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अस्पताल में या बिस्तर पर मरणासन्न अवस्था में जी रहे किसी व्यक्ति को जीवनरक्षक प्रणालियों के सहारे जिंदा न रखते हुए उसे जीवन से मुक्ति दिलाने को सर्वोच्च न्यायालय ने सशर्त मंजूरी दी है। अदालत ने भारतीय संविधान में निर्देशित व्यक्ति के सम्मानपूर्वक जीने के व्यापक अर्थ को स्पष्ट करते हुए व्यक्ति की सम्मानपूर्वक मृत्यु को भी उचित करार दिया है। मृत्यु का भी सम्मान करने वाला यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा। इच्छा मृत्यु के आंदोलन का विरोध करने वाले लोगों का दावा था कि जिस
तरह जन्म लेना सजीवों की ऐच्छिक प्रक्रिया न होकर प्राकृतिक प्रक्रिया होती है, उसी तरह मृत्यु भी ऐच्छिक नहीं वरन प्राकृतिक प्रक्रिया होनी चाहिए। दूसरी ओर इच्छा मृत्यु का समर्थन करने वालों का कहना था कि जन्म हमारे हाथ में नहीं है यह सच है लेकिन मृत्यु तो हमारे हाथ में होनी चाहिए! कानून को इसमें रोड़ा नहीं बनना चाहिए। इस विषय पर कई वर्षों तक बहस जारी रही। अंतत: सर्वोच्च न्यायालय ने इच्छा मृत्यु को हरी झंडी दे दी।

मानवीय जीवन के किसी भी मोड़ पर मौत दस्तक देती है। इसलिए वह सदैव ही विचारकों तथा संशोधकों के चिंतन का विषय रही है। हमारे सभी धर्म ग्रंथों में मरणोपरांत जीवन के संदर्भ में मार्गदर्शन करने वाला तत्वज्ञान मौजूद है। जीवित होने का सब से सजीव लक्षण अगर कोई है तो वह है ‘मृत्यु’; क्योंकि मृत्यु प्रकृति का वह आविष्कार है जो सिर्फ और सिर्फ जीवित व्यक्ति को मिलता है। मृत्यु कोई नहीं चाहता। सभी यह प्रयास करते हैं कि उसे अधिक से अधिक दूर कैसे रखा जाए। जीवित लोगों की जैविक प्रक्रिया रुकने को हम मृत्यु कहते हैं। यह घटना जिस प्रकार नैसर्गिक रूप से वृद्ध होने पर होती है, उसी प्रकार युद्ध में, प्राकृतिक आपदा में, दुर्घटना में या हत्या जैसे जुर्म में भी घटित हो सकती है। मृत्यु की अनिश्चितता ही उसके प्रति भय का प्रमुख कारण है। लिहाजा, मृत्यु ही जीवन का अंतिम सत्य है इस सच्चाई को स्वीकार करना आवश्यक है।

न केवल जीने का बल्कि सम्मानपूर्वक जीने का हक कानून ने सभी को दिया है। लेकिन यदि सम्मानपूर्वक जीवित रहना अगर सम्भव न हो तो केवल मृत्यु नहीं हो रही है इसलिए जीवित रहने का क्या अर्थ है? ऐसी निराशा जिन लोगों के मन में घर करने लगती है उनकी मरने की इच्छा अधिक प्रबल होने लगती है। जीवन से त्रस्त हो चुके या समृद्ध जीवन जीने के उपरांत मृत्यु की प्रतीक्षा करने वाले लोग हम अपने आस-पास देखते हैं। कई घरों में अस्सी-पचासी वर्ष के बीमार वृद्ध केवल मृत्यु नहीं होती इसलिए जीवित दिखाई देते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्ति के जीवित रहने का व्यापक अर्थ बताते हुए इच्छा मृत्यु के संदर्भ में भले ही सशर्त मान्यता दी हो परंतु यह विषय यहीं खत्म नहीं होता। यह निर्णय ऐसे सभी मामलों को लागू नहीं होगा कि बस इच्छा व्यक्त कर दी और मृत्यु हो गई, डॉक्टर ने इंजेक्शन लगाया और चल बसे। इच्छा मृत्यु की अनुमति की एक प्रक्रिया होगी, जिसके लिए सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ महत्वपूर्ण दिशानिर्देश दिए हैं। इनमें प्रमुख बात यह है कि अगर कोई व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है और भविष्य में उसके ठीक होने की बिल्कुल संभावना नहीं है तो ऐसी अवस्था में वेंटिलेटर जैसे जीवन रक्षक उपकरणों पर महज जिंदा न रखते हुए उसे इच्छा मृत्यु दे दी जाए। परंतु इसके पूर्व विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक समिति मामले की सम्पूर्ण जांच कर एक प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगी और इसके बाद ही कोई निर्णय किया जाएगा।

