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स्वदेशी विकल्प नहीं, राष्ट्रधर्म

स्वदेशी विकल्प नहीं, राष्ट्रधर्म

by अमोल पेडणेकर
in मार्च 2026
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आत्मनिर्भरता से देश की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति सुदृढ़ होती है। जब हम स्वदेशी अपनाते हैं तो रोजगार सृजन और स्थानीय विकास को गति मिलती है। आत्मनिर्भर भारत का मार्ग आत्मसम्मान और सामूहिक प्रयास से होकर जाता है। यही विचार भारत को सशक्त, सुरक्षित और विश्वगुरु बनाने की नींव है।

 

अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50% तक आयात शुल्क लगाने की घोषणा की थी। 10 महीने के बाद अब डोनाल्ड ट्रम्प ने वह आयात शुल्क 18% करने की घोषणा की है। हालांकि अमेरिका ने विभिन्न मुद्दों पर भारत पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई थी। ऐसे समय में प्रधान मंत्री मोदी ने आत्मविश्वास पर जोर देते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि स्थानीय उत्पादों पर विश्वास रखें। ‘आत्मनिर्भर भारत’ सिर्फ एक नारा नहीं बल्कि हर भारतीय की जिम्मेदारी है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की इस बात के पीछे गहरा अर्थ छिपा है।

जहां अमेरिका विभिन्न मुद्दों पर आयात शुल्क लगाकर भारत पर दबाव डालने का प्रयास कर रहा था, वहीं भारत ने आत्मसम्मान की नीति अपनाई। प्रधान मंत्री ने यह स्वदेशी नारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के उस हास्यास्पद वक्तव्य के ठीक एक दिन बाद दिया, जिसमें उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘मृत’ बताया था। ट्रम्प की कार्रवाई के उत्तर में भारत में स्वदेशी नीति को फिर से लागू करने का आह्वान एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।

प्रधान मंत्री मोदी ने देशवासियों से दैनिक जीवन की छोटी से छोटी वस्तुओं से लेकर डिजिटल सेवाओं तक, सभी क्षेत्रों में स्वदेशी वस्तुओं को प्राथमिकता देने की सलाह दी है। यह अपील मात्र भावनात्मक राष्ट्रवाद पर आधारित नहीं है बल्कि इसके पीछे एक स्पष्ट आर्थिक रणनीति है। विदेशी वस्तुओं पर निर्भर रहने का अर्थ है अपने रोजगार के अधिकार दूसरों को सौंप देना। वहीं, स्वदेशी पर जोर देने का अर्थ है भारत में उत्पादकता, रोजगार सृजन, नवाचार और कौशल विकास को बढ़ावा देना।

भारत आज जिस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, वहां आत्मनिर्भरता केवल एक आर्थिक लक्ष्य नहीं रही बल्कि यह राष्ट्रीय अस्तित्व, सांस्कृतिक स्वाभिमान और भविष्य की दिशा तय करने वाला संकल्प बन चुकी है। स्वदेशी से आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा वास्तव में उस भूली हुई चेतना का पुनर्जागरण है, जो भारत की आत्मा में सदियों से विद्यमान रही है। यह आयात-निर्यात के आर्थिक गणित से कहीं आगे जाकर ‘स्व’ की खोज, ‘स्व-भाव’ के जागरण और ‘स्वावलम्बन’ के व्यवहारिक रूपांतरण की यात्रा है।

पश्चिमी अर्थशास्त्र में आत्मनिर्भरता को प्राय: आर्थिक सम्पूर्णता के रूप में देखा जाता है, परंतु भारतीय दृष्टि इससे कहीं अधिक व्यापक, गहन और मानवीय है। भारत में आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल यह नहीं कि हम अपनी आवश्यकताओं का उत्पादन स्वयं करें बल्कि यह है कि हम अपनी आवश्यकताओं, प्राथमिकताओं और जीवन-दृष्टि को स्वयं निर्धारित करें।

भारतीय परम्परा में आत्मनिर्भरता का मूल सूत्र रहा है, ‘स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान सर्वत्र पूज्यते’ अर्थात स्वदेश में स्व-आधारित व्यवस्था ही सम्मान और स्थायित्व का आधार बनती है। भारत की ग्राम व्यवस्था, कुटीर उद्योग, पारम्परिक कृषि, आयुर्वेद हस्तशिल्प और सामुदायिक जीवन-शैली आत्मनिर्भरता के जीवंत उदाहरण रहे हैं।

