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पं. दीनदयाल के लिए राजनीतिक अस्तित्व से अधिक राजनीतिक शुचिता और अस्मिता की चिंता जीवन पर्यन्त रही और उन्होंने सीना ठोंककर उसे सफलीभूत किया, क्योंकि उनके लिए सिद्धांत अमूल्य थे, राजनीति उनके लिए सफलता-विफलता का दर्पण नहीं थी। पंडितजी के इस जन्मशती वर्ष पर प्रस्तुत यह आलेख-

 

राजनीति में आदर्श की बात करना सरल है, लेकिन आज आदर्शों को राजनीतिक जीवन की धुरी बनाकर बढ़ना कठिन ही नहीं अपितु दुर्लभ है। इसका कारण यह है, कि सामाजिक यथार्थ और भविष्य के समाज की कल्पना के लिए बनाए गए आदर्शों के बीच भारी संघर्ष है।

इसे समझाने के लिए साठ के दशक पर गौर करना होगा। देश कांग्रेसयुक्त था। लोकसभा उपचुनाव के लिए चार क्षेत्र रिक्त थे। बात १९६३ की है जब विपक्ष के चार दिग्गज, राजकोट से स्वतंत्र पार्टी के मीनू मसानी, उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद से समाजवादी पार्टी के डॉ. राममनोहर लोहिया, अमरोहा से जे बी कृपलानी और जौनपुर से पं. दीनदयाल उपाध्याय कांग्रेस को चुनौती देने के उद्देश्य से चुनाव के मैदान में कूदे थे। डॉ. लोहिया फूलपुर से १९६२ में भी पं. नेहरू को टक्कर दे चुके थे। पं. नेहरू डॉ. लोहिया और जे बी कृपलानी के कट्टर विरोधी थे और उनके प्रवेश पर हर संभव अड़ंगा लगाने के लिए कटिबद्ध थे। पं. दीनदयाल पं. नेहरू की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति के विरूद्ध थे। उनका कहना था कि लोकतंत्र में एक दल, एक नेता, एक सिद्धांत घातक है।

मजे की बात है कि जिस जातिवाद के खिलाफ पं. दीनदयाल उपाध्याय थे, उसी जातिवाद के आधार पर डॉ. लोहिया ने फर्रूखाबाद से चुनाव लड़ना तय किया। पं. दीनदयाल ने इस पर विरोध तो किया लेकिन समर्थन में प्रचार करने से एकता के हित में, बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए सहमति जता दी। वोट बैंक की राजनीति कांगे्रस ने अमरोहा से शिरोधार्य की और कृपलानी को पराजित करने के लिए संसदीय कमेटी से अनुशंसित प्रत्याशी को खड़ा करने के बजाय हाफिज मोहम्मद इब्राहिम को उतार दिया। क्योंकि यहां तुष्टीकरण परवान चढ़ाना था।

पं. दीनदयाल उपाध्याय मानते थे कि तात्कालिक हार जीत कोई मायने नहीं रखती। इसलिए कृपलानी की जीत भारतीय जनसंघ की नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए मतदान केन्द्र तक जनसंघ के कार्यकर्ता तैनात किए। लेकिन जौनपुर में चुनाव लड़ते हुए पं. दीनदयाल ने जातिवाद के नारे को पास नहीं फटकने दिया और अपने क्षेत्र में चुनावी सभाओं में कहा कि, जो जातीय आधार पर पं. दीनदयाल के समर्थन में आए हैं वे सभा से प्रस्थान कर जाएं, मुझे जाति के आधार पर समर्थन नहीं चाहिए। पं. दीनदयाल ने पराजय स्वीकार करते हुए कहा कि, भारतीय जनसंघ जीता है, पं. दीनदयाल की पराजय हुई है। जौनपुर से पं. दीनदयाल जीतते तो उस चुनाव की शुचिता का अहसास नहीं होता। उनकी पराजय भारतीय चेतना में बीज की तरह मौजूद है, जो जातिवाद के दलदल में फंसी आज की राजनीति के लिए राजनीतिक शुचिता का सामयिक संदेश है। इसकी आज प्रासंगिकता है, क्योंकि चुनाव ने ही जातीय आधार पर समाज को फिरकों में देखना शुरू कर दिया है। राष्ट्रहित तो दूर समाज के पहले हम जातिपरस्ती में उलझ जाते हैं।

