दीपावली जैसे दीप जलाने का पर्व है, वैसे अपने भीतर के अंधकार को पहचानकर उसे प्रकाश में परिवर्तित करने का संकल्प भी है। भारत में त्योहार केवल कैलेंडर की तिथि नहीं होते, वे हमारे सामूहिक जीवन की स्मृति, संस्कार और चेतना के उत्सव होते हैं। दीपावली भी ऐसा ही एक पर्व है, जो हर वर्ष हमारे घरों में दीप जलाने के साथ-साथ मन और समाज में भी प्रकाश का संचार करता है। अंधकार पर प्रकाश की विजय, असत्य पर सत्य की विजय, निराशा पर आशा की विजय और अव्यवस्था पर व्यवस्था की विजय। दीपावली का मूल संदेश यही है, परंतु हर वर्ष जब दीपावली आती है, तब क्या हम केवल अपने ही घरों को रोशन करें? क्या हमारे आसपास का समाज, हमारा राष्ट्र और पूरी मानवता अंधकार से मुक्त हो रही है? इन प्रश्नों पर विचार किए बिना दीपावली का उत्सव अधूरा रह जाता है।
इस वर्ष जब हम दीपावली के दीप प्रज्वलित करेंगे, तब हमारे सामने बीते वर्ष की अनेक घटनाओं की स्मृतियां भी होंगी। कहीं मानवता ने असाधारण साहस और संवेदनशीलता दिखाई है तो कहीं मनुष्य की महत्वाकांक्षा ने प्रकृति और मानव जीवन के सामने गम्भीर प्रश्न खड़े किए हैं। अमेरिका-ईरान, रूस-यूक्रेन, इजरायल-हमास जैसे युद्ध की आग भड़क रही है, कहीं नेपाल जैसी त्रासदी पर्यावरणीय संकट मनुष्य को उसकी सीमाओं का एहसास करा रहा है और कहीं तकनीक तथा विकास की नई सम्भावनाएं भविष्य के द्वार खोल रही हैं। अभी हाल ही में हिमालय की गोद में नेपाल में आई भीषण बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़ी विनाशकारी आपदा ने पूरे दक्षिण एशिया को झकझोर दिया है। गांव, सड़कें, पुल और ऊर्जा परियोजनाएं ध्वस्त हुईं और हजारों परिवारों का जीवन प्रभावित हुआ। वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने हिमालय की बढ़ती संवेदनशीलता और जलवायु परिवर्तन से जुड़े संकट की ओर ध्यान आकर्षित किया है। हिमालय केवल पर्वतों की श्रृंखला नहीं है। वह एशिया के करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। उसकी नदियां हमारे खेतों को पानी देती हैं, हमारी सभ्यताओं को जीवन देती हैं। इसलिए हिमालय में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का प्रश्न केवल नेपाल, भारत या चीन का प्रश्न नहीं है, यह पूरी मानवता के भविष्य का प्रश्न है। प्रकृति हमें बार-बार चेतावनी देती है। प्रश्न यह है कि हम उसकी भाषा समझते कब हैं?