आज की आधुनिक अर्थव्यवस्था में आत्मनिर्भरता क्यों अनिवार्य है, इस बात का उत्तर हम ढूंढते हैं तो हमें पता चलता है कि इक्कीसवीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था आपसी निर्भरता के साथ-साथ असुरक्षा की नई परिभाषाएं भी गढ़ रही है। आज आत्मनिर्भरता का अर्थ है, आर्थिक संकट में स्थिरता, राष्ट्रीय सुरक्षा में मजबूती, रोजगार सृजन की निरंतरता और रणनीतिक स्वतंत्रता। यदि कोई राष्ट्र अपनी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर है तो उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता भी अंततः सीमित हो जाती है।

2014 से ‘मेक इन इंडिया’ अभियान प्रमुखता से चल रहा है। इसके प्रभाव से भारत ने मोबाइल निर्माण, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा निर्माण और रक्षा क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति की है। आज भारत मोबाइल फोन निर्माण में विश्व में दूसरे स्थान पर है। रक्षा उपकरणों के निर्माण में भी भारत विश्व स्तर पर अग्रणी देश के रूप में जाना जाता है।

‘पीएलआई’ योजना के अंतर्गत मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयों और वस्त्रों के लिए दिए गए प्रोत्साहन सफल रहे हैं। औद्योगिक सुविधा और नवाचार में क्रांति के कारण युवाओं को स्वदेशी उत्पादन के नए अवसर मिल रहे हैं। प्रधान मंत्री मोदी ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ की अवधारणा को व्यापक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है। उनका मानना है कि उत्पाद के साथ-साथ अवधारणा भी स्वदेशी होनी चाहिए। कोविड-19 जैसे संकट के समय में भी भारत ने स्वदेशी उत्पादों का निर्माण किया है। स्वदेशी क्षमताओं का दृष्टिकोण विश्व के सामने प्रस्तुत किया गया।

इस दौरान विश्व के कई देशों ने भारत से सहायता की गुहार लगाई, जो भारतीयों के लिए आज भी एक सुखद स्मृति है। स्वदेशी कम्पनियों ने विदेशी कम्पनियों को कड़ी टक्कर दी है। स्वदेशी ऐप्स के कारण ही ‘डिजिटल इंडिया’ की उभरती अवधारणा का भी उदय हुआ। ‘यूपीआई’, ‘भीम’, ‘रुपे’, ‘डिजिलॉकर’, ‘कोविन वैक्सीन, ‘आरोग्य सेतु’ ये सभी स्वदेशी प्रौद्योगिकी की शक्ति के उदाहरण हैं। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की प्रगति भी सराहनीय है।

आत्मनिर्भरता का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत का इतिहास बताता है कि यह देश कभी आत्मनिर्भरता का वैश्विक केंद्र हुआ करता था। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर मौर्य, गुप्त और चोल काल तक भारत कृषि, उद्योग, विज्ञान और व्यापार में आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि विश्व को दिशा देने वाला राष्ट्र रहा है। भारत का सूती वस्त्र उद्योग, जहाज निर्माण, धातुकर्म, गणित और चिकित्सा विज्ञान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध थे। विदेशी आक्रामकों के काल में भारत की इस आत्मनिर्भर व्यवस्था को योजनाबद्ध ढंग से नष्ट किया गया। स्वदेशी उद्योगों को समाप्त कर भारत को कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता और विदेशी वस्तुओं का बाजार बना दिया गया। स्वतंत्रता के बाद भी लम्बे समय तक हम मानसिक रूप से उसी ढांचे में जकड़े रहे।

आज का भारत उस ऐतिहासिक अन्याय से उबरते हुए पुनः आत्मनिर्भरता की ओर लौट रहा है। ‘आत्मनिर्भर भारत’ केवल नीति नहीं, कोई एक सरकारी योजना या नारा नहीं है, यह एक राष्ट्रीय चरित्र निर्माण की प्रक्रिया है।

