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मनप्रीत ने सातवीं मंजिल से छलांग लगाने के पूर्व अपने मित्रों को संदेश भेजा कि जल्दी ही आप लोगों के पास मेरी केवल एक ही बात शेष रहने वाली है और वह होगी मेरी फोटो। १४ वर्ष के मनप्रीत ने अपने दोस्तों को बताया था कि वह ‘ब्लू व्हेल गेम’ खेला करता है। मुंबई के अंधेरी में रहने वाले मनप्रीत ने सातवीं मंजिल से छलांग लगाने के पूर्व सोशल मीडिया पर लिखा कि वह इस दुनिया से विदा होने जा रहा है। व्हाट्सएप पर अपने को ही श्रद्धांजलि अर्पित करने वाला शोक संदेश भी उसने अपने दोस्तों को भेजा और बाद में मौत को गले लगा लिया। वह तो इस दुनिया से चला गया, लेकिन अपने परिवार, समाज एवं देश के समक्ष एक बड़ा प्रश्नचिह्न उपस्थित कर गया है।

बच्चों को अच्छे-बुरे का अंदाजा आने के पूर्व ही मोबाइल का खिलौना उनके हाथ में आ जाता है और बच्चे उसके लती बन जाते हैं। मां और पिता अपने कामकाज में व्यस्त होते हैं। इससे बच्चे क्या कर रहे हैं इस ओर किसी का ध्यान नहीं होता। और, जब यह पता चलता है तब तक काफी देर हो चुकी होती है। सोशल मीडिया के जरिए बच्चे इस गेम के जाल में फंस जाते हैं। यह गेम सनसनीपूर्ण एवं साहसपूर्ण बातें करने की चुनौती देकर बच्चों को उकसाता हैै। पचास चरणों वाले इस गेम में हर चरण पर एक चुनौती दी जाती है। हर चरण की उन चुनौतियों को पूरा करने के बाद हाथ पर एक-एक निशान बनाना होता है। इसका अंतिम चरण मौत को गले लगाना है। इस गेम में फंस कर अनेक युवक/युवतियों द्वारा आत्महत्या की जाने की घटनाएं सारी दुनिया में सामने आ रही हैं। किसी मोबाइल गेम से जान जा सकती है यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण जरूर लग सकती है, लेकिन यही आज की वास्तविकता है। केवल ‘ब्लू व्हेल गेम’ ही नहीं अपितु कई अन्य जानलेवा गेम के चक्रव्यूह में बच्चे अटक गए हैं। ‘पोकोमैन गो’ नामक खेल में पोकोमैन को खोजने के लिए कहीं भी भटकने वाले और दुर्घटना के शिकार हुए बच्चों की असंख्य घटनाएं सामने आ रही हैं। ‘वैम्पायर बॅटिंग’ (रक्तचूषक पिशाच) भी एक भीषण खेल है। यह एक ऐसे पिशाच की कल्पना है जो मनुष्य का रक्त पीता है। ‘बॅट’ याने चमगादड़ होता है। याने चमगादड़ जैसा रात में उड़ने वाला रक्तपिपासू पिशाच! यह गेम इस तरह बनाया गया है कि इसे खेलने वाला वैम्पायर जैसा बर्ताव करें। यह भले ही अविश्वसनीय लगे, परंतु ऐसा हो रहा है यह सच है।