दूसरी ओर विश्व राजनीति का वातावरण भी बेचैन है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ा तनाव, पश्चिम एशिया में संघर्ष की आशंका और महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा यह संकेत देती है कि आज की दुनिया कितनी अस्थिर हो चुकी है। ऊर्जा, व्यापार, तकनीक, समुद्री मार्ग और सामरिक प्रभाव को लेकर दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच संघर्ष बढ़ रहा है। अमेरिका, चीन और रूस जैसी महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा का प्रभाव केवल उन देशों तक सीमित नहीं रहता, उसकी छाया पूरी दुनिया पर पड़ती है। भारत के लिए चीन और पाकिस्तान से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां भी इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में अधिक गम्भीर हो जाती हैं। ऐसे समय में भारत को केवल आर्थिक शक्ति नहीं बल्कि आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी, तकनीकी रूप से सक्षम और सामाजिक रूप से एकजुट राष्ट्र बनना होगा। यही वह संदर्भ है जिसमें ‘विकसित भारत’ का संकल्प केवल सरकार की योजना नहीं रह जाता। वह प्रत्येक भारतीय के जीवन का संकल्प बन जाता है।
भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सामने रखा है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल सरकारी योजनाएं और बड़ी-बड़ी परियोजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। इसके लिए नागरिकों की सोच, कार्यसंस्कृति, सामाजिक व्यवहार और राष्ट्रीय दृष्टि में भी परिवर्तन आवश्यक होगा। इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधान मंत्री ने भी सरकार, समाज, उद्योग, किसान, युवा और नागरिकों को मिलकर परिवर्तन की गति बढ़ाने का आह्वान किया है। विकसित भारत का अर्थ केवल बड़ा सकल घरेलू उत्पाद, चौड़ी सड़कें, ऊंची इमारतें और आधुनिक तकनीक नहीं है। विकसित भारत वह होगा, जहां व्यक्ति भी विकसित होगा, परिवार भी सशक्त होगा, समाज भी संवेदनशील होगा और राष्ट्र भी आत्मविश्वासी होगा।
अगले 10 वर्ष भारत के लिए निर्णायक हो सकते हैं। इस दशक में हमें अपने भीतर कई परिवर्तन करने होंगे। हमें अधिकार मांगने वाले नागरिक से कर्तव्य निभाने वाला नागरिक बनना होगा। हमें उपभोक्ता से उत्पादक बनने की मानसिकता विकसित करनी होगी। हमें जाति, भाषा, क्षेत्र और संकीर्ण पहचान से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकात्मता को मजबूत करना होगा। हमें प्रकृति से संघर्ष करने के बजाय उसके साथ सहअस्तित्व का मार्ग खोजना होगा। हमें तकनीक का उपयोग मनुष्य को जोड़ने के लिए करना होगा, तोड़ने के लिए नहीं और सबसे महत्वपूर्ण, हमें विकास को केवल भौतिक समृद्धि नहीं बल्कि मानवीय गरिमा और सामाजिक सद्भाव से जोड़ना होगा।
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में है। यह हमारी सबसे बड़ी शक्ति है, किंतु यही शक्ति यदि दिशा से भटक जाए तो सबसे बड़ी चुनौती भी बन सकती है। आज के युवा के हाथ में स्मार्टफोन है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता है, पूरी दुनिया की जानकारी है, परंतु क्या उसके पास उतनी ही स्पष्टता से जीवन का उद्देश्य भी है? आज आवश्यकता केवल रोजगार की नहीं, रोजगार देने वाली मानसिकता की है। केवल तकनीकी दक्षता की नहीं, चरित्र की भी है। केवल सफलता की नहीं, सफलता के सामाजिक उपयोग की भी है। यदि भारत का युवा अपनी ऊर्जा को राष्ट्रनिर्माण से जोड़ देता है तो अगले 10 वर्ष भारत के इतिहास के सबसे निर्णायक दशक बन सकते हैं, किंतु यदि वही ऊर्जा असंतोष, हिंसा, नशे, डिजिटल भ्रम और सामाजिक विभाजन की ओर चली गई तो यही शक्ति हमारे सामने संकट बनकर खड़ी हो सकती है। इसलिए दीपावली का दीप हमें यह भी पूछने के लिए प्रेरित करता है, हम अपने युवाओं के भीतर कौन-सा प्रकाश जला रहे हैं?