इसके प्रमुख आयाम हैं…

आर्थिक आत्मनिर्भरता : जिससे रोजगार और उद्यम सृजित हों।

तकनीकी आत्मनिर्भरता : जिससे डिजिटल और रक्षा क्षेत्र में स्वायत्तता मिले।

सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता : जिससे हमारी पहचान अक्षुण्ण रहे।

मानसिक आत्मनिर्भरता : जिससे आत्मविश्वास और स्वाभिमान विकसित हो।

जब तक सभी तरह की मानसिक गुलामी समाप्त नहीं होगी तब तक आत्मनिर्भरता अधूरी ही रहेगी।

भारत के भीतर निहित ‘स्व’ ही हमारी वास्तविक शक्ति रही है। भारत की सबसे बड़ी शक्ति वह है जो पहले से ही हमारे पास है। हमारी परम्पराएं, मूल्य, सामाजिक संरचना और नवाचार की प्रवृत्ति हमें आत्मनिर्भर बनने के लिए स्वाभाविक रूप से सक्षम बनाती हैं। भारतीय समाज में श्रम की प्रतिष्ठा, परिवार आधारित अर्थव्यवस्था, स्थानीय संसाधनों का उपयोग और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना सदियों से रही है। आज आवश्यकता है इन गुणों को आधुनिक संदर्भ में पुनः स्थापित करने की।

आत्मनिर्भरता की सोच रखते समय आत्ममंथन

आत्मनिर्भरता का मार्ग केवल सरकार से होकर नहीं जाता, वह प्रत्येक नागरिक के व्यवहार से होकर गुजरता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि विदेशी वस्तु को श्रेष्ठ मानने की मानसिकता छोड़नी होगी। उपभोग के स्थान पर उपयोग की संस्कृति विकसित करनी होगी। सुविधा के साथ उत्तरदायित्व स्वीकार करना होगा। आत्मनिर्भर भारत की नींव नागरिकों की चेतना पर टिकी है। जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए तकनीकी और औद्योगिक आत्मनिर्भरता प्राप्त की है। इन देशों ने शिक्षा, कौशल और गुणवत्ता को राष्ट्रधर्म बनाया। भारत को भी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उतरते समय अपनी मौलिकता नहीं खोनी चाहिए।

भारत का भूगोल, संस्कृति और विविधता में ही आत्मनिर्भरता का आधार छुपा हुआ है। भारत की भौगोलिक विविधता उसे कृषि, ऊर्जा, खनिज और पर्यटन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की अद्भुत क्षमता देती है। हमारी विविधता में अपार सामर्थ्य है। हर क्षेत्र की अपनी विशेषता है और वही उसकी शक्ति है। नरेंद्र मोदी सरकार आने के पश्चात पिछले एक दशक में आत्मनिर्भरता को नीति और व्यवहार दोनों स्तरों पर स्थापित करने का प्रयास अत्यंत गतिमान रूप में हुआ है। रक्षा उत्पादन में स्वदेशीकरण, डिजिटल भुगतान प्रणाली, स्टार्ट-अप संस्कृति, एमएसएमई सशक्तिकरण और स्वदेशी वैक्सीन निर्माण इसके ठोस उदाहरण हैं। भारत अब विचारों से निकलकर कार्यान्वयन की अवस्था में पहुंच चुका है।

स्वदेशी आत्मनिर्भरता की आत्मा है। स्वदेशी का अर्थ केवल देश में बनी वस्तु खरीदना नहीं है बल्कि यह एक जीवन-दृष्टि है। स्वदेशी अपनाने से स्थानीय उद्योग मजबूत होते हैं, रोजगार सृजित होते हैं और आर्थिक चक्र देश के भीतर ही चलता है। जब स्वदेशी हमारे स्वभाव का हिस्सा बनता है तभी आत्मनिर्भरता स्थाई बनती है। आज का भारतीय युवा आत्मनिर्भर भारत की सबसे बड़ी आशा है। आधुनिक एवं अत्याधुनिक उपयोग के साथ अपने पास उपलब्ध पारम्परिक ज्ञान का समन्वय भारत को सम्पूर्ण विश्व में विशिष्ट बनाता है।

