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भारतीय संस्कृति  के मूल में पर्व हैं . इन पर्वों में कुंभ श्रेष्ठ है। कुंभ सनातन संस्कृति के वैभव, त्याग, संपन्नता और संस्कार का प्रतीक है । तीर्थराज प्रयाग का कुंभ अनंत पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है । मान्यता है कि, प्रयाग में स्नान- दान करने से मनुष्य भारी से भारी विपत्तियों से भी मुक्त हो जाता है , जबकि तीर्थों में  उसके समस्त पापों का नाश होता है ।
अथर्ववेद के 14 वें अध्याय के चौथे विभाग के सातवें सूत्र के अनुसार– संयम, नियम पर आधारित इस मानस तीर्थ का विशेष महत्व है । दान, यज्ञ, तप, शौच, तीर्थ-सेवा ,शास्त्र , श्रवण भी तीर्थ की श्रेणी में आते हैं ।संत -महात्मा चलते-फिरते तीर्थ हैं ।
माघ मास में प्रयाग के स्नान पर्व पर सभी तीर्थों का आगमन होता है । प्रयाग में किए गए स्नान- दान, सत्कर्म ,यज्ञादि का कभी समाप्त नहीं होते । आदिकाल से यह कुंभ भारतवर्ष की धार्मिक और सांस्कृतिक एकता को बनाए रखने में सहायक रहा है । कुंभ पर्व ,

पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण न केवल भारतवर्ष को,अपितु संपूर्ण पृथ्वी मंडल को एक नीड़ में स्थापित कर देता है ।
सभी को एक सांस्कृतिक सूत्र में बांधने के लिए कुंभ महापर्व भारत देश में उपस्थित होता है। यह विश्व का सर्वश्रेष्ठ धार्मिक आयोजन है ।

कुंभ (कलश) को मंगल का प्रतीक माना गया है। इसीलिए प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा, यज्ञ ,धार्मिक कृत्यों में जलपूर्ण कलश स्थापित किया जाता है । उसी में जलाधिष्ठाता देव वरुण का पूजन होता है ।
आत्मतत्व का बोध कराने के लिए कुंभ पर्व का आयोजन होता है। आत्मा का आधार ज्ञान है .ज्ञान से ही मुक्ति संभव है .यही कुंभ पर्व की सार्थकता है.

“आनंद” प्राप्ति  सबकी अभिलाषा होती है। भारत  में उत्तर प्रदेश का प्रयागराज ‘आनंदनगर’ है। यहां अमृत रस से भरा कुंभ घट छलकता है। जाति- पंथ ,क्षेत्र सभी विभेदों से पृथक विराट समागम है ।सारी दुनिया के आनंद अभीप्सु, जिज्ञासु, आस्तिक और नास्तिक कुंभ में है ।तमाम भाषा, बोली, वेश, देश और भिन्न भिन्न उपासना वाले संत- साधु और स्त्री -पुरुष सभी इसमें आते हैं । लगभग सौ देशों के महानुभाव कुंभ का हिस्सा बनते हैं।

पंडित जवाहरलाल नेहरू भी कुंभ दर्शन पर आश्चर्यचकित थे। उन्होंने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखा कि –‘वास्तव में यह समग्र भारत था ।कैसा आश्चर्यजनक विश्वास जो हजारों वर्षों से इनको, इनके पूर्वजों को देश के कोने-कोने से खींच लाता है ।
प्रयाग यज्ञ साधना और आत्म दर्शन की तपोभूमि रही है. गंगा- यमुना- सरस्वती नदियां धरती के साथ-साथ भारत  के मन में भी प्रहवमान हैं।

कुंभ का अपना अलग सामाजिक – सांस्कृतिक महत्व है. यहां आने वाले जाति -पंथ सहित सभी विभेद छोड़ कर आते हैं. तीर्थराज में रमते हैं. इनका दार्शनिक महत्व भी है. यहां अध्यात्म दर्शन के विद्वान महानुभाव अपना पक्ष रखते हैं.. और सांस्कृतिक संसद चलती है.

कुंभ में स्नान करने वालों के साथ -साथ ,गंगा- जमुना- सरस्वती के संगम पर कल्पवास करने वाले श्रद्धालुओं की भी बहुत बड़ी संख्या होती है ।  ऋषि मुनियों ने  गृहस्थों के लिए कल्पवास का भी विधान रखा था ।इस दौरान भक्तों को अल्पकाल के लिए शिक्षा और दीक्षा दी जाती थी । कल्पवास का अर्थ है– संगम के तट पर निवास करके वेदाध्ययन और ध्यान करना ।
कपड़े के टेंट या तंबू में एक माह तक प्रकृति के बीच बसे होने का सुखद अनुभव कल्पवासी प्राप्त करते हैं ।इस दौरान वे दिन में एक ही बार भोजन करते हैं। मानसिक रूप से व्यक्ति धैर्य ,अहिंसा और भक्ति जैसे भावों से भर जाता है । कई कल्पवासी दिन में तीन समय सुबह- दोपहर और शाम को स्नान करते हैं । पद्मपुराण में भी कल्पवास का उल्लेख है। इसके अनुसार– संगम तट पर कल्पवास करने वाले को सदाचारी, शांत मन वाला और जितेंद्रिय होना चाहिए .

कल्पवासी के मुख्य कार्य तप, होम और दान है .कल्पवास की शुरुआत के पहले दिन तुलसी और शालिग्राम की स्थापना और पूजा होती है ।कल्पवासी टेंट के बाहर जौ रोपते हैं । कल्पवास समाप्त होने पर तुलसी को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है । और जौ के पौधे वे अपने घर ले जाते हैं । ज्यादातर कल्पवासी जमीन पर ही शयन करते हैं ।इस समय फलाहार, एक समय का आहार अथवा निराहार व्रत का विधान है ।कल्पवास प्रारंभ करने पर 12 वर्ष तक जारी रखने की परंपरा है । कल्पवासी इस अवधि में शैयादान करते हैं। इसमें गृहस्थ की सारी चीजें तीर्थ पुरोहितों को दान दी जाती हैं.

कल्पवास आत्मशुद्धि का प्रयास है । कुंभ में नाना पंथों- विचारों को मानने वाले साधु- संत, गुरु समूह  एकत्र  होते हैं.

सनातन धर्म में जल पवित्रता  द्वारा शरीर की शुद्धि, धर्म -श्रद्धा द्वारा मन की शुद्धि, दान वृत्ति द्वारा धन की शुद्धि, सांस्कृतिक ज्ञान से बुद्धि की शुद्धि और इन्हीं सारी शक्तियों के जरिए वासना को प्रार्थना बना कर परम सिद्धि की सिद्धि संभव बताई गयी  है और यही कुंभ मेले का निहितार्थ होता है।
जीवन में सत्य, शिव और सौंदर्य का प्रकट दर्शन कुंभ द्वारा ही संभव है।

 

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