| पूरे परिदृश्य में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत के सम्बंध एक ओर ईरान और खाड़ी देशों से मजबूत हैं तो दूसरी ओर इजरायल और अमेरिका के साथ भी गहरे रणनीतिक और रक्षा सम्बंध हैं। यही संतुलन भारत को एक अद्वितीय स्थिति में खड़ा करता है, जहां वह न केवल अपने हितों की रक्षा कर सकता है बल्कि एक विश्वसनीय मध्यस्थ की भूमिका भी निभा सकता है। |
युद्ध सभ्यता को निरंतर पीछे धकेल देता है, इस बात को स्पष्ट करते हुए अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक सटीक बात कही है कि ‘मुझे नहीं पता तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा, किंतु चौथा विश्व युद्ध पत्थरों और लाठियों से लड़ा जाएगा।’ वर्तमान में चल रहे इजरायल-अमेरिका और ईरान युद्ध को समय पर रोकने में असफल रहे तो अल्बर्ट आइंस्टीन की यह भविष्यवाणी सच होने की घनी सम्भावना है।

आज पश्चिम एशिया एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है, जहां से पूरी दुनिया की दिशा बदल सकती है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता टकराव अब केवल सीमित सैन्य कार्रवाई नहीं रहा बल्कि एक व्यापक भू-राजनीतिक संकट का रूप ले चुका है। यह संघर्ष केवल तीन देशों तक सीमित नहीं है, इसके प्रभाव वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता तक गहराई से महसूस किए जा रहे हैं।
कहीं यह युद्ध वैश्विक महायुद्ध की ओर न बढ़े, इसी बात की चिंता आज सम्पूर्ण विश्व को है। इसी पृष्ठभूमि में रूस द्वारा भारत को महाशक्ति और वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में देखना एक साधारण कूटनीतिक वक्तव्य नहीं है बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन का संकेत है। व्लादिमीर पुतिन के करीबी रणनीतिक विशेषज्ञों का यह आकलन इस तथ्य पर आधारित है कि भारत ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक संतुलित, व्यावहारिक और बहुपक्षीय विदेश नीति को अपनाया है, जो न केवल राष्ट्रीय हितों की रक्षा करती है बल्कि वैश्विक स्थिरता में भी योगदान देती है।
जब इस संघर्ष की शुरुआत हुई, तब व्यापक धारणा यह थी कि अमेरिका-इजराइल का ईरान के विरोध में यह एक तेज, सटीक और सीमित सैन्य अभियान होगा। अमेरिका और उसके सहयोगियों को अपनी तकनीकी श्रेष्ठता, श्रेष्ठतम हथियार प्रणाली और वैश्विक सैन्य नेटवर्क पर विश्वास था। यह अनुमान अस्वाभाविक नहीं था क्योंकि पिछले दशकों में अमेरिका ने कई युद्धों में अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया है, किंतु वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल सिद्ध हुई। ईरान ने जिस प्रकार की बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है, जिसमें मिसाइल तकनीक, ड्रोन युद्ध, क्षेत्रीय सहयोगी समूहों का उपयोग और मनोवैज्ञानिक युद्ध शामिल है।
उसने इस संघर्ष को लम्बा और अनिश्चित बना दिया है। युद्ध के प्रारम्भ में ईरान का यह कथन था कि युद्ध की शुरुआत अमेरिका ने की है, पर उसका अंत हम तय करेंगे। यह आलेख लिखते समय युद्ध प्रारम्भ होकर 20 दिन से अधिक का समय बीत चुका है। 20 दिनों के बाद ईरान का वह कथन अब एक राजनीतिक वक्तव्य भर नहीं रह गया है बल्कि ईरान के दीर्घकालिक रणनीति का संकेत देता है। यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य शक्ति का खेल नहीं बल्कि धैर्य, समय और रणनीतिक संतुलन का भी परीक्षण है।
21वीं सदी का यह युद्ध बहुआयामी और अनिश्चित बनता जा रहा है। आज का युद्ध पारम्परिक युद्ध से पूरी तरह अलग है। यह केवल टैंकों और सैनिकों की लड़ाई नहीं बल्कि तकनीक, सूचना, अर्थव्यवस्था और कूटनीति का सम्मिलित संघर्ष है। ड्रोन हमले, साइबर युद्ध, आर्थिक प्रतिबंध और सोशल मीडिया के माध्यम से चलने वाला सूचना युद्ध, ये सभी आधुनिक युद्ध के नए आयाम हैं। इनका प्रभाव केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी दुनिया के समाज और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।
पश्चिम एशिया का वर्तमान संघर्ष इस नई वास्तविकता का जीवंत उदाहरण है। यहां हर हमला केवल सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीतिक संदेश भी है। ऊर्जा संकट और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव करता है।

पश्चिम एशिया विश्व की ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र है। तेल और गैस के विशाल भंडार, महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग और वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा इस क्षेत्र से होकर गुजरती है। इस संघर्ष के कारण सबसे पहले और सबसे गहरा प्रभाव ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। तेल और गैस की कीमतों में अस्थिरता न केवल विकसित देशों को प्रभावित करती है बल्कि विकासशील देशों के लिए गम्भीर आर्थिक संकट पैदा कर सकती है।
ऊर्जा की कीमतें बढ़ने का सीधा असर परिवहन, उत्पादन और उपभोग पर पड़ता है। परिणामस्वरूप महंगाई बढ़ती है, निवेश घटता है और आर्थिक विकास की गति धीमी हो जाती है। इसके अलावा समुद्री मार्गों पर संकट बढ़ने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है। यह स्थिति उस समय और भी गम्भीर हो जाती है, जब दुनिया पहले से ही आर्थिक अनिश्चितताओं का सामना कर रही हो।
इतिहास बार-बार यह सिखाता है कि युद्ध में कोई वास्तविक विजेता नहीं होता। जो जीतता हुआ दिखाई देता है, वह भी अंततः आर्थिक, सामाजिक और नैतिक रूप से कमजोर हो जाता है। आधुनिक युद्धों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इनका सबसे अधिक प्रभाव सामान्य नागरिकों पर पड़ता है। अस्पतालों पर हमले, आवासीय क्षेत्रों का विनाश, शरणार्थियों का संकट और बुनियादी सुविधाओं की कमी, ये सभी युद्ध की स्थाई तस्वीर बन जाते हैं।