न्यायालय का निर्णय, मार्गदर्शक निर्देश भले ही निश्चित हों, उसके पीछे की भावनाएं चाहे कितनी भी ठीक हों फिर भी यह कहा नहीं जा सकता कि इसका दुरुपयोग नहीं होगा। कानून की त्रुटियों का फायदा उठाना, कानून न मानना या कानून के विपरीत कार्य करना ही अपराधों की नींव होती है। इसलिए इच्छा मृत्यु के बारे में ऐसा स्पष्ट, सख्त कानून बनना चाहिए कि कानून का दुरुपयोग करने वालों के बचने के रास्ते ही न रहे। इससे ही मरणासन्न अवस्था में या जीने की आशा खो चुके लोगों के प्रति न्याय हो सकेगा।

जन्म भी ऊपरवाले के हाथ में है और मौत भी ऊपरवाले के हाथ में ही है, इस भोली-भाली भावना से बाहर निकल कर हमें इच्छा मृत्यु की ओर तार्किक दृष्टि से देखना चाहिए। हम तभी मृत्यु के सम्मान के सही मायने समझ सकेंगे और इच्छा मृत्यु के संदर्भ में कानून हमें उचित लगेगा। कानून व्यक्ति के जीवन के लिए सहायक होते हैं, परंतु उनका लचीला होना भी आवश्यक है। समाज को भी उसी तरह के परिवर्तन पर सोचना चाहिए। कल की समस्याएं, प्रश्न आज नहीं हैं; कल की समाज व्यवस्था, परिवार व्यवस्था आज नहीं है। अत: सामाजिक व्यवस्था को भी उसी के अनुसार बदलना होगा। समय के किसीभी मोड़ पर व्यक्ति का जीवन रुकना नहीं चाहिए। बरसों से चली आ रही कई बातों को हम छोड़ चुके हैं। कानून और समाज व्यवस्था इंसानों के लिए ही बनाई गई है। इंसानों को ही उसमें समय और परिस्थिति के अनुरूप बदलाव करने होंगे। सब से महत्वपूर्ण यह है कि वृद्धों या रोगियों के द्वारा इच्छा मृत्यु की मांग करना ही भारतीय समाज के लिए कलंक की तरह है। उनकी इस भावना की जड़ निराशा है। अकेले जीवन जीने का कोई अर्थ नहीं है, यह भावना वृद्धों में निर्माण होना ही गलत है। जीवन के अंतिम समय में ‘मृत्यु किस तरह हो’ इस प्रश्न का उत्तर कानून के जरिए प्राप्त करना पड़े, यह समाज के गिरते ग्राफ का द्योतक है। हमें हमारे परिवार के वृद्धों को सम्मान से जीने का अवसर देना होगा। यह हमारी जिम्मेदारी है। यह एक चुनौती है। इसे स्वीकार करने की क्षमता हम में जब तक नहीं आती तब तक कानून के आधार पर सम्मान से मरने का मार्ग प्रशस्त करने में कोई बुराई नहीं दीखती। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के इच्छा मृत्यु को वैध करार देने के फैसले को समय के साथ कदम मिलाने वाला मानना होगा।

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