बीज से वटवृक्ष : संघशक्ति का विस्तार

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डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में विजयादशमी के दिन शुभ संकल्प के साथ एक छोटा बीज बोया था, जो आज विशाल वटवृक्ष बन चुका है। दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक-सामाजिक संगठन के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमारे सामने है। नन्हें कदम से शुरू हुई संघ की यात्रा समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पहुँची है, न केवल पहुँची है, बल्कि उसने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहाँ संघ की पहुँच न केवल कठिन थी, बल्कि असंभव मानी जाती थी। किंतु, आज उन क्षेत्रों में भी संघ नेतृत्व की भूमिका में है।

विजय दशमी पर शस्त्र पूजा का महत्व

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दुनिया को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है एक जिनके पास शस्त्र होता है और दूसरा जिनके पास शस्त्र नहीं होता है...  जिनके पास शस्त्र होता है वो सदैव निडर और वीर बने रहते हैं और जिनके पास शस्त्र नहीं होते हैं और वो सदैव भयभीत होते हैं और कायर पुरुष बने रहते हैं जिस घर में अस्त्र शस्त्र होते हैं उस घर की स्त्रियों पर कभी किसी की कुदृष्टि डालने की हिम्मत भी नहीं होती है और जिनके घर में अस्त्र शस्त्र नहीं होते हैं उनकी स्त्रियों के साथ राह चलते छेड़खानी होती है लव जिहाद जैसी घटनाएं होती हैं और वो सदैव थाने के चक्कर ही लगाते रह जाते हैं... उन्हें बदनामी के सिवाय कभी कुछ हासिल नहीं होता है। 

इतिहासकार,बौद्धिक योद्धा डॉ. स्वराज्य प्रकाश गुप्त

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डा. गुप्त की प्रतिभा श्री रामजन्मभूमि आन्दोलन के दौरान खूब प्रकट हुई। जहाँ एक ओर वामपन्थी श्रीराम को कल्पना बता रहे थे, वहाँ कांग्रेस मन्दिर के अस्तित्व को ही नकार रही थी। ऐसे में जब हिन्दू तथा मुस्लिम पक्ष में वार्ताओं का दौर चला, तो डा0 गुप्त हिन्दू पक्ष की कमान सँभालते थे। उनके तर्कों के आगे दूसरा पक्ष भाग खड़ा होता था। छह दिसम्बर को बाबरी ध्वंस से जो अवशेष मिले, उन्होंने बड़े साहसपूर्वक उनके चित्र लिये और बाबरी राग गाने वालों को केवल देश ही नहीं, तो विदेश में भी बेनकाब किया।

सावरकर को था डॉ. हेडगेवार पर अटल विश्वास

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नि:शस्त्र प्रतिरोध के प्रेरणा पुरुष स्वातंत्र्यवीर सावरकर थे। सावरकर और सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार में परस्पर स्नेह,आदर और सामंजस्य था। डॉ. हेडगेवार की भूमिका के बारे में सावरकरजी के क्या विचार थे? इसका अनुमान डॉ. हेडगेवार के जाने के बाद हिंदू महासभा के अध्यक्ष के रूप में सावरकर द्वारा 13 जुलाई, 1940 में  नए सरसंघचालक गोलवलकर गुरुजी को मूलत: अंग्रेजी में लिखे पत्र से होता है। डॉ. हेडगेवार के प्रति अत्यधिक स्नेह का उल्लेख करते हुए सावरकर लिखते हैं, "डॉ. हेडगेवार के जीवन काल में पूरे हिंदुस्तान में संघ की सैंकड़ों सभाओं को संबोधित करने का मुझे अवसर मिला। लेकिन संघ के विषय में कहना हो, तो किसी भी प्रश्न पर डॉ. हेडगेवार का ही शब्द अंतिम होना चाहिए और मुझे उनके बुद्धि विवेक पर पूर्ण आत्मविश्वास था"

खालिस्तान का प्रखर विरोधी ‘राष्ट्रीय सिख संगत’

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पंजाब भारत की खड्गधारी भुजा है। पंजाबियों ने सर्वत्र अपनी योग्यता और पौरुष का लोहा मनवाया है; पर एक समय ऐसा भी आया, जब कुछ सिख समूह अलग खालिस्तान का राग गाने लगे। इस माहौल को संभालने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ‘राष्ट्रीय सिख संगत’ का गठन कर इसकी जिम्मेदारी वरिष्ठ प्रचारक श्री चिरंजीव सिंह को दी।

भारत भक्त विदेशी महिला डॉ. एनी बेसेंट

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उन्होंने धार्मिक एवं राष्ट्रीय शिक्षा के प्रसार, महिला जागरण, स्काउट एवं मजदूर आंदोलन आदि में सक्रिय भूमिका निभाई। सामाजिक बुराइयां मिटाने के लिए उन्होंने ‘ब्रदर्स ऑफ सर्विस’ संस्था बनाई। इसके सदस्यों को एक प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर करने पड़ते थे। कांग्रेस और स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय होने के कारण उन्हें जेल में भी रहना पड़ा। 1917 के कोलकाता अधिवेशन में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। यद्यपि फिर लोकमान्य तिलक और गांधी जी से उनके भारी मतभेद हो गये। इससे वे अकेली पड़ गयीं। वे गांधीवाद का उग्र विरोध करते हुए कहती थीं कि इससे भारत में अराजकता फैल जाएगी। डा. एनी बेसेंट एक विदुषी महिला थीं। उन्होंने सैकड़ों पुस्तक और लेख लिखे। वे स्वयं को पूर्व जन्म का हिन्दू एवं भारतीय मानती थीं। 20 सितम्बर, 1933 को चेन्नई में उनका देहांत हुआ। उनकी इच्छानुसार उनकी अस्थियों को वाराणसी में सम्मान सहित गंगा में विसर्जित कर दिया गया।

