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पृथ्वी पर अपना स्पेस बचाने के लिए और दूसरे का स्पेस छीनने के लिए प्रजातियां सदियों से लड़ती रही हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। इंसान और हाथी के बीच चल रही इस लड़ाई ने पिछले तीन सालों में 1713 इंसानों और 373 हाथियों की जान ले ली है। यह लड़ाई कितनी भयानक हो चुकी है, यह इसकी सिर्फ एक बानगी भर है।
तादाद में ही प्रजातियों की सबसे बड़ी सुरक्षा छिपी हुई है। यानी जिस प्रजाति की संख्या जितनी कम होगी, उसके हारने और विलुप्त होने का खतरा उतना ही ज्यादा होगा। जिस प्रजाति की संख्या जितनी ज्यादा होगी, उसके जीवित बचे रहने यानी सर्वाइव करने की संभावना भी उतनी ही ज्यादा होगी। इस हिसाब से देखें तो भारत में 27 हजार के लगभग हाथी रहते हैं। जबकि, इंसानों की संख्या सवा अरब के लगभग है। तादाद यहां पर सारे फैसले खुद कर देती है।

हाथी कभी भारत के ज्यादातर भू-भाग पर स्वतंत्र विचरण किया करते थे। भारतीय संस्कृति में गजराज को बहुत सम्मान भी दिया जाता रहा है। उनकी पूजा की जाती है। कई सारे धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में पालतू हाथी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन,जंगलों में रहने वाले गजराज आज बेहद गुस्से में है। उनका जंगल उनसे छीना जा रहा है। जिन रास्तों से वे गुजरते थे, उन रास्तों पर बिजली के तार दौड़ा दिए जा रहे हैं। भूखे हाथी अपना खाना ढूंढने के लिए परेशान हैं। वे कहां जाएं। अपने बच्चों को कहां बड़ा करें। हाथियों की सूंघने की शक्ति बहुत तेज होती है। कई किलोमीटर की दूरी से भी वे खाने को सूंघ लेते हैं। एक तरफ तो जंगल में खाना कम हो रहा है, दूसरी तरफ इंसानी बस्तियों से खाने की गंध आ रही है। 

खाने की तलाश में वे अक्सर ही इंसानी बस्तियों में आ जाते हैं। उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं है कि ये गन्ने के खेत या केले के बाग किसी की निजी संपत्ति है। निजी संपत्ति के कांसेप्ट से वे सर्वथा अंजान है। उन्हें तो यह पता है कि प्रकृति में जो कुछ भी है, वह सबके लिए है। वे उसे ले लेते हैं। उसे खा लेते हैं। जो उनके रास्ते में आता है, उन्हें रोकने की कोशिश करता है, उसे इसका फल भी भुगतना पड़ता है।

हाल ही में संसद में पूछे गए एक सवाल पर केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. महेश शर्मा द्वारा दिए गए जवाब से इंसान और गजराज के बीच चल रहे इस भीषण संघर्ष की तरफ इशारा मिलता है। बीते तीन सालों में 1713 इंसान और 373 हाथियों की जान इस संघर्ष की भेंट चढ़ गई। सबसे ज्यादा हाथी तार में बिजली का करंट दौड़ाकर मार दिए गए। तीन सालों में कुल 226 हाथी बिजली के करेंट से, 62 हाथी ट्रेन दुर्घटना में, 59 हाथी शिकारियों द्वारा और 26 हाथी जहर देकर मार दिए गए।

सरकार द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक इस झगड़े में वर्ष 2015-16 में 469 इंसान और 104 हाथियों की मौत हुई। जबकि, वर्ष 2016-17 में 516 इंसान व 89 हाथी, वर्ष 2017-18 में 501 इंसान व 105 हाथी, वर्ष 2018-19 में 227 इंसान और 75 हाथी मारे गए। ये आंकड़े 31 दिसंबर 2018 तक के हैं। सरकार के मुताबिक इंसान और हाथी की लड़ाई में सबसे ज्यादा लोग पश्चिम बंगाल और ओडीशा में मारे जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में बीते तीन सालों में 307 और ओडीशा में 305 लोगों की मौत हो चुकी है।

भारत के जंगलों में छिड़ी यह लड़ाई किस कदर घातक हो गई है, इन कुछ आंकड़ों से समझा जा सकता है। जबकि, अगर प्रजातियों की लड़ाई में तादाद की भूमिका को निर्णायक माना जाए तो सीधे ही कहा जा सकता है कि इंसानों का पलड़ा बहुत ज्यादा भारी है। हम जो इस धरती को अपने हिसाब से बदल रहे हैं, उन्हें जरूर इसमें अन्य प्रजातियों के लिए भी स्पेस को बचाए और बनाए रखना चाहिए। आखिर गजराज को अपना जंगल और एक जंगल से दूसरे जंगल में जाने के लिए रास्ता ही तो चाहिए।

 

This Post Has One Comment

  1. बहुत ही सुंदर इस लेख से ज्ञान मिला

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