आज दुनिया की एक बड़ी चिंता हिंसा है। युद्धों से लेकर समाज के भीतर बढ़ते तनाव तक, हिंसा के अनेक रूप हमारे सामने दिखाई देते हैं। विचारों का मतभेद संवाद के बजाय संघर्ष में बदल रहा है। असहमति को शत्रुता समझने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे समय में भारत की प्राचीन चेतना हमें एक अलग रास्ता दिखाती है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ यह केवल प्रार्थना नहीं बल्कि जीवन-दृष्टि है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यह केवल श्लोक नहीं बल्कि विश्व को देखने का भारतीय दृष्टिकोण है। इसी भारतीय दृष्टि की प्रासंगिकता आज विश्व के सामने फिर से उपस्थित हो रही है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में भारत की इस व्यापक दृष्टि को दुनिया के विभिन्न समाजों के सामने रखने का प्रयास कर रहा है। अमेरिका के न्यूयॉर्क में 29 अगस्त को आयोजित ‘णपर्ळींशीीरश्र जपशपशीी उशश्रशलीरींळेप’ में पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने विविधता में एकता और मानवता की एकात्मता पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने भारत की विशेषता को र्‘ीपळीूं ळप वर्ळींशीीळीूं’ की चेतना से जोड़ा। इसके बाद कनाडा में भी उन्होंने भारत की उस परम्परा को रेखांकित किया, जिसमें अलग-अलग मत-पंथों और समुदायों को साथ लेकर चलने की भावना रही है। यह संवाद केवल संघ का परिचय कराने का प्रयास नहीं है। यह भारत की उस जीवन-दृष्टि को दुनिया के सामने रखने का अवसर है, जो विविधता को संघर्ष नहीं, सौंदर्य मानती है और शक्ति को प्रभुत्व नहीं, सेवा का माध्यम मानती है।
भारत के भविष्य की चर्चा करते समय ‘महाशक्ति’ बनने की बात स्वाभाविक रूप से सामने आती है, पर भारत की वास्तविक शक्ति केवल सैन्य या आर्थिक सामर्थ्य में नहीं होगी। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान, लोकतांत्रिक चेतना, विविधता और मानवता के प्रति दृष्टि में है। भारत यदि विकसित होता है और उसके विकास से केवल भारत का लाभ होता है तो वह विकास अधूरा है। भारत का विकास तब सार्थक होगा जब वह दुनिया को भी अधिक शांत, सुरक्षित, समतामूलक और मानवीय बनाने में योगदान देगा। यही कारण है कि ‘विकसित भारत’ का अंतिम लक्ष्य केवल समृद्ध भारत नहीं बल्कि समर्थ भारत और संवेदनशील भारत होना चाहिए।
दीपावली की कथा में श्रीराम का अयोध्या लौटना केवल एक राजा की वापसी नहीं है। यह धर्म की स्थापना, अन्याय पर न्याय की विजय और लम्बे अंधकार के बाद आशा के लौटने का प्रतीक है। इसीलिए दीपावली के दीप बाहर जलाने से पहले भीतर जलाने की आवश्यकता है। हमारे भीतर का स्वार्थ बुझना चाहिए। हमारे भीतर की हिंसा बुझनी चाहिए। हमारे भीतर का अहंकार बुझना चाहिए। हमारे भीतर का निराशावाद बुझना चाहिए और उसके स्थान पर कर्तव्य, करुणा, परिश्रम, सत्य, आत्मविश्वास और राष्ट्रभाव का दीप जलना चाहिए। एक घर का दीप दूसरे घर को रोशन करता है। एक व्यक्ति का परिवर्तन परिवार को बदलता है। एक परिवार का परिवर्तन समाज को बदलता है और समाज का परिवर्तन राष्ट्र का भविष्य बदल सकता है। यही दीपावली का वास्तविक सामाजिक दर्शन है।
2047 का विकसित भारत आज से ही बनना शुरू होगा। उसके लिए हमें केवल सरकार से अपेक्षाएं नहीं करनी हैं, हमें स्वयं से भी प्रश्न करने हैं। हम अपने राष्ट्र के लिए क्या कर सकते हैं? हम अपने काम में कितनी निष्ठा ला सकते हैं? हम अपने परिवार में कितना संस्कार और संवाद ला सकते हैं? हम अपने समाज में कितना सहयोग कर सकते हूैं? हम प्रकृति के प्रति कितने दायित्ववान हो सकते हैं? हम अपने बच्चों और युवाओं को केवल सफलता नहीं, जीवन का उद्देश्य कैसे दे सकते हैं? इन छोटे-छोटे प्रश्नों के उत्तर ही बड़े राष्ट्रीय परिवर्तन का आधार बनेंगे।
