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दूरदर्शन पर एक छोटे से स्लॉट से शुरू हुआ एनडीटीवी कुछ ही वर्षों में देश का ख्यातिनाम मीडिया ग्रुप बन चुका है। …मालिक प्रणव व राधिका रॉय दम्पति ने ऐसा मकड़जाल बुनना शुरू किया और डेढ़ साल के भीतर खुद ही फंसते चले गए। बिकने वाले तमाम शेयरों को खरीदने के क्रम में वे कर्ज लेते चले गए जो बैंक को नुकसान पहुंचाने का कारण बना।

वो सलीबों के करीब आए तो हमको
कायदे-कानून समझाने लगे हैं।

मशहूर गजलकार दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां एनडीटीवी के को-फाउंडर प्रणव रॉय (सारी दुनिया जानती और समझती है कि कंपनी के फाउंडर वही हैं लेकिन हर बार, जब वे लोगों से मुखातिब होते हैं, तो यह जताना नहीं भूलते कि,‘दरअसल इस कंपनी की फाउंडर मेरी पत्नी राधिका हैं। मैं तो बाद में जुड़ा।’) के लिए कितनी सटीक बैठती हैं। ५ जून को सीबीआई ने उनकी कंपनी आरआरपीआर के दिल्ली और देहरादून समेत चार ठिकानों पर छापा मारा। कंपनी ने २००८ में आइसीआइसीआइ बैंक से ३७५ करोड़ का कर्ज लिया था जिसमें कई अनियमितताएं पाईं गई थीं। इस मामले को लेकर मई के अंतिम सप्ताह में सीबीआई की बैंकिंग फ्रॉड शाखा ने कंपनी पर केस दर्ज किया था। सीबीआई का मानना है कि इस पूरे मामले में रॉय दंपति ने बैंक को कथित तौर पर ४८ करोड़ का नुकसान पहुंचाया। पर प्रणव व राधिका के अनुसार सरकार एनडीटीवी और उसके प्रमोटर्स को परेशान कर रही है। जबकि मामला अलग और काफी हद तक दिलचस्प, चालाकीभरा और कानून विरोधी है।

उनकी कंपनी द्वारा किए गए हेरफेर ने श्री अय्यर जैसे विद्वान और कंप्यूटर विज्ञानी को किताब लिखने के लिए मजबूर कर दिया। अय्यर साहब ने एनडीटीवी में किए गए इन घपलों को लेकर अंग्रेजी भाषा में १६० पृष्ठों की किताब लिखी, ‘एनडीटीवी फ्राड्स,‘ जो कि बेस्ट सेलर भी रही। गौरतलब है कि मिस्टर अय्यर विवादों से दूर रहने वाले और अपनी खोजों में व्यस्त रहने वाले व्यक्ति हैं। उनके पास सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर, एनक्रिप्शन और सिस्टम्स के ३७ पेटेंट और आइटी सेक्टर में विश्वव्यापी साख है। इतना ही नहीं दिसंबर २०१५ में ‘दिल्ली प्रेस‘ की अंग्रेजी पत्रिका ‘THE CARAVAN’ ने भी व्यापक रिपोर्ट छापी थी। ‘दिल्ली प्रेस’ वामपंथी विचारों वाला समूह है जिसकी संघ और भाजपा से दूरी विख्यात है।

इस पूरे मामले की जड़ में है एनडीटीवी और आइसीआइसीआइ के एक शेयर होल्डर संजय दत्त की २०१३ में की गई शिकायत, जिसमें उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग में इस पूरे मामले की शिकायत की थी। उन्होंने २०१५ में दिल्ली उच्च न्यायालय में प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग के खिलाफ मुकदमा भी किया कि ये दोनों सरकारी विभाग उनकी शिकायत पर एनडीटीवी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। उस समय दोनों विभागों ने न्यायालय को बताया कि पूरे मामले पर २०११ से ही जांच चल रही है। उसी जांच की एक कड़ी के तौर पर कंपनी के तमाम ठिकानों पर छापे डाले गए। सनद रहे कि इस पूरी कार्रवाई के दौरान एनडीटीवी के किसी भी आफिस में छापा नहीं डाला गया और चैनल के प्रसारण को भी किसी भी प्रकार बाधा न पहुंचे, इसका पूरा ख्याल रखा गया।