पं. दीनदयाल की गणना राष्ट्रपिता बापू, समाजवाद के प्रवर्तक डॉ. राममनोहर लोहिया, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के समकक्ष स्वयं हो जाती है, जिसने आदर्शों को गढ़ा और उन पर चलकर जीवन जिया है। वास्तव में वे राजनीतिक दार्शनिक थे, और उन्हें इस बात का श्रेय जाता है कि जब राजनीति के प्रर्वतक यूरोप की ओर देख रहे थे, उन्हें भारतीय राजनीति को देश की परंपरा, भारतीयता, अध्यात्मिकता से जोड़ा। भारतीय लोकतंत्र को दिशा दी। राजनीति को शुचिता का दर्शन दिया। भारतीयता की जड़ों से राजनीति को जोड़ने में जुटे। उनका दिया ‘एकात्म मानवदर्शन‘ भारत को ही नहीं विश्व को एक अनुपम उपहार है। यह उनकी ही दूरदर्शिता थी कि भारतीय राजनीति में भारतीय जनसंघ की जड़ें गहरी हुईं और वह अपनी विशिष्टता की अनुभूति करने में सफल हुआ जो भारतीय जनता पार्टी को दूसरे दलों की तुलना में विशिष्ट बनाती है। जन समर्थन का व्यापक आधार बनाने में उनके आदर्श और आदर्शों का यथार्थ रूप लेना पार्टी के लिए वरदान बना।

पं. दीनदयाल के लिए राजनीतिक अस्तित्व से अधिक राजनीतिक शुचिता और अस्मिता की चिंता जीवन पर्यन्त रही और उन्होंने सीना ठोंककर उसे सफलीभूत किया, क्योंकि उनके लिए सिद्धांत अमूल्य थे, राजनीति उनके लिए सफलता-विफलता का दर्पण नहीं थी। वाकया राजस्थान का है, बात १९५३ की है जब वहां से मात्र आठ विधायक चुनकर आए थे। चुनाव घोषणा पत्र में जमींदारी उन्मूलन के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की गई थी। लेकिन जब विधेयक विधान सभा के सदन में आया तो भारतीय जनसंघ के ६ विधायकों ने जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के विरोध में मत दे दिया। उन्होंने इन ६ विधायकों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया और साबित किया कि पार्टी का विचार श्रेष्ठ है। राजनीति कर्मकांड नहीं है।

एक अवसर ऐसा भी आया जब दलों के विलीनीकरण की जोर-शोर से पंचायत हुई। हिन्दू महासभा के साथ विलय की चर्चा चली तो उन्होंने पूछा कि, बतायें कि डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जिन कारणों से परित्याग किया था, क्या वे सब विद्यमान नहीं हैं? यहां विचारभिन्नता थी कि हिन्दू महासभा ने गैर हिन्दुओं से पृथकता बताई थी। उन्होंने विलय नामंजूर कर दिया, इससे भारतीय जनसंघ और पं. दीनदयाल की समावेशी सोच प्रमाणित हो जाती है। उन्होंने राम राज्य परिषद से मिलाप इसलिए खारिज कर दिया कि वह संचालित होती है महलों से, घरानों से; करपात्री जी की कुटिया तो मुखौटा है। इसी तरह उन्होंने स्वतंत्र पार्टी से भी आर्थिक मतभेद बताया। उन्होंने कहा कि जनधारणा को कैसे झुठलाया जा सकता है कि स्वतंत्र पार्टी का संचालन दलाल स्ट्रीट से होता है।