वर्तमान में छोटी उम्र में ही बच्चों को गैजेट्स, सोशल मीडिया की जानकारी हो जाती है। इससे वे लगातार सोशल मीडिया से जूझे रहते हैं। उनके हिसाब से यह बात कोई खास महत्व नहीं रखती। आखिर छोटे बच्चे ‘वीडियो गेम’ में इतनी रुचि क्यों ले रहे हैं? इसका सरल जवाब है, बच्चों के हिस्से में आने वाला अकेलापन! दौड़भाग की जिंदगी और भौतिक सुख-सुविधाओं के मोह में आज प्रत्येक अभिभावक दिनरात काम में जुटा होता है और बच्चों का ‘अकेलापन’ दूर करने के लिए हम ही उनके हाथ में ‘वीडियो गेम’ थमा देते हैं, मोबाइल दे देते हैं। असल में बचपन के संस्कार ही जीवनभर मानवी संवेदनाओं को सहेजते हैं। लेकिन वर्तमान में सच यही है कि बच्चों और परिवार तथा समाज के बीच संवाद निर्माण करने वाले माध्यमों का ही अभाव निर्माण हो गया है। यही नहीं, सोशल मीडिया, इंटरनेट, वीडियो गेम जैसे संवाद के तकनीकी माध्यम बच्चों के मन में द्वंद्व निर्माण कर रहे हैं। बच्चे लगातार फंतासी की दुनिया में उलझते जा रहे हैं। परिणाम यह है कि फेसबुक, व्हाट्सएप पर अधिकाधिक ‘लाइक्स’ पाने की इच्छा अधिकाधिक तीव्र होती जाती है। इससे वास्तविक दुनिया में मिलने वाली असफलता, पराजय को सहन करने की क्षमता घटती जाती है। इससे बच्चों में नैराश्य के भाव तेजी से पनपते हैं। इस द्वंद्व के तनाव से निर्माण होने वाले तनावों को दूर करने के लिए वे विभिन्न तरह के हिंसक एवं आक्रामक गेम खेलने लगते हैं। ये खतरनाक गेम उनके व्यक्तित्व पर दीर्घकालीन और हानिकारक प्रभाव छोड़ते हैं। ये वीडियो गेम धीरे-धीरे लत का रूप ले लेते हैं और इसे खेलने वाले को इसका पता तक नहीं चलता। बच्चों के लिए ये वीडियो गेम बेहद खतरनाक होते जा रहे हैं। इसे ‘सायबर सायकॉलॉजी’ कहा जा सकता है। देश के कई बड़े शहरों में ‘सोशल मीडिया एडिक्शन क्लीनिक’ शुरू हो चुके हैं। इन चिकित्सालयों में सैंकड़ों अभिभावक अपने बच्चों की चिकित्सा करा रहे हैं।

लगभग सभी वीडियो गेम्स में नायक गोलीबारी एवं भीषण मारकाट करता है। अपने रास्ते में आने वाले हरेक को वह हिंसा के रास्ते से ही दूर करता है। ऐसे हिंसक दृश्यों से बच्चों के मन में क्रोध और हिंसा की प्रवृत्ति निर्माण होती है। वीडिया गेम खेलते समय बच्चों की भावनाएं और मानसिक बर्ताव भी हिंसक गेम की तरह ही होता जाता है।

फिलीप वुडकीन ने ‘ब्लू व्हेल गेम’ गेम बनाया है। वुडकीन का इस बारे में कहना है कि, ‘‘मैं उन लोगों को आत्महत्या के लिए प्रवृत्त करता हूं जो अपने जीवन की परवाह नहीं करते। वे एक तरह के ‘जैविक कूड़ा’ ही हैं। इस गेम के जरिए इस कचरे को दुनिया से बाहर फेंकने की मैंने तजवीज की है।’’ यहां मूल मुद्दे को समझना होगा। प्रश्न इस विकृत मनोवृत्ति के विचारों का नहीं है, प्रश्न यह है कि व्यक्ति और समाज के बीच परस्पर संवाद निर्माण करने वाले अपने ‘आदर्श’ क्यों खोते जा रहे हैं? फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर जैसे माध्यमों के मुकाबले हमारे मन को प्रसन्न करने वाले सामाजिक-पारिवारिक संवाद जीवन से दूर क्यों होते जा रहे हैं? घर के बड़ों से कहानियां सुनने वाला बालमन अब सोशल मीडिया के काल्पनिक समाज के साथ बढ़ रहा है। परिवार के बड़े लोग, जो परिवार में कभी सांस्कृतिक मूल्य रोपित किया करते थे, इस सोशल मीडिया के जाल से बचे नहीं हैं। मैदानी खेलों के बारे में हमारे परिवार या हमारी सरकार की कोई नीति नहीं है। मोबाइल अब महज किसी उपकरण जैसी वस्तु नहीं रह गया है। अपने हाथ-पांव-नाक जिस तरह हमारे साथ होते हैं उसी तरह मोबाइल भी सहजता से हमारे उपयोग में आ रहे हैं। जिस मोबाइल ने हमें इस विशाल विश्व से जोड़ दिया है, उसी ने हमें ‘आईएडी’ अर्थात इंटरनेट एडिक्शन डिसऑर्डर की मानसिक बीमारी तक पहुंचा दिया है। इससे दुनियाभर के मनोविज्ञानियों एवं मनोचिकित्सकों के समक्ष एक चुनौती पैदा हुई है कि आखिर इससे किस तरह निजात पाई जाए?

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