तेजस्वी व्यक्तित्व, कुशल संगठक रज्जू भैया

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया ने अपने जीवनकाल में ही अगला सरसंघचालक चुनने की परम्परा शुरू की, जो संघ में अनवरत जारी है। साथ ही, वे पहले सरसंघचालक थे जिन्होंने विदेशों का दौरा भी किया। कुल मिलाकर उन्होंने एक योगी की भांति जीवन जिया।

हिंदुस्थान प्रकाशन संस्था के अध्यक्ष रमेश पतंगे पद्मश्री से सम्मानित

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हर साल गणतंत्र दिवस के मौके पर घोषित किए जाने वाले पद्म पुरस्कारों की घोषणा इस साल के लिए भी कर दी गई है। 2023 के लिए, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 3 युगल मामलों सहित 106 पद्म पुरस्कारों को प्रदान करने की मंजूरी दी है। सूची में 6 पद्म विभूषण,…

कैसा भारत चाहते हैं संघ प्रमुख 

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत द्वारा पांचजन्य को दिए साक्षात्कार में केवल एक अंश बहस का विषय बना जिसमें उन्होंने कहा कि मुसलमानों को डरने की आवश्यकता नहीं है। उनका कहना था कि मुसलमानों में स्वयं को शासक मानने वाले उस मानसिकता से बाहर आकर सामान्य नागरिक के…

संघप्रमुख का कहा राष्ट्रवादी मुस्लिमों को स्वीकार

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"तोड़ दूंगा ये सारे बुत ए खुदा पहले यह तो बता तुझको इनसे इतनी जलन क्यों है। आए हैं कहां से ये बुत तेरी ही बनाए हुए पत्थरों और मिट्टियों से पहले यह तो बता की उन पत्थरों और मिट्टियों में क्या तू नही है?" किसी शायर का ये शेर…

संघ के कर्मयोगी प्रचारक हस्तीमल जी का देवलोकगमन

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‘तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें’ का ध्येय व्रत लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी के निमंत्रित सदस्य, वरिष्ठ प्रचारक कर्मयोगी हस्तीमल जी का ७७ वर्ष की आयु में राजस्थान के उदयपुर संघ मुख्यालय में आज दिनांक १४ जनवरी २०२३ को मकर संक्रांति की प्रातः…

कलाकारों के कलाकार योगेन्द्र बाबा

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कला की साधना अत्यन्त कठिन है। वर्षों के अभ्यास एवं परिश्रम से कोई कला सिद्ध होती है; पर कलाकारों को बटोरना उससे भी अधिक कठिन है, क्योंकि हर कलाकार के अपने नखरे रहते हैं। ‘संस्कार भारती’ के संस्थापक बाबा योगेन्द्रजी ऐसे ही कलाकार थे, जिन्होंने हजारों कला साधकों को एक माला में पिरोने का कठिन…

सीमाओं के जागरूक प्रहरी राकेश जी

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देश की सीमाओं की रक्षा का काम यों तो सेना का है; पर सीमावर्ती क्षेत्र के नागरिकों की भी इसमें बड़ी भूमिका होती है। शत्रुओं की हलचल की सूचना सेना को सबसे पहले वही देते हैं। अतः उनका हर परिस्थिति में वहां डटे रहना जरूरी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने…

स्वयंसेवकत्व का सामाजिक व सांस्कृतिक दायित्व

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Meerut: Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) volunteers sit in queues during Path-Sanchalan," or Route March, in Meerut, Sunday, Oct 28, 2018. (PTI Photo) (PTI10_28_2018_000067B)
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स्वयंसेवक बहुत बड़ी संख्या में गृहस्थाश्रमी हैं। देश के हर अंचल में व जन जीवन के हर क्षेत्र में विद्यमान हैं। ये अपने-अपने परिवारों को सामाजिक व सांस्कृतिक संस्कारों का केन्द्र बनाने की स्थिति में हैं। फलस्वरूप हम डॉक्टर जी की अपेक्षा के अनुसार स्वयं चौबीसों घंटे स्वयंसेवक के रूप में…

‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’ का पूरा अर्थ क्या है?

