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हम सब एक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में बदलावों की गति बहुत तीव्र रही है। इसका हमारे व्यवहारों के स्वरूप और जीवनशैली पर भी प्रभाव पड़ रहा है। तकनीकी क्रांति के कारण पिछले कुछ दशकों में भारतीय के रूप में हम प्रचंड वेगवान परिवर्तन अनुभव कर रहे हैं। इन बदलावों के केंद्र में मानवी जीवन है। इसलिए यह प्रश्न उभरना स्वाभाविक है कि न जाने कल की दुनिया कैसी होगी?

वर्तमान काल में डिजिटल, सूचना प्रौद्योगिकी आज की दुनिया के तारणहार शब्द बन गए हैं। कल की दुनिया में भी उसका दबदबा बना रहनेवाला है। इन सारे परिवर्तनों को भारतीय समाज ने भी स्वीकार किया है। इस स्वीकृती के कारण ही भारत के विकास को आज दिशा मिली है, यह निस्संदेह है। इस अत्याधुनिक तंत्रज्ञान के जरिए दुनिया और अधिक करीब आ गई है। लोग ऑनलाइन व्यवहार करने लगे हैं। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। नई तकनीकों के कारण हजारों किस्म की सूचनाओं और व्यवहारों का तेजी से आदान-प्रदान हो रहा है। इस तरह के कई चमत्कार तंत्रज्ञान की सहायता से हो रहे हैं। जब हर क्षण इसे हम अनुभव कर रहे हैं, तब यह यक्षप्रश्न भी उठना लाजिमी है कि आनेवाले कल की दुनिया कैसी होगी? क्या-क्या बदलाव उसमें होंगे?

स्वाधीनता के बाद भारतीय समाज के रूप में हमने तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ना शुरू किया। लेकिन क्या इस भौतिक प्रगति को ही हम आधुनिकता मानें? हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में, हमारी अनुभूतियों में विवेकी परिवर्तन होना चाहिए? आधुनिकता का अर्थ यही है। आधुनिकता शब्द में अनेक मूल्यों का समावेश होता है। इन मूल्यों के लक्षण भी होते हैं। भारतीय समाज में आधुनिकता के विवेकी लक्षण दिखाई दें तो कह सकते हैं कि समाज आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है। भारतीय समाज बाहरी रूप से तो आधुनिक दिखाई देता है, किंतु क्या वह अंतर्मन से भी वाकई आधुनिक बन गया है? पिछले कुछ दशकों में तंत्रज्ञान में हुई चमत्कारिक प्रगति क्या आधुनिकता की दिशा में चल रहा परिपूर्ण सफर है? मतलब, क्या हम आधुनिक हैं? या कि हम आधुनिक बन रहे हैं? इन प्रश्नों के जवाब ढूंढ़ने के निश्चित पैमाने क्या हैं?

व्यक्ति विचार कर सकता है। विचार किसका करें? विचार इस बात का करें कि अच्छा क्या है, बुरा क्या है; उचित क्या है, अनुचित क्या है?बहुत सरसरी तौर पर कहना हो तो देश का आदर्श समाज व्यवस्था की दिशा में मार्गक्रमण करना ही आधुनिकता है। समाज की आधुनिकता का रिश्ता समाज की समकालीन धारणाओं से जुड़ा होता है। क्या हम पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलीं और पनपी अंधश्रद्धाओं को विवेकपूर्ण तरीके से परखते हैं? भारतीय समाज रूढ़िवादिता से घिरा है। उन रूढ़ियों के बारे में क्या हम नीर-क्षीर विवेक रखते हैं? क्या हम उन्हीं मान्यताओं को स्वीकार कर रहे हैं जो आवश्यक और स्वीकारयोग्य हैं? सुशिक्षित और शिक्षित भारतीय समाज क्या कड़े धार्मिक बंधनों में शिथिलता लाने का प्रयास कर रहा है? सामाजिक-धार्मिक घटनाओं पर ‘भावुक अथवा सामूहिक’ प्रतिक्रिया देने के बजाय क्या हम वैचारिक स्तर पर समन्वयात्मक चर्चा करते हैं? भारतीय के रूप में हमारे समाज का वैचारिक स्तर क्या सुधर रहा है? अन्य के विचारों का आदर, समानता का आग्रह करनेवाले मूल्य आधुनिकता की कसौटी है। यांत्रिकीकरण के बाद वैश्विक स्तर पर हुए बाह्य परिणामों का अपनाते हुए आधुनिकता की दिशा में जानेवाले भारतीय समाज का इस दिशा में सोचना अनिवार्य है।

आधुनिकता की इस दौड़ में कल शायद व्यक्ति को दीर्घ आयु प्राप्त हो, उसका यौवन लम्बे समय तक बना रहे। कल कार भी उड़ने लगे। हवाई जहाजों, ट्रेनों, वाहनों की गति और बढ़े। 300-400 मंजिलों की महाकाय इमारतों में स्कूल, कॉलेज, मैदान, सभागृह, थिएटर, अस्पताल जैसी किसी शहर में उपलब्ध सभी सुविधाएं हो; यहां तक कि स्मशान भूमि भी हो। मनुष्य की आवश्यकता, व्यावहारिक क्षमता और तकनीकी का समन्वय हो जाए तो कोई बात असंभव नहीं लगेगी। इन सभी बातों की ओर देखने पर एक प्रश्न अवश्य उपस्थित होता है कि केवल तकनीकी प्रगति से उत्पन्न यह महाकाय और प्रचंड आधुनिकता क्या भारतीय मन को सुख प्रदान करेगी? इस प्रश्न का उत्तर फिलहाल तो नहीं ही देना होगा।

जाति-पांति, लिंग, वर्ग आदि भेदभाव न करते हुए, जाति-पंथ के आधार पर ‘आरक्षण’ न मांगते हुए, उसके लिए देश की व्यवस्था को बंधक न बनाते हुए, उपद्रव न करते हुए कुल योग्यता के पैमाने तय कर सबको समान अधिकार देना आवश्यक है। सबको भारत के विकास में समान अवसर प्राप्त होने की जरूरत है। सभी समूहों के आर्थिक वर्गों की एक-