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बात सन 1968 की है। पूजनीय गुरूजी सभी स्वयंसेवक बन्धुओं के साथ बैठकर भोजन कर रहे थे। एक स्वयंसेवक जो घी परोस रहा था, उस ने गुरूजी की कटोरी में दो चम्मच घी डाल दिया। यह बात गुरूजी की दिव्य दृष्टि से छुपी न रह सकी। उन्होंने उस स्वयंसेवक को बुलाया जो घी बांटते-बांटते आगे निकल गया था।

पास आने पर गुरूजी ने उससे पूछा कि तुमने इस कटोरी में घी कितने चम्मच डाला था। उसने कहा दो चम्मच। गुरूजी ने पूछा कि स्वयंसेवकों को कितने चम्मच घी दिया जा रहा है। उसने कहा कि एक चम्मच। गुरूजी ने उसे प्रेम से डांटते हुए कहा कि यह पक्षपात क्यों? क्या मैं तुम्हें इन सब लोगों से अलग दिखाई दे रहा हूं। मेरी भी कटोरी में एक ही चम्मच घी डालना था। उस स्वयं सेवक को दूसरी कटोरी लानी पड़ी। उसमें एक चम्मच घी डाल कर गुरुजी को दिया गया। तब गुरूजी ने उसे स्वीकार किया। वह स्वयंसेवक भी बहुत लज्जित हुआ।

संघ की विशेषता इसी में है कि साधारण स्वयंसेवक से ले कर सरसंघचालक के साथ तक एक सा व्यवहार हो। इसीलिए प्रत्येक स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक से नि:संकोच वार्ता कर सकता है। अन्यत्र यह बात दिखाई नहीं देती।

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  1. मा.गुरुजी से सामान्य संघ स्वयंसेवक, जैसा व्यवहार शिक्षा लेने जैसा था।

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