बच्चों और महिलाओं पर पड़ने वाला मानसिक आघात, विस्थापन की पीड़ा और भविष्य की अनिश्चितता, ये ऐसे घाव हैं जो पीढ़ियों तक भरते नहीं हैं।
इस दृष्टि से देखें तो पश्चिम एशिया का यह संघर्ष केवल राजनीतिक या सैन्य संकट नहीं बल्कि एक मानवीय त्रासदी भी है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सीमित भूमिका इस संकट को और जटिल बनाती है। इस युद्ध ने संयुक्त राष्ट्र और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी संस्थाओं की सीमाओं को भी उजागर किया है। इन संस्थाओं का उद्देश्य वैश्विक शांति बनाए रखना है, पर जब बड़ी शक्तियों के हित टकराते हैं तो इनकी भूमिका प्राय: सीमित हो जाती है। सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यों के वीटो अधिकार के कारण कई बार निर्णायक कार्रवाई सम्भव नहीं हो पाती। परिणामस्वरूप युद्ध को रोकने के प्रयास प्राय: बयानबाजी और अपील तक ही सीमित रह जाते हैं। यह स्थिति वैश्विक शासन प्रणाली की संरचनात्मक कमजोरी को सामने लाती है।

इस पूरे परिदृश्य में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत के सम्बंध एक ओर ईरान और खाड़ी देशों से मजबूत हैं तो दूसरी ओर इजरायल और अमेरिका के साथ भी गहरे रणनीतिक और रक्षा सम्बंध हैं। यही संतुलन भारत को एक अद्वितीय स्थिति में खड़ा करता है, जहां वह न केवल अपने हितों की रक्षा कर सकता है बल्कि एक विश्वसनीय मध्यस्थ की भूमिका भी निभा सकता है। भारत के सामने तीन प्रमुख रणनीतिक प्राथमिकताएं स्पष्ट रूप से उभरती हैं।
पहला, ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना। भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी बड़े पैमाने पर तेल और गैस आयात पर निर्भर है।
इसलिए पश्चिम एशिया में स्थिरता भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। दूसरा, रणनीतिक संतुलन बनाए रखना। भारत को किसी एक शक्ति-गुट में पूरी तरह झुकने के बजाए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखना होगा। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। तीसरा, शांति और कूटनीति को बढ़ावा देना। भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परम्परा संवाद और सहअस्तित्व की रही है।

इसी आधार पर वह वैश्विक मंचों पर शांति की आवाज को मजबूत कर सकता है। यदि यह संघर्ष लम्बा चलता है तो आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। वैश्विक स्तर पर नए रणनीतिक गठबंधन बन सकते हैं। ऊर्जा स्रोतों के वैकल्पिक मॉडल विकसित हो सकते हैं और सैन्य तकनीक का तेजी से विस्तार हो सकता है। इसके साथ ही क्षेत्रीय संघर्षों का वैश्वीकरण भी सम्भव है- जहां छोटे युद्ध बड़े शक्ति-संघर्षों का हिस्सा बन जाते हैं।
इस संदर्भ में भारत के लिए यह समय केवल सावधानी का नहीं बल्कि अवसर का भी है। यदि भारत संतुलित, सक्रिय और दूरदर्शी कूटनीति अपनाता है तो वह न केवल विश्व की आवाज को मजबूत कर सकता है बल्कि एक वास्तविक वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभर सकता है। वर्तमान युद्ध के संदर्भ में भारत की भूमिका केवल शांति अपील तक सीमित नहीं रह सकती बल्कि सक्रिय कूटनीतिक हस्तक्षेप की अपेक्षा बढ़ रही है।
पश्चिम एशिया का वर्तमान संघर्ष हमें एक बार फिर यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि क्या शक्ति और प्रभुत्व की राजनीति ही मानव सभ्यता का अंतिम लक्ष्य है? 21वीं सदी का वास्तविक विकास युद्ध में नहीं बल्कि सहयोग, विज्ञान, तकनीक और मानव कल्याण में निहित है। यदि दुनिया इस संकट से यह सीख लेती है कि युद्ध कोई स्थाई समाधान नहीं होता और शांति ही एकमात्र रास्ता है तो यह वर्तमान युद्ध भी आने वाले भविष्य के लिए एक चेतावनी बन सकता है। अंततः मानवता के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है- क्या हम अपने मतभेदों को संवाद और कूटनीति के माध्यम से सुलझाएंगे या फिर युद्ध की आग में झुलसते रहेंगे? इस संदर्भ में जब हम सोचते हैं तो एक शेर याद आता है,
जंग कभी कामयाब नहीं होती ए दोस्त।
बस बर्बादी का एक लम्बा हिसाब छोड़ जाती है॥
बर्बादी का लम्बा हिसाब छोड़ता वर्तमान युद्ध और अल्बर्ट आइंस्टीन के चिंतन के अनुसार विश्व की सभ्यता को पीछे धकेल रहे वर्तमान युद्ध की स्थिति पर भारत पर इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने की जिम्मेदारी और अवसर भी है।