यदि हमारे उत्पाद स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर निर्मित किए जाते हैं तो यह स्वाभाविक है कि वे स्थानीय बाजारों में प्राथमिकता से बिकेंगे, पर स्वदेशी आधारित अर्थशास्त्र में वैश्विक व्यापार निषिद्ध नहीं है। कुछ विशिष्ट वस्तुएं, जैसे कि कुछ अनोखे प्रकार के खनिज वैश्विक बाजार से खरीदने होंगे। हालांकि ‘स्वदेशी’ का अर्थ स्व-राष्ट्रवादी होना नहीं है। आर्थिक अवधारणा के रूप में देखा जाए तो ‘स्वदेशी’ एक ऐसी अवधारणा है जो स्थानीयता को प्राथमिकता देती है और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ाव स्थापित करती है।

स्वदेशी के माध्यम से क्षेत्रवार विविधता को ध्यान में रखकर उन क्षेत्रों को विकसित करने का प्रयास करना अत्यंत आवश्यक है। कृषि में जैविक और प्राकृतिक खेती, उद्योग में कुटीर और एमएसएमई, स्वास्थ्य में आयुष और योग तथा पर्यावरण संरक्षण में स्थानीय मॉडल आत्मनिर्भर भारत के मजबूत स्तम्भ हैं। भारत को आत्मनिर्भरता की गति इसलिए बढ़ानी है क्योंकि जनसंख्या हमारी शक्ति है। वैश्विक नेतृत्व का अवसर हमारे सामने है। आत्मनिर्भरता ही स्थाई विकास का मार्ग है। यह गति शिक्षा, नीति, समाज और युवा इन चारों के समन्वय से ही सम्भव है।

आज भारत को विदेशी कम्पनियों की दबावकारी रणनीति तथा रक्षामहाशक्तियों का सामना करना पड़ रहा है। स्वदेशी उत्पादों के अनुबंधों पर दबाव, तेल खरीद पर निर्देश, सूचना की स्वतंत्रता पर संदेह, ये सभी बातें भारत की सम्प्रभुता को चुनौती दे रही हैं। प्रधान मंत्री मोदी का स्पष्ट संदेश है कि स्वदेशी उत्पाद भारत का आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हथियार है और भारत विदेशी दबाव के आगे नहीं झुकेगा। भारत की शक्ति उसके 140 करोड़ नागरिकों के हाथों में है।

स्वदेशी की बात कई वर्षों से उठ रही है, पर अब अनिवार्य हो गई है। अत: हम अपने देश में निर्मित वस्तुओं को अत्यधिक महत्व दें। हमारी खर्च करने वाली राशि का बड़ा हिस्सा स्वदेशी वस्तुओं पर व्यय करें। इसका एक उदाहरण है- दुर्योधन ने जब पांडवों को सुई की नोक जितना भी धरती का टुकड़ा नहीं देने की बात कही तो श्रीकृष्ण ने इंद्रप्रस्थ के निर्माण के लिए पांडवों को द्वारका से धन लाकर दिया। यहीं से हम अपने स्वदेशी संस्कार को जाग्रत करें और अपना धन इंद्रप्रस्थ पर खर्च करें। इस प्रसंग में इंद्रप्रस्थ स्वदेश है। आज अमेरिका जैसे देश का राष्ट्रपति दुर्योधन की तरह भूमिका निभा रहा था। भारत देश के नेतृत्व एवं जनता ने अपने ‘स्व-सामर्थ्य’ से उन्हें पुनर्विचार करने पर मजबूर किया। समस्त भारतीय जनता अपने भीतर का कृष्ण जाग्रत करें और स्वदेशी अभियान का हिस्सा बनें तो भविष्य में वैश्विक स्तर पर इससे भी ज्यादा बेहतर परिणाम हमें मिल सकते हैं।

आत्मनिर्भर भारत कोई दूर का सपना नहीं बल्कि हमारे भीतर छिपी क्षमता का जागरण है। स्वदेशी इसका माध्यम है और ‘स्व’ इसकी आत्मा। यदि भारत का युवा इस चेतना को आत्मसात कर ले तो आने वाला भारत केवल आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि विश्व का मार्गदर्शक राष्ट्र बनेगा। स्वदेशी अपनाना आज विकल्प नहीं, राष्ट्रधर्म है।

 

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