थान और इस्कान मंदिर से भी जुड़ी हैं। वे पंढरपुर की पैदल यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए भोजन की व्यवस्था भी उपलब्ध कराती हैं।

उक्त ट्रस्ट के माध्यम से मिलने वाले योगदान के कारण अपनी शिक्षा पूर्ण करने वाले विद्यार्थी और रोगमुक्त हुए लोग आगे भी उनके संपर्क में बने रहते हैं। उनके चेहरों पर मुस्कान की रेखा देखकर उन्हें ट्रस्ट के माध्यम से किए जा रहे कार्यों पर सुखद अनुभूति होती है। जब वे इन विद्यार्थियों या रोगियों को सक्षम देखती हैं तो उन्हें अपने भविष्य के कार्यों के लिए प्रेरणा तो मिलती ही है, उनके परोपकार के प्रति दृढ़ विश्वास को और मजबूत भी करती है।

इस उम्र में भी भी वे जिस उत्साह के साथ कार्य करती हैं उसका पूरा श्रेय और प्रेरणास्रोत अपने बड़े भाई और गुरु डॉ. सदाशिव कुवेलकर को मानती हैं जो कि एक विख्यात चिकित्सक हैं और पिछले छः दशकों से भी अधिक समय से इस पेशे में कार्यरत हैं। अपनी दिनचर्या में संतुलित आहार और रोज सुबह एक घंटे टहलने को वे अपने अच्छे स्वास्थ्य का कारक मानती हैं।

इसी जिजीविषा के कारण २०१५ में मुंबई की मैराथन रेस में हिस्सा लिया और आयु के सात दशक पूर्ण करने के बावजूद अपने आयु वर्ग के लिए मर्यादित दूरी को पूर्ण भी किया। पूरी दौड़ के दौरान वे डॉ. हेडगेवार रुग्णालय के बैनर को अपने हाथों में उठाए रखी थी जिससे हर किसी को इसकी जानकारी प्राप्त हो सके। समाज के प्रति इसी कर्तव्य भावना के कारण उन्हें २०१५ का ‘ग्लोबल अवार्ड’ मिला जो कि ‘ ग्लोबल सिंधी काउंसिल‘ की ओर से प्रति वर्ष चिकित्सा, समाजसेवा, व्यवसाय इत्यादि क्षेत्रों के लिए दिया जाता है।

श्रीमती तुलसियानी जैसा व्यक्तित्व समाज में एक मिसाल के रूप में देखा जा सकता है। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका उत्साह कायम है। वैभव, अमीरी और विलासिता का जीवन छोड़कर मानव दुःखों को दूर करने की भावना से ओतप्रोत भारत की इस मातृशक्ति ने जो बीड़ा उठाया है वह निरंतर प्रगति के उच्चस्थ सोपानों को प्राप्त करे, यही ईश्वर से प्रार्थना है।

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