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किसानों की समस्या को दूर करने एवं कृषि से जुड़ी परेशानियों को कम करने के लिए केंद्रीय बजट 2019-20 में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि बनाने की घोषणा की गई है, जिसके तहत छोटे और सीमांत किसानों को एक सुनिश्चित आय सहायता के रूप में दी जाएगी। इस योजना के तहत 2 हेक्टेयर तक की खेती योग्य भूमि वाले कमजोर भूमिधारी किसान परिवारों को प्रति वर्ष 6,000 रुपये की दर से प्रत्यक्ष आय सहायता प्रदान की जाएगी, जिसे तीन समान किश्तों में लाभार्थी किसानों के बैंक खातों में जमा किया जाएगा। इसे 1 दिसम्बर 2018 से लागू किया जाएगा और 31 मार्च 2019 तक की पहली किस्त का भुगतान इसी वर्ष के दौरान किया जाएगा, जिसके लिए सरकार ने वित्त वर्ष 2018 के संशोधित अनुमान में 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किया है। पहली किस्त प्राप्त करने के लिए आधार संख्या की आवश्यकता नहीं है, लेकिन दूसरी किस्त का लाभ लेने के लिए किसानों को आधार संख्या देना होगा। गौरतलब है कि भारत दुनिया का पहला देश है, जो 12 करोड़ से अधिक किसानों को इस प्रकार की प्रत्यक्ष आय हस्तांतरण प्रदान करने जा रहा है, जो दुनिया के दूसरे देशों में ऐसी नकद हस्तांतरण योजना को लागू करने वाले लाभार्थियों की औसत संख्या से 40,000 गुना अधिक है। प्रधानमंत्री किसान योजना के तहत दी जाने वाली सहायता राशि महज 7 यूएस डॉलर प्रति माह है, जो अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है।

निश्चित आय सहायता योजना का इतिहास

भारत में निश्चित आय समर्थन योजना को सार्वभौमिक बुनियादी आय की संकल्पना से जोड़ कर देखा जाता रहा है, जिसका आगाज 18हवीं शताब्दी में गरीबी दूर करने के लिए किया गया था। इसे समाज में मौजूद असमानता को दूर करने वाले उपाय के रूप में भी देखा गया है। 18हवीं शताब्दी को उद्योगीकीकरण का काल माना जाता है। इस सदी में कल-कारखानों की शुरुआत हुई और पूंजीवाद की संकल्पना तेजी से विस्तार पाने लगी। वित्त वर्ष 2016-17 के आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट को 31 जनवरी, 2017 में प्रकाशित किया गया, जिसमें सार्वभौमिक बुनियादी आय की संकल्पना पर 40 पन्नों में विस्तार से चर्चा की गई, जिसमें इसे गरीबी दूर करने और असमानता कम करने के उपाय के रूप में देखा गया। भारत में इस संकल्पना के तहत सभी नागरिकों को एक निश्चित राशि देने का प्रस्ताव किया गया है, ताकि सभी अपना जीवनयापन कर सकें।

श्री स्टैंडिंग और प्रणव कुमार वर्धन जैसे अर्थशास्त्रियों ने इस संकल्पना का समर्थन यह कह कर किया है कि भारत जैसे भ्रष्ट और सामाजिक रूप से पिछड़े देश में सभी नागरिकों को उनके जीवनयापन के लिए एक निश्चित राशि दी जानी जरूरी है।

लाभान्वित किसानों की संख्या

लगभग 12 करोड़ छोटे और सीमांत किसान परिवारों को इससे लाभ होने की उम्मीद है। वित्त वर्ष 2019-20 में इस मद में 75,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इस योजना को अन्य योजनाओं से बेहतर माना जा सकता है, क्योंकि 6000 रूपये की वित्तीय सहायता छोटे और सीमांत किसानों के खातों में नकद दी जाएगी। चूंकि, यह सहायता नकद हस्तांतरित की जाएगी, इसलिए यह मूल्य संकट की स्थिति से अधिक सुरक्षित है।

दूसरी योजनाओं से तुलना

देखा जाए तो यह योजना रैयत बंधु योजना से थोड़ी कमतर है, लेकिन ओडिशा की कालिया योजना के समकक्ष है। कालिया योजना के तहत सीमांत और छोटे किसानों को व्यक्तिगत रूप से वित्तीय सहायता दी जाती है, जिसकी लागत रैयत बंधु और प्रधानमंत्री किसान योजना से काफी कम है।

लाभार्थी की पहचान करने की चुनौती 

इस योजना से जुड़ी चुनौतियों में से सबसे बड़ी लाभार्थियों की पहचान करना है, क्योंकि प्रस्तावित योजना के अंतर्गत बटाईदार या पट्टेदार एवं भूमिहीन मजदूरों को लाभ नहीं दिया जाएगा। जरूरतमंद किसानों को ही केवल इस योजना का लाभ मिले इसके लिए अनेक तथाकथित मलाईदार किसानों की छंटनी करने का प्रस्ताव है, लेकिन ऐसे मलाईदार किसानों को लाभ से वंचित करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। इस प्रक्रिया को अमली जामा पहनाने में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। अपात्र व्यक्ति भी इस योजना का लाभ लेने में सफल हो सकते हैं। दूसरा, भूमि रिकॉर्ड का 100% डिजिटलाइजेशन कई राज्यों जैसे झारखंड, बिहार, गुजरात, केरल, तमिलनाडु आदि राज्यों में अभी भी होना बाकी है।

किन्हें मिलेगा लाभ

इस योजना का लाभ उन छोटे एवं सीमांत किसान परिवारों को मिलेगा, जिनमें पति, पत्नी और नाबालिग बच्चे शामिल हैं और उनके पास भूमि रिकॉर्ड के अनुसार सामूहिक रूप से खेती योग्य दो हेक्टेयर अथवा इससे कम भूमि है। सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देश में यह भी बताया गया है कि भूमि सीमा की शर्त को पूरा करने के बावजूद कुछ श्रेणी के लोगों को इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा। उदाहरण के तौर पर आयकर देने वाले परिवारों, सेवारत या सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों, मौजूदा या पूर्व सांसदों, विधायकों और मंत्रियों को इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा। पेशेवर निकायों के पास पंजीकृत चिकित्सक, इंजीनियर, वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट एवं वास्तुकार तथा उनके परिवार के लोगों को भी इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा। पिछले आकलन वर्ष में आयकर देने वालों को भी इस योजना के तहत लाभ देने का प्रावधान नहीं है।

स्थानीय निकायों के नियमित कर्मचारियों, जिसमें समूह घ के कर्मचारी शामिल नहीं हैं, को भी इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे सभी सेवानिवृत्त कर्मचारी या पेंशनभोगी, जिनकी मासिक पेंशन 10,000 रुपये या उससे अधिक है को भी इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा। हालांकि, इसमें समूह घ के कर्मचारी शामिल नहीं हैं। संस्थागत भूमि मालिकों को भी लाभार्थियों की सूची में शामिल नहीं किया गया है। यदि किसी किसान परिवार के एक या अधिक सदस्य किसी संस्थागत पद पर पूर्व में या वर्तमान में कार्यरत, मौजूदा या पूर्व मंत्री, राज्य मंत्री, लोकसभा या राज्यसभा, विधान सभा या विधान परिषद के पूर्व या मौजूदा सदस्य, नगर निगमों के पूर्व या मौजूदा मेयर और जिला पंचायतों के मौजूदा या पूर्व चेयरपर्सन रहे हों तो उन्हें भी इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा।

ऐसी योजना के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य

आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) के अनुसार किसी भी देश ने निश्चित आय समर्थन योजना को कामकाजी उम्र के लोगों के लिए आय समर्थन का एक प्रमुख स्तंभ नहीं माना है। लेकिन कई देशों में कुल आबादी के एक छोटे से भाग पर इस संकल्पना को आजमाया गया है। अमेरिका और ईरान का नाम इस संदर्भ में लिया जा सकता है। अमेरिका का अलास्का स्थायी कोष एक निवेश कोष है, जिसका निर्माण तेल राजस्व की मदद से किया गया है। वर्ष 1982 से इस निधि से अलास्का के प्रत्येक व्यक्ति को वार्षिक लाभांश का भुगतान किया जा रहा है। इसी तरह का एक प्रयोग वर्ष 2011 में ईरान में किया गया था। इसके तहत औसत दर्जे की घरेलू आय के 29% को हर माह जरूतमंदों को हस्तांतरित किया गया। इसी तरह की योजना को लागू करने की घोषणा कनाडा, फिनलैंड और नीदरलैंड में भी की गई है। भारत, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, न्यूजीलैंड, नामीबिया, स्कॉटलैंड और जर्मनी में भी ऐसी योजना को लागू करने के लिए प्रयास किये जाते रहे हैं।

फायदे

इसमें दो राय नहीं है कि खातों में नकद हस्तांतरण सशर्त या बिना शर्त घरों की आय बढ़ाता है। इस संकल्पना के समर्थकों का मानना है कि इस उपाय की मदद से व्यापक स्तर पर लोगों का कल्याण किया जा सकता है। वर्ष 2015 में बनर्जी, हन्ना, क्रेन्डलर और ओल्केन ने 6 विकासशील देशों, होंडुरास, मोरक्को, मैक्सिको, फिलीपींस, इंडोनेशिया और निकारागुआ में श्रम की आपूर्ति पर सरकारी नकदी हस्तांतरण योजनाओं के प्रभाव का अध्ययन किया था और अपने अध्ययन में उन्होंने नकद हस्तांतरण के प्रावधान से पुरुषों या महिलाओं की श्रम आपूर्ति, चाहे वह घर में हो या बाहर, में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं पाई थी।

कई देश हैं, जिन्होंने इस तरह से जरूरतमंदों को वित्तीय सहायता देने की कोशिश की, लेकिन पाया कि इस तरह की योजना को चलाने से वैसे कारकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, जिसकी वजह से असमानताएं बढ़ती हैं। हालांकि, इस योजना का सकारात्मक पक्ष यह भी है कि इसकी मदद से वंचित तबकों का आर्थिक एवं सामाजिक रूप से उन्नयन करने के साथ-साथ मौजूदा सब्सिडी या अन्य सरकारी योजनाओं को लागू करने के दौरान बिचौलिये, भ्रष्टाचार आदि पर भी लगाम लगेगा, जिससे सरकारी निधि की बंदरबाँट की संभावना कम होगी। इस योजना से जुड़ कर किसानों को सीधे तौर पर लाभ मिल सकेगा। इस योजना की वजह से लोग बैंक से जुड़ने के लिए भी प्रेरित होंगे, जिससे वित्तीय समावेशन की संकल्पना को साकार करने में आसानी होगी साथ ही साथ आम लोगों को बैंक से कर्ज भी मिल सकेगा, जिससे मांग एवं आपूर्ति के प्रवाह में तेजी आएगी और विकास को बल मिलेगा।

भारतीय नीति-निर्माताओं ने निश्चित आय समर्थन योजना के प्रभाव को समझने के लिए मध्यप्रदेश और दिल्ली में दो अध्ययन किए हैं। पहला अध्ययन दिल्ली में स्व नियोजित महिला समिति (सेवा) के साथ मिल कर वर्ष 2011 में जनवरी से दिसम्बर तक किया गया, जबकि मध्यप्रदेश सरकार ने सेवा के साथ मिल कर एक नियंत्रित अध्ययन किया। इन दोनों अध्ययनों के तहत 100 परिवारों को हर महीने 1000 रूपये दिए गए। परिणाम के तौर पर यह देखा गया कि लाभान्वित परिवार ने महिला सदस्य के नाम से बैंक में सहायता राशि को जमा करा दिया, जिसका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर किया गया। गौरतलब है कि सेवा गरीबी और असमानता को कम करने वाली संस्था के रूप में एक लंबे समय से सक्रिय है।

नुकसान

इस आलोक में एक धारणा यह है कि मुफ्त पैसा लोगों को आलसी बनाता है और लाभार्थी काम करने से परहेज करने लगते हैं अर्थात श्रम आपूर्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस संबंध में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि मुफ्त में पैसा मिलने से जो किसान कार्य कर रहे हैं वे भी काम करने से परहेज करने लगेंगे, जिससे खेती-किसानी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। मुफ्त का पैसा मिलने से लोगों के बीच फिजूलखर्ची की आदत भी विकसित होगी। घर के पुरुष सदस्यों में नशे और जुआ खेलने की प्रवृति पनप सकती है, क्योंकि हमारे देश में अभी भी ज्यादा संख्या में पुरुष ही बैंक से जुड़े हुए हैं।

इस योजना को लागू करने से बैंकों पर काम का दबाव बढ़ेगा। भारतीय बैंकिंग क्षेत्र पहले से ही मानव संसाधन की कमी का सामना कर रहा है। इससे बैंकों के सर्वर पर भी दबाव बढ़ेगा, जिसे अद्यतन करने एवं नई तकनीक को खरीदने के लिए बैंकों को भारी-भरकम पूंजी की दरकार होगी। एक अनुमान के मुताबिक देश में मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने की लागत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.7 प्रतिशत है, जबकि प्रस्तावित योजना की लागत जीडीपी का 4.9 प्रतिशत होने का अनुमान है। लागत बढ़ने से पूंजी की व्यवस्था करना भारत जैसे विकासशील देश के लिए आसान नहीं होगा।

किसानों के लिए अन्य राहतें

अंतरिम बजट में यह भी घोषणा की गई है कि प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित सभी किसान, जिन्हें राष्ट्रीय आपदा राहत कोष (एनडीआरएफ) से सहायता प्रदान की जाती है, को 2% के ब्याज सबवेंशन का लाभ दिया जाएगा साथ ही साथ पुनर्गठित कर्ज की पूरी अवधि के लिए ब्याज में 3% की अतिरिक्त राहत किस्त एवं ब्याज की त्वरित पुनर्भुगतान प्रोत्साहन के तौर पर दिया जाएगा। वर्तमान में ऐसे प्रभावित किसानों को फसली ऋण को पुनर्गठित करने पर पुनर्गठित ऋण के पहले वर्ष के लिए ही केवल 2% ब्याज सबवेंशन का लाभ मिलता है। पशुपालन और मत्स्य पालन क्षेत्र को सहायता प्रदान करने के लिए सरकार ने चालू वित्त वर्ष में राष्ट्रीय गोकुल मिशन के लिए आवंटन बढ़ा कर 750 करोड़ रुपये कर दिया है। पशुपालन और मत्स्य पालन करने वाले किसानों को भी अब किसान क्रेडिट कार्ड जारी किया जाएगा।

साथ ही, कृषि क्षेत्र की तरह किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से ऋण प्राप्त करने वाले पशुपालन और मत्स्य पालन की गतिविधियों से जुड़े किसानों को भी 2% ब्याज सबवेंशन का लाभ प्रदान किया जाएगा। इसके अलावा, अगर वे समय से कर्ज का पुनर्भुगतान करते हैं तो उन्हें अतिरिक्त 3% ब्याज सबवेंशन का भी लाभ मिलेगा। यह पहल कृषि और संबद्ध गतिविधियों के लिए ऋण प्रवाह को बढ़ाएगी और किसानों पर ब्याज का भार कम होगा, जिससे कृषि गैर निष्पादित आस्तियों (एनपीए) की बढ़ोतरी पर लगाम लगेगा।  सरकार ने मत्स्य पालन के विकास के लिए और इस क्षेत्र को मजबूती प्रदान करने के लिए मत्स्य पालन विभाग बनाने का निर्णय लिया है। वर्तमान में 6.3% वैश्विक उत्पादन के साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है, जिसने हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में औसतन 7% से अधिक की वार्षिक वृद्धि दर्ज की है। यह क्षेत्र प्राथमिक स्तर पर लगभग 1.45 करोड़ लोगों को आजीविका प्रदान करता है।

सरकार ने गाय से जुड़े संसाधनों को बढ़ाने एवं उनके आनुवंशिक उन्नयन को सुनिश्चित करने व उन्हें बढ़ाने और गायों के उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय कामधेनु आयोग को स्थापित करने की घोषणा की है। आयोग गायों के लिए बनाए जाने वाले कानूनों और कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने का काम देखेगा। बीते सालों से दुनिया भर में भारतीय नस्ल की गायों के दूध की गुणवत्ता और पोषण श्रेष्ठता के बारे में जागरूकता बढ़ रही है। भारतीय नस्ल की गायों के दूध की बड़ी मांग को देखते हुए भारत को अपने अनुसंधान कार्यों में सुधार करने एवं दूध का निर्यात बढ़ाने के लिए कोशिश करने की जरूरत है, क्योंकि ऐसे ढेरों अवसर हमारे पास हैं।

भविष्य में सरकार बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन में दूध देने पर भी विचार कर सकती है, जिससे बच्चे के पोषण में सुधार होगा और पूरे भारत में किसानों की आय बढ़ेगी। इस पर 10,000 करोड़ रुपये खर्च होने की उम्मीद है, लेकिन यह किसानों को अतिरिक्त आय के रूप में लगभग 7,000 रुपये प्रति वर्ष प्रदान करेगा। साथ ही, यह 10 करोड़ भारतीय बच्चों के समग्र स्वास्थ्य मानकों को भी बढ़ाएगा।

निष्कर्ष

पड़ताल से साफ है प्रधानमंत्री किसान योजना को लागू कराने की राह में कुछ बधाएं भी हैं। भारत जैसे बड़े और विविधता से परिपूर्ण देश में इसे लागू कराना आसान नहीं है। भारत में निश्चित आय सहायता योजना को लागू करने के लिए संसाधनों की जरूरत होगी, जिसके लिए मौजूदा सरकारी योजनाओं जैसे मनरेगा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली आदि को बंद करना होगा। अगर ऐसा किया जाएगा तो लोगों के बीच अविश्वास का माहौल कायम होगा। समस्या लाभार्थियों की पहचान करने में भी होगी। भारत में अशिक्षा और गरीबी का दायरा बहुत ही व्यापक है। देश में अनपढ़ लोगों की एक बड़ी फौज होने के कारण वे इस योजना से मिलने वाले लाभ को अपना अधिकार समझने लगेंगे, जिससे देश में खेती-किसानी का काम प्रभावित होगा और ग्रामीण विकास को धक्का लगेगा। बहरहाल,सरकार ने किसानों की समस्याओं को कम करने की पहल की है, लेकिन इस दिशा में और भी अग्रतर कार्रवाई करने की जरूरत है। इस बजट में भूमिहीन या पट्टेदार किसानों एवं कृषि मजदूरों को राहत देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। कृषि के बजाए संबद्ध क्षेत्रों की तरफ किसानों को मोड़ने के लिए सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन इस दिशा में किसानों को और भी सहायता मुहैया कराने की जरूरत है। कहा जा सकता है कि सरकार की मौजूदा पहल को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है।

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