वृद्धजनों का करें मान-सम्मान

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लोग भूल जाते हैं कि उन्हें भी वृद्ध होना है। आज जो व्यवहार वे अपने माता-पिता के साथ कर रहे हैं, वही व्यवहार उनके बच्चे उनके साथ भी कर सकते हैं, क्योंकि वे अपने बच्चे को जैसे संस्कार देंगे, वे उसी के अनुसार व्यवहार करेंगे। इसलिए सबको चाहिए कि वे अपने माता-पिता एवं सभी वृद्धजनों का मान-सम्मान करें तथा अपने बच्चों को भी इसकी शिक्षा दें। इस प्रकार हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर पाएंगे।

आतंक पर कड़ा प्रहार है पीएफआई पर प्रतिबंध 

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यह भी खुलासा हुआ है कि पीएफआई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व बीजेपी के कई नेताओं, मुख्यंमत्रियों, सहित संघ व विश्व  हिंदू परिषद के नेताओं  की हत्या की साजिश रच रहा था। पीएफआई ने अभी हाल ही में केरल के कोझीकोड मे एक रैली निकाली थी जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,  भाजपा व संघ विरोधी नारे लगाये गये थे । साथ ही एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक छोटा लड़का हाथ में पीएफआई का झंडा लेकर अयोध्या में फिर से बाबरी मस्जिद बनाने की बात कह रहा था। 

लीसेस्टर-बर्मिंघम प्रकरण— घृणा का जनक कौन?

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इस त्रासदी के लिए वाम-उदारवादी किसे जिम्मेदार ठहराएंगे? हिंदुत्व, आरएसएस, भाजपा या मोदी? सच तो यह है कि बीते 1200 से अधिक वर्षों से समस्त विश्व 'काफिर-कुफ्र' अवधारणा से प्रेरित संकीर्ण मानसिकता का शिकार रहा है, जिसमें गैर-इस्लामी संस्कृति, परंपरा, पूजास्थलों और उनके मानबिंदुओं का कोई स्थान नहीं है। भारतीय उपमहाद्वीप और मध्यपूर्व एशिया के बाद यह विषैला वैचारिक-चिंतन अमेरिका और पश्चिमी देशों अपना विस्तार कर रहा है। लीसेस्टर-बर्मिंघल में जिहादियों का हिंदुओं पर हमला— इस श्रृंखला की एक सूक्ष्म कड़ी है। 

कर्नाटक में हिन्दी के सेवक विद्याधर गुरुजी

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1937 में गांधी जी ने उन्हें हिन्दी के लिए काम करने को कहा। विद्याधर जी ने यादगिरी में छह पाठशालाएं प्रारम्भ कर 8,000 बीड़ी मजदूरों को हिन्दी सिखायी। तबसे उनके नाम के साथ ‘गुरुजी’ स्थायी रूप से जुड़ गया। भाग्यनगर (हैदराबाद) की ‘हिन्दी प्रचार सभा’ दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए काम करने वाली प्रमुख संस्था है। विद्याधर गुरुजी 23 वर्ष तक उसके अध्यक्ष रहे। विधानसभा और विधान परिषद में वे प्रायः हिन्दी में ही बोलते थे। 1962 में कर्नाटक के मुख्यमन्त्री रामकृष्ण हेगड़े ने उन्हें राज्यसभा में भेजने का प्रस्ताव किया; पर विद्याधर गुरुजी ने मना कर दिया।

सपनों को साकार करने का संकल्प 

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भारत की संस्कृति भारत की धरती की उपज है। उसकी चेतना की देन है। साधना की पूंजी है। उसकी एकता, एकात्मता, विशालता, समन्वय धरती से निकला है। भारत में आसेतु-हिमालय एक संस्कृति है। उससे भारतीय राष्ट्र जीवन प्रेरित हुआ है। अनादिकाल से यहां का समाज अनेक सम्प्रदायों को उत्पन्न करके भी एक ही मूल से जीवन रस ग्रहण करता आया है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडे को नरेंद्र मोदी इसी रूप में पूरा कर रहे हैं।

हिन्दी के दधीचि पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी

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वे अंग्रेजी काल में उत्तर प्रदेश में शिक्षा प्रसार अधिकारी थे। एक बार तत्कालीन प्रदेश सचिव ने उन्हें यह आदेश जारी करने को कहा कि भविष्य में हिन्दी रोमन लिपि के माध्यम से पढ़ायी जाएगी। इस पर वे उससे भिड़ गये। उन्होंने साफ कह दिया कि चाहे आप मुझे बर्खास्त कर दें; पर मैं यह आदेश नहीं दूँगा। इस पर वह अंग्रेज अधिकारी चुप हो गया। उनके इस साहसी व्यवहार से देवनागरी लिपि की हत्या होने से बच गयी।

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