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 बिहार विधान सभा चुनाव में नीतिश कुमार, लालू प्रसाद यादव     एवं कांग्रेस के महागठबंधन को भारी सफलता मिली; जबकि भारतीय जनता पार्टी अपेक्षा से बहुत कम सीटें पाकर पराजित हुई। बिहार का चुनाव और उसके परिणाम देश की राजनीति पर बहुत बड़ा प्रभाव डालने वाले हैं। भविष्य में देश में प्रमुख विरोधी दल अत्यंत आक्रामक होंगे, इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता।

      हजारों वर्षों से अपने देश में जाति प्रथा कायम है। स्वाधीनता के बाद जाति प्रथा को खत्म करने का निर्धार किया गया, लेकिन प्रत्यक्ष में राजनीतिक चौसर पर जाति घटकों का बड़े पैमाने पर बड़ी खूबी से इस्तेमाल किया जाता रहा है। इससे ही जातिगत अस्मिता जगाकर राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करने का प्रयास हुआ। बिहार राज्य का चुनाव इसका बेहतर उदाहरण है। चुनाव में जाति के हथियार का किस तरह इस्तेमाल करें, जातीय समीकरण किस तरह कायम करें इसमें माहिर लालू प्रसाद यादव ने नीतिश कुमार के साथ मिलकर बिहार की सत्ता काबिज की। भाजपा का ही विचार करें तो बिहार की जनता ने लोकसभा में भाजपा को भरपूर सीटों पर विजय दिलाई थी। इसीलिए वही बिहारी जनता इस बार भी भाजपा को निर्विवाद सफलता दिलाएगी, यह भाजपा को लगता था। नरेंद्र मोदी की बिहार के हर इलाके में अनेक सभाएं हुईं। प्रचार में प्रचंड संख्या में जनता की मौजूदगी दिखाई दे रही थी। प्रचार में लहर उफनती दिखाई दी। लेकिन इस लहर का पानी किनारे तक पहुंचने के पूर्व ही थम गया। कुछ स्थानों पर लहर में पानी कम और फेन ही अधिक दिखाई दी। विकास का पक्ष लें या जातियों में उलझी राजनीति का पक्ष लें; इसमें बिहार की जनता की दुविधाजनक स्थिति में रही है, यह चुनाव के निर्णय से लगता है। यह भी कहा जा सकता है कि दोनों मुद्दों पर यह मिश्रित फैसला है। नीतिश कुमार के पिछले दस वर्षों के कार्यकाल में बिहार की जनता को विकास के सपने आने लगे थे। इससे विकास के लिए बिहार की जनता नीतिश कुमार की ओर झुकती भले दिखाई दे; लेकिन लालू प्रसाद यादव एवं राबड़ी देवी के कार्यकाल में बिहार को ‘जंगलराज’ की उपाधि मिली हुई थी। उस लालू प्रसाद यादव को सर्वाधिक सीटें बिहारी जनता ने दी है। इससे विकास और जाति की राजनीति में बिहार की जनता उलझी दिखाई देती है। केवल चैनलों पर बिहारी शैली के हावभाव कर राजनीति में  बंदरकूद करने वाले लालू प्रसाद यादव पिछले अर्थात २०१० के विधान सभा चुनाव में करीब-करीब राजनीतिक मौत की शैया पर पहुंच चुके थे। लेकिन उसी बिहारी जनता ने लालू प्रसाद की जातिगत राजनीति के आधार पर उनका पुनर्जन्म कर दिया है, यह २०१५ के विधान सभा चुनाव ने स्पष्ट कर दिया है। लालू प्रसाद यादव को पुनः बिहार की राजनीति में प्रतिष्ठा दिलाने का अर्थ है, फिर से बिहार में ‘जंगलराज’ शैली की राजनीति को निमंत्रण देना।

       प्रचार के आरंभ में विकास का मुद्दा लेना और बाद में भाजपा ने जिस पद्धति से आरक्षण का आधार लिया, वह भी भाजपा की मर्यादाओं को स्पष्ट करने वाला साबित हुआ। बिहार के चुनाव में भाजपा को प्राप्त यह अनुभव, भाजपा के लिए एक सबक है। देश में गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार इन मुद्दों की ओर गंभीरता से देखने का समय अब आ गया है। ‘मन की बात’ के साथ ‘जन की बात’ समझने की जरूरत है। इस पराजय को भाजपा ने एक चेतावनी के रूप में स्वीकार करना चाहिए। २०१४ के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जितने वोट मिले थे, उसकी तुलना में इस बार के विधान सभा चुनाव में पार्टी को आठ फीसदी वोट अधिक मिले। २०१४ के लोकसभा चुनाव में जनता दल यूनाइटेड़, जनता दल और कांग्रेस ये तीनों दल स्वतंत्र रूप से भाजपा के विरोध में लड़े थे और उसका लाभ भाजपा को मिला था। लेकिन इस विधान सभा चुनाव में ये तीनों दल एक हुए और भाजपा को परास्त करने के इरादे से या स्वार्थ के कारण एक-दूसरे के साथ रहे। इसलिए भाजपा की पराजय हुई।

      इस चुनाव में सर्वाधिक सीटें पाने वाले लालू प्रसाद यादव अपने परम्परागत कट्टर विरोधी और फिलहाल स्वार्थ के कारण मित्र बन गए बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार को बिहार का राजकाज स्वस्थ रूप से चलाने देंगे, ऐसा नहीं लगता। राजनीतिक आत्महत्या करने जितने लालू प्रसाद यादव अपरिपक्व नहीं हैं। सर्वाधिक सीटें पाने वाले लालू अगले पांच वर्षों में नर्म राजनीति करेंगे, इसका कोई विश्वास नहीं दिला सकता। नीतिश कुमार के खिलाफ कब उग्र रूप धारण करना इसके चरण भी लालू ने तय किए ही होंगे। इससे बिहार के मुख्यमंत्री किस तरह राह निकालते हैं, यह समय ही तय करेगा।

      फल से लदा वृक्ष झुक जाता है। सफलता व्यक्ति को नम्र बना देती है। यह नम्रता नीतिश कुमार के विजय के बाद किए गए बयानों में झलकती है। लेकिन लालू प्रसाद यादव बड़ी-बड़ी वल्गनाएं करने से नहीं चूके हैं, ‘‘बिहार की इस विजय से कल देश में भाजपा विरोधी माहौल मथने वाला है। देश भर में भाजपा विरोधी प्रचार के लिए निकलेंगे आदि।’’ इससे देश भर में भाजपा विरोधी लहर लाने वाले हैं। लालू की बंदरकूद के कारण उनके कार्यकाल में बिहार में विकास का हौवा ही खड़ा हुआ। नीतिश कुमार ने बिहारी जनता की विकास के बारे में आकांक्षाओं को खादपानी दिया। लेकिन सच यह है कि राजनीति में कब किसका नसीब चमक उठेगा, कह नहीं सकते। बिहार में लालू प्रसाद को सर्वाधिक सीटें मिलने से तो ऐसा ही लगता है। जिन्होंने यह दुविधापूर्ण मतदान किया है, वह सर्वशक्तिमान जनता बिहार राज्य का कामकाज कैसे चलता है, वह देखेगी ही।  लेकिन गहराई से विचार करें तो लालू नीतिश कुमार को शांति से राज्य चलाने देंगे, ऐसा लगता तो नहीं है। अतः बिहार जनता तथा नीतिश कुमार को अगले मार्गक्रमण के लिए शुभेच्छाओं की वाकई जरूरत है!

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