इन प्रश्नों को समाज के सामने रखना ही हिंदी विवेक मासिक पत्रिका के पत्रकारिता का दायित्व है। हिंदी विवेक की यात्रा इसी दायित्व की यात्रा है। राष्ट्रीय जीवन के विविध प्रश्नों पर सकारात्मक, वैचारिक और राष्ट्रहित केंद्रित पत्रकारिता को सामने रखना हिंदी विवेक की परम्परा रही है। समय बदला, समाज बदला, तकनीक बदली, पत्रकारिता के माध्यम बदले, परंतु राष्ट्र और समाज के प्रति हमारी प्रतिबद्धता नहीं बदली। आज हिंदी विवेक अपने वैभवशाली राष्ट्रीय पत्रकारिता प्रवास के एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर खड़ा है। हमारा प्रयास रहा है कि समाचारों के शोर के बीच समाज के सामने विचार का एक शांत, संतुलित और सकारात्मक स्वर भी उपस्थित हो। हम समस्याओं को छिपाना नहीं चाहते, पर समस्याओं के साथ समाधान की सम्भावना को भी कभी समाप्त नहीं मानते क्योंकि हमारा विश्वास है, अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, एक दीप उसके अस्तित्व को चुनौती देने के लिए पर्याप्त होता है।
इस दीपावली विशेषांक को आकार देने में जिन मान्यवर लेखकों, चिंतकों, विशेषज्ञों और विविध क्षेत्रों के अनुभवी व्यक्तित्वों ने अपने विचार, लेख, साक्षात्कार और वैचारिक सामग्री देकर हमारा सहयोग किया है, उन मान्यवर लेखकों के प्रति हिंदी विवेक अपनी हार्दिक कृतज्ञता और विशेष आभार व्यक्त करता है। ‘विकसित भारत’ के संकल्प से लेकर भारत के सामाजिक, राष्ट्रीय और सांस्कृतिक जीवन की चुनौतियों तक तथा वैश्विक परिस्थितियों से लेकर आने वाले भारत की सम्भावनाओं तक अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर इन लेखकों ने अपने अनुभव, अध्ययन और चिंतन के माध्यम से इस विशेषांक को समृद्ध करने का प्रयास हिंदी विवेक के माध्यम से किया है। मान्य एवं मान्यवर और विशेषज्ञों के आलेख केवल इस दीपावली विशेषांक की सामग्री नहीं बल्कि हमारे समय को समझने और भविष्य की दिशा पर विचार करने का एक सार्थक प्रयास है। हम आशा करते हैं कि इन विचारों से हमारे पाठकों के मन में भी नए प्रश्न जन्म लेंगे, नए विचारों का संचार होगा और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में अपनी भूमिका निभाने की प्रेरणा मिलेगी। इन सभी सम्माननीय लेखकों और सहयोगियों के प्रति हिंदी विवेक की ओर से पुनः हृदय से धन्यवाद और कृतज्ञता।
इस दीपावली में जब हम अपने घर के द्वार पर दीप जलाएं तो एक दीप उस भारत के नाम भी जलाएं जिसे हम 2047 में देखना चाहते हैं। एक ऐसा भारत जो आर्थिक रूप से समृद्ध हो, तकनीकी रूप से सक्षम हो, सामरिक रूप से सुरक्षित हो, सामाजिक रूप से समरस हो, पर्यावरण के प्रति सजग हो, युवाओं के सपनों को अवसर देता हो और अपनी संस्कृति पर गर्व करते हुए पूरी मानवता के कल्याण की कामना करता हो। एक ऐसा भारत, जो दुनिया से केवल यह न कहे कि हम शक्तिशाली हैं बल्कि यह भी कहे कि हम आपके साथ हैं।
दीपावली का दीप हमें यही संदेश देता है, प्रकाश अपने पास रखने के लिए नहीं बांटने के लिए होता है। आइए, इस दीपावली हम केवल दीप न जलाएं बल्कि संकल्प जलाएं। अपने भीतर परिवर्तन का, अपने परिवार में संस्कार का, समाज में समरसता का, राष्ट्र में आत्मविश्वास का और विश्व में शांति का। अंधकार को कोसने के बजाय एक दीप जलाना ही भारतीय जीवन-दृष्टि है।
इसी विश्वास के साथ हिंदी विवेक परिवार की ओर से हिंदी विवेक मासिक पत्रिका के सभी पाठकों, शुभचिंतकों, लेखकों और सहयोगियों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। यह दीपावली आपके जीवन में सुख, समृद्धि, स्वस्थ्य जीवन और शांति का प्रकाश लेकर आए। आपके परिवार का दीपक सदैव प्रज्वलित रहे और हमारे राष्ट्र का दीप आने वाले दशक में और अधिक प्रकाशमान हो।
आइए, हम सब मिलकर उस उज्ज्वल भारत की ओर बढ़ें, जो विकसित भी हो, समर्थ भी हो और विश्व के कल्याण के लिए समर्पित भी हो।
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!