आखिर क्या है मामला!
दूरदर्शन पर एक छोटे से स्लॉट से शुरू हुआ एनडीटीवी कुछ ही वर्षों में देश का ख्यातिनाम मीडिया ग्रुप बन चुका था। २००७ में जबकि चैनल अपने चरम पर था प्रणव रॉय ने चैनल के ७.७३ प्रतिशत अतिरिक्त शेयर खरीदने का मन बनाया। रॉय दम्पति ने यह शेयर ‘जीए ग्लोबल इंवेस्टमेंट्स‘ सेे उस समय की शेयर कीमत ४०० रुपए की अपेक्षा ४३९ रुपए के हिसाब से खरीदे। यह कुछ गलत भी नहीं था। इसके साथ ही भारतीय स्टॉक मार्केट के नियमानुसार ‘ओपेन ऑफर’ के लिए भी मार्ग प्रशस्त हो गया। इसके अनुसार कंपनी के तमाम शेयर होल्डर्स अपने शेयर्स का एक निर्धारित भाग इसी दाम पर रॉय दम्पति को बेच सकते थे।

यहीं से शुरू होता है वह मकड़जाल जिसे रॉय दम्पति ने बुनना शुरू किया और डेढ़ साल के भीतर खुद ही फंसते चले गए। बिकने वाले तमाम शेयरों को खरीदने के क्रम में उन्होंने ‘इंडिया बुल्स फाइनेंसियल सर्विसेज’ से ५०१ करोड़ का कर्ज लिया जो कि आगे चलकर गले का फांस बन गया। अक्टूबर २००८ आते-आते वैश्विक मंदी के दबाव में कंपनी के शेयर की कीमत घटकर १०० रुपए हो गई। इंडिया बुल्स से लिया कर्ज चुकाने के लिए अब आइसीआइसीआइ से ३७५ करोड़ का कर्ज लेना पड़ा जिसके एवज में उन्हें अपने शेयर गिरवी रखने पड़े जो कि कुल मिलाकर ६१.४५ प्रतिशत बनता था।

फिर तो कर्ज लेने का सिलसिला चल पड़ा। अपने नवीनतम कर्जे को चुकाने के लिए ‘वीसीपीएल’ से ३५० करोड़ का कर्ज लिया। यह कंपनी मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज की है । बदले में रॉय दम्पति को अपनी व्यक्तिगत हिस्सेदारी के शेयरों का एक बड़ा हिस्सा, १३० रुपए के बाजार मूल्य की बजाय ४ रुपए में देने पड़ा। उनके इस कदम की वजह से आरआरपीआर की हिस्सेदारी १५ फीसदी से बढ़कर पहले २६ और बाद में २९ प्रतिशत हो गई। बाद में इस हिस्से का नियंत्रण वीसीपीएल को दे दिया गया। वीसीपीएल से प्राप्त ३५० करोड़ रुपए आइसीआइसीआइ को देकर ३७५ करोड़ के ऋण और ब्याज पर ‘नो ड्यूज’ ले लिया गया जिससे बैंक को ४८ करोड़ का नुकसान हुआ।

कुछ समय बाद वीसीपीएल ने ५३.८५ करोड़ और दिए जिसे इक्विटी में बदलकर वीसीपीएल की हिस्सेदारी ९९.९ फीसदी कर दी गई। यह पैसा ‘शिनानो रिटेल‘ से उधार लिया गया था, जो कि एक बोगस कंपनी है जिसने एनडीटीवी को कर्ज देने के अलावा कभी कोई और लेन-देन नहीं किया। साल २०१२ में इस पूरे मामले में एक रोचक मोड़ आया जब ‘शिनानो रिटेल’ ने अपने खाते में यह दर्शाया कि ४०३.८५ करोड़ का कर्ज, जो कि उसने वीसीपीएल को दिया था, वापस मिल गया।

अर्थात् रॉय दम्पति द्वारा लिया गया कर्ज रिलायंस के पास वापस आ चुका था; लेकिन आरआरपीआर के अकाउंट में अभी भी वीसीपीएल का ४०३.८५ करोड़ का कर्ज बकाया था। २०१२ में ही महेंद्र नाहटा के ‘एमिनेंट नेटवर्क्स’ द्वारा ५० करोड़ में वीसीपीएल के अधिकार खरीद लिए गए। महज ५० करोड़ में ४०३.८५ के कर्ज का पूरा अधिकार कैसे दे दिया गया, यह तथ्य भी अभी तक अनसुलझा है। साथ ही वीसीपीएल से लिए गए कर्ज की जानकारी सेबी व सूचना और प्रसारण मंत्रालय को भी नहीं दी गई जबकि ऐसा करना आवश्यक था। कुछ मामले विदेशी निवेश लेने के भी हैं जिन पर प्रवर्तन निदेशालय जांच कर रहा है।

संबंधित दोषी व्यक्ति भले ही गला फाड़कर चिल्लाए और अपने निर्दोष होने की दुहाई दे पर इतना तो तय है कि देश की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चमक-दमक के पीछे की दुनिया कितनी काली है। यह क्षेत्र पूरी तरह से पूंजीपतियों के हाथ का खिलौना बन चुका है। जी समूह या स्टार समूह जैसे उन चंद चैनलों को छोड़ दिया जाए, जिनके पास आय के अन्य साधन जैसे कि इंटरटेनमेंट चैनल या अन्य उद्योगों का सहारा है, तो ज्यादातर चैनल किसी न किसी उद्योगपति या काला धन की गोद में बैठे हुए हैं। कुछ चैनलों में तो भरपूर विदेशी निवेश की भी आशंका व्यक्त की जाती है।

सरकार द्वारा यह भी सुनिश्चित किया जाना अत्यावश्यक है कि देश के तमाम चैनल अपना वार्षिक आय विवरण और आय के सभी स्रोतों की पूरी जानकारी दें। साथ ही इस बात पर भी जोर दिया जाना चाहिए कि राष्ट्रधर्म के साथ किसी तरह का समझौता न हो। बहुत सारे चैनल मोदी और भाजपा विरोध की अंधी दौड़ में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने लगते हैं, जो कि देश की संप्रभुता के लिए खतरनाक है। इन पर रोक लगनी चाहिए। मीडिया की स्वतंत्रता आवश्यक है, पर वह देश की अस्मिता, सुरक्षा और सम्मान के प्रति सजग हो। ऐसा तभी हो पाएगा जब मीडिया संस्थानों पर देशी प्रभाव हो। साथ ही राष्ट्र के सम्मान के प्रति सजगता का भाव भी हो।

इस संक्रमण काल में प्रिंट मीडिया की कमजोरी ही उसका सबसे बड़ा हथियार बनी हुई है। चैनलों का प्रसारण राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होता है। इसलिए हर उद्योगपति को लगता है कि इस पर निवेश का फायदा देशव्यापी होगा जबकि ज्यादातर समाचार पत्र किसी क्षेत्र विशेष तक ही सीमित होते हैं। इसीलिए कुछेक अखबारों को छोड़ दें तो ज्यादातर समाचार पत्र समूह इन भयानक निवेशों से मुक्त हैं। तभी राजस्थान का एक बड़ा समाचार समूह अंबानी के खिलाफ खड़ा हो जाता है जबकि किसी चैनल के लिए यह असंभव है।

आतंकवाद, माओवाद और मानवता विरोधी गतिविधियों से जूझ रहे वर्तमान में किसी भी सरकार के लिए राष्ट्र को विकास पथ पर ले जाने के लिए समाज, मीडिया और युवाजन का भरपूर सहयोग जरूरी है। देश के युवा संवेदनशील तो हैं पर उनकी शक्ति को बांटने के लिए भाषा, जाति और समुदाय की दीवार पैदा की जा रही है, जो कि एक खतरनाक संदेश है। सूचना की शक्ति और उसके सशक्त प्रयोग ने एक आभासी दुनिया का मायाजाल रच रखा है जिसमें हथियारों की अपेक्षा विचारों की शक्ति ज्यादा कारगर है। इसलिए पारंपरिक मीडिया और मीडिया के नए स्वरूपों को समाज व देश की अस्मिता के पक्ष में खड़ा होना पड़ेगा। वरना बहुत देर हो जाएगी। मीडिया संस्थान जब तक स्वयं आत्ममंथन नहीं करेंगे तब तक वे चाहकर भी जाने अनजाने में ऐसी भूलें करते रहेंगे जो कि राष्ट्र को क्षति पहुंचाएगा।

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