पं. दीनदयाल के सामने समाज और व्यवस्था में जनहितकारी परिवर्तन लाने का उद्देश्य था। इसलिए उन्होंने वामपंथियों के संपूर्ण राष्ट्रीयकरण का भी खुलकर विरोध किया। उनका मानना था कि भारत की आवश्यकता परिवर्तनेच्छु है, अपरिवर्तनेच्छु नहीं। उन्होंने दिसंबर १९६७ में केरल के कालीकट में जनसंघ अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए जो बात कही वह भारतीय समाज के लिए बीज मंत्र है, शाश्वत सत्य है। उन्होंने कहा कि सामाजिक-आर्थिक समानता का संघर्ष किसी एक दल की बपौती नहीं है। सांस्कृतिक राष्ट्रवादी, समतामूलक समाज की कल्पना को साकार करना परम् उद्देश्य है। भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता में आने के बाद इसे अंत्योदय कहकर धरातल पर उतारने का जो देशव्यापी अभियान छेड़ा है, यह उस महामानव के प्रति श्रद्धांजलि कही जाएगी। आजादी के ७० वर्ष बाद यदि हम पाते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम में आजादी के दीवानों ने दुःख-दैन्य, निरक्षरता, बेरोजगारी समाप्त करने का जो सपना देखा था, वह अधूरा है तो उसका यही कारण है कि सत्ता हस्तांतरित होने के बाद भी राजनीतिक संरचना और सोच जस की तस बनी रही। कुर्सी बदली, व्यवस्था और सोच नहीं बदल सके। इसके बारे में पं. दीनदयाल ने पहले ही आगाह कर दिया था। फिर एक कारण यह भी कि पंडित जी को काम करने के लिए मुश्किल से डेढ़ दशक का समय मिला, जिसमें उन्होंने एकात्म मानवदर्शन दिया, आदर्श गढ़े, आदर्शों को कसौटी पर कसा और उन्हें जीकर दिखा दिया। आज हम कहां हैं? कितना अनुसरण कर पाए हैं, और कितना बाकी है, यह विचारणीय विषय है।

पं. दीनदयाल ने यह भी दुनिया के राजनीतिक पंडितों को बता दिया कि जब राजनीति कैरियर बन जाएगी, ख्याति का अवसर खोजेगी और सत्ता तथा शक्ति का संसाधन बन जाएगी; यह उचित नहीं होगा, क्योंकि ऐसा सोचने वालों के लिए सत्ता साध्य बन चुकी होगी, सेवा का आर्दश भटक चुका होगा। जिस परिवर्तन की चिर आशा किए जिये हैं, वह हमसे दूर चला जाएगा। पं. दीनदयाल उपाध्याय एक पार्टी, किसी विशेष प्रतिबद्धता के प्रवक्ता के पद से बहुत ऊंचे किसी उत्तुंग शिखर पर विराजते हैं, जो राजनीति को सोद्देश्य बनाने का पक्षधर है।

यह वर्ष पं. दीनदयाल उपाधयय का जन्मशताब्दी वर्ष है। इसलिए इनके राजनीतिक दर्शन का अनुशीलन किसी एक दल का दायित्व नहीं है। क्योंकि आदर्श किसी ने भी स्थापित किया हो, उसका अनुसरण करना मानवता का सम्मान होता है। यह भी सत्य है कि आदर्श ग्रहणीय तभी होते हैं, जब आदर्श के पीछे लाभ हानि का बोध नहीं होता। इसका सबसे बड़ा सबूत क्या होगा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय के असामयिक दुःखद निधन के बाद जब उनकी राजनीतिक दैनंदिनी का प्रकाशन हुआ, कांगे्रस के दिग्गज, राष्ट्रवादी और विद्वतापूर्ण नेता डॉ. संपूर्णानंद ने भूमिका में लिखा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचार, कृतित्व में भारतीय लोकतंत्र और शुचितापूर्ण राजनीति का बोध परिलक्षित होता है जो दुनिया के राजनेताओं के लिए विचारणीय और प्रेरक तत्व है। लेकिन पं. दीनदयाल उपाध्याय की पॉलिटिकल डायरी पढ़कर हम भले ही आत्मतृप्त हो लें, हमारी समकालीन राजनीति में लघुता पीड़ादायक हो सकती है।

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