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संघ प्रार्थना (RSS Prayer) यानि आरएसएस की प्रार्थना (RSS Prarthana) रोज़ाना संघ की शाखा में गाई जाती है, संघ प्रार्थना संस्कृत में है सभी स्वयंसेवक रोज़ाना इसका उच्चारण करते हैं लेकिन सभी को हिंदी में अर्थ शायद न पता हो। 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे' का पूरा अर्थ क्या है? संघ…

हम कब अपने नायकों को पहचानेंगे ?

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जो राष्ट्र अपने नायकों को नहीं पहचानता, उनका सम्मान नहीं करता— वह जीवित रहने का अधिकार खो देता है। पहले भारत का तीन हिस्सों (खंडित भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश) में विभाजित होना, फिर कश्मीर के एक तिहाई पर कब्जा हो जाना और 1962 के चीन युद्ध में देश की शर्मनाक हार होना— इसी रोग के कुछ लक्षण है। 'देर आए दुरुस्त आए'— एक पुरानी कहावत है, जो दिल्ली में 23-25 नवंबर को संपन्न हुए कार्यक्रम पर बिल्कुल चरितार्थ होती है। असम के अहोम योद्धा लाचित बोरफुकन की 400वीं जयंती पर दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इसके समापन समारोह में शामिल हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत का इतिहास केवल गुलामों का नहीं, योद्धाओं का भी है। किंतु देश के वीरों का इतिहास दबाया गया। क्या यह सत्य नहीं कि मार्क्स-मैकॉले मानस प्रेरित इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को सर्वाधिक विकृत किया है। यही कारण है कि अधिकांश पाठक लाचित बोरफुकन के नाम से शायद ही परिचित होंगे। क्या यह परिदृश्य देश के समक्ष एक बड़ी चुनौती नहीं?

बौद्धिक गुलामी से मुक्ति हेतु शुरू हुआ राष्ट्रधर्म

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दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि देश की हर क्षेत्र में उन्नति और प्रगति होनी चाहिए लेकिन वैचारिक स्पष्टता और वैचारिक शुद्धता भी चाहिए। आर्य द्रविड़ मिथक को स्थापित करने का प्रयास इस देश में किया गया। भारत एक देश है ही नहीं ऐसी बातें कही गयीं। अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ षड़यंत्र आजादी के 75 वर्षों तक जारी रहा। सरकार्यवाह ने बताया कि स्वतंत्रता के बाद भी भारत की संसद में बजट शाम पांच बजे पेश होता था। अटल जी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने यह परम्परा बदली। राजपथ को कर्तव्यपथ बनाने का काम हुआ। देश को  मानसिक गुलामी से बाहर लाना होगा। 

ईसाई धर्मांतरण के खिलाफ स्वधर्म रक्षक तालिम रुकबो

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निर्धन एवं अशिक्षित वनवासियों की मजबूरी का लाभ उठाया और लालच देकर हजारों लोगों को ईसाई बना लिया। अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट जिले में एक दिसम्बर, 1938 को जन्मे श्री तालिम रुकबो ने शीघ्र ही इस खतरे को पहचान लिया। वे समझते थे कि ईसाइयत के विस्तार का अर्थ देशविरोधी तत्वों का विस्तार है। इसलिए उन्होंने आह्वान किया कि अपने परम्परागत त्योहार सब मिलकर मनायें। उन्होंने विदेशी षड्यन्त्रकारियों द्वारा जनजातीय आस्था पर हो रहे कुठाराघात को रोकने के लिए पूजा की एक नई पद्धति विकसित की। उनके प्रयासों का बहुत अच्छा फल निकला। राज्य शासन ने भी स्थानीय त्योहार ‘सोलुंग’ को सरकारी गजट में मान्यता देकर उस दिन छुट्टी घोषित की। 

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