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कृषि हमारा जीवन-मार्ग है, लेकिन वर्तमान में यह मानने के लिए कोई तैयार नहीं है। इसी कारण सबसे खराब दौर से यदि देश का कोई क्षेत्र गुजर रहा है तो वह कृषि है। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में हुए किसान आंदोलनों ने देश में गरमाहट निर्माण की थी। फिलहाल किसान आंदोलन स्थगित हुआ है, पर खत्म नहीं हुआ है।

कभी प्राकृतिक आपदा किसानों की फसल बर्बाद करती है। सूखा, आंधी, बेमौसम बारिश और आसमान से बरसने वाले ओले हमेशा किसानों की कमर तोड़ते रहते हैं। असल में होना यह चाहिए था कि हम किसानों को आर्थिक रूप से इतना आत्मनिर्भर बना देते कि एक मौसम का नुकसान किसानों को खुदकुशी के लिए मजबूर नहीं करे। किसान चारों ओर से घिरा हुआ महसूस करता है। कर्ज लेकर खेत में बीज डालने वाले किसान को प्रकृति की आपदा से निर्माण होने वाले इन सवालों के जवाब नहीं मिलते कि कर्ज की अदायगी कैसे करें? पूरे साल में परिवार का भरण-पोषण कैसे करें? बेटे-बेटी की शादी कैसे करें? इन सवालों के जवाब न मिलने पर गले में फंदा डाल लेना ही किसान को सबसे आसान रास्ता दिखता है।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में यह पढ़ाया जाता है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। लेकिन उसी देश में आजादी के ६९ वर्षों में किसानों के लिए क्या हुआ? सिर्फ उनके कंधे पर बंदूक रख कर राजनीति का खेल खेला गया। उनकी समस्याओं का दीर्घावधि हल खोजने की अपेक्षा राजनैतिक पाटिर्र्यों की दिलचस्पी इस बात में ज्यादा रही कि किसानों के आंसुओं को वोट में कैसे तब्दील किया जा सके? आजादी के बाद ६० सालों में कांग्रेस ने यही बात की; लेकिन अब किसानों के लिए उनका दिल धड़कने लगा है, जब वे विपक्ष में पहुंच चुके हैं।

किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के मकसद से २००४ में एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया था। आयोग ने २००६ में अपनी रिपोर्ट केंद्र की कांग्रेस सरकार को सौंपी थी। उसकी सबसे अहम् सिफारिश यह थी कि किसानों की फसल के औसत लागत मूल्य में ५० प्रतिशत मुनाफा जोड़ते हुए समर्थन मूल्य घोषित किया जाना चाहिए। इसके अलावा उत्पादकता बढ़ाने, बीज-पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने, फसल बीमा को प्रभावी बनाने, खेती कर्ज की ब्याज दर कम करने और वसूली में छूट देने जैसे कई सुझाव भी आयोग ने दिए थे।

हैरानी की बात यह है कि कांग्रेस आज की तारीख में किसानों के हित को लेकर ज्यादा ही उत्साहित दिख रही है। जब उनकी खुद की यानी कांग्रेस की सरकार थी तब उसी सरकार ने यह आयोग गठित किया था। आयोग की रिपोर्ट आने के बाद भी कांग्रेस ८ साल सत्ता में रही; फिर भी इन सिफारशों को लागू करने से कांग्रेस क्यों बचती रही? आठ साल का अंतराल कोई छोटा समय नहीं है। आयोग की सिफारिशें कांग्रेस के जमाने में ठंडे बस्ते में पड़ी रहीं। दरअसल राजनीति की एक बड़ी सच्चाई यह है कि यहां समस्याओं के समाधान में किसी को कोई रुचि नहीं होती। यहां मुद्दों का बने रहना महत्वपूर्ण होता है। अगर मुद्दे न हो तो राजनीति कैसे होगी? सत्ता से बेदखल करने और सत्ता में बने रहने का खेल कैसे जारी रहेगा? किसानों से संबंधित कृषि समस्याएं इतनी बड़ी नहीं हैं कि जिसका समाधान न खोजा जा सके। किसानों को चाहिए क्या? बस अपनी फसल की सही कीमत। लेकिन कोई भी सरकार उसकी गारंटी लेने को तैयार नहीं है। किसानों का आर्थिक रूप से मजबूत होना और आत्मनिर्भर होना कांग्रेस या अन्य दलों के लिए कोई मायने नहीं रखता। सरकार की प्राथमिकता में किसान कहीं भी नहीं है। खेती और किसान को प्राथमिकता जब तक नहीं मिलेगी, तब तक किसानों के हालात नहीं बदलेंगे।

यह स्मरण दिलाने की आवश्यकता नहीं कि स्वाधीनता संग्राम में किसान ही अग्रसर रहा है। आज वे अपनी आजीविका किसी तरह खींच पा रहे हैं, और वह भी बेहद कठिनाइयां झेलकर। इसी जद्दोजहद में अनेक किसान निराश होकर आत्महत्या कर रहे हैं। उन्होंने यही कामना की थी कि स्वतंत्र भारत में उन्हें उनके कष्टों से मिुक्त मिलेगी। किसानों की अगणित समस्याओं के बीच अब तक की सबसे चुनौती भरी समस्या यह रही है कि किसानों को यह जानकारी नहीं होती कि उन्हें इस व्यवसाय और मेहनत की कीमत क्या मिलेगी? फसल के दाम तय करने के लिए कोई प्रभावी तंत्र नहीं है। लाभ किसी भी कारोबार में जरूरी होता है। लाभ भाग्य पर निर्भर नहीं होता है।

मोदी सरकार ‘मेक इन इंडिया’ की बात करती है। वह घरेलू और बाहरी निवेश बढ़ाना चाहती है। इसलिए अब कृषि में परिवर्तन के लिए ठोस कदम उठाना जरूरी है। ऐसे में सरकारी सहयोग और मार्गदर्शन से यह कृषि क्षेत्र एक बार फिर हरित क्रांति जैसी उपलब्धि देने वाला सक्षम क्षेत्र हो सकता है। आज विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं बचा है, इसलिए नए-नए मुद्दे खड़े किए जाएंगे। जनता का विकास मोदी सरकार लक्ष्य है, तो किसान हित में जितना ध्यान केद्रिंत करेंगे, परिणाम उतने ही अच्छे आएंगे। कृषि संकट वैश्वीकरण की नीतियों का परिणाम है, यह पूर्ण सत्य नहीं है। ६० सालों से कांग्रेस सरकार द्वारा कृषि नीतियों को अनदेखा करने का यह परिणाम है। इन नीतियों में परिवर्तन से ही स्थिति ठीक रहेगी। महाराष्ट्र सरकार ने किसानों को ऋण माफी दी है। लेकिन किसानों को उनकी दुर्दशा से बाहर निकालने के लिए यह नाकाफी है। केंद्र सरकार ने ऋण छूट से किनारा कर लिया है। कृषि क्षेत्र की मूल स्थिति में सुधार लाना जरूरी है इस बात को दरकिनार कर लोक-लुभावन कदम उठाने की भूमिका है। किसानों को कर्ज माफी देने के बजाय किसान ऋण ले सकें और गर्व से ऋण को फिर दे सकें इस प्रकार किसान को सक्षम करने का रास्ता चुनना जरूरी है। रोग गहन है। इसका इलाज भी गहनता से होना जरूरी है, नहीं तो किसानों के भीतर जो आक्रोश दहक रहा है वह कभी भी विस्फोटक हो सकता है।

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