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देश के सबसे पुराने अयोध्या राम मंदिर का विवाद सुलझने के बजाय उलझता ही जा रहा है।3 प्रधानमंत्री और हाई कोर्ट,सुप्रीम कोर्ट एवं अन्य लोगो ने समय-समय पर बातचीत द्वारा आपसी सहमति से मामले को हल करने की कोशिश की थी लेकिन अनेको कोशिश नाकाम रही।जिसके बाद देश को सुप्रीम कोर्ट से ही न्याय की आस रह गई है।पक्षकारों के बिना मर्जी के मध्यस्थता कराना और बहुसंख्यक समाज की उपेक्षा कर पूर्व जज एफएम कलीफुल्ला को 3 सदस्यीय पैनल का अध्यक्ष बनाना क्या न्यायसंगत है ? सुप्रीम कोर्ट के कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे है।सबूत के आधार पर कानूनी निर्णय करने वाली कोर्ट अचानक भावनाओ में कैसे बह गई ? क्या दशकों पुराने राम मंदिर विवाद का हल करने में सुप्रीम कोर्ट सक्षम नही है ? अपनी बेबाक राय दे 

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विगत 6 वर्षों से देश में हो रहे आमूलाग्र और सशक्त परिवर्तनों के साक्षी होने का भाग्य हमें प्राप्त हुआ है। भ्रष्ट प्रशासन, दुर्लक्षित जनता और असुरक्षित राष्ट्र के रूप में निर्मित देश की प्रतिमा को सिर्फ 6 सालों में एक सामर्थ्यशाली राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अभूतपूर्ण भूमिका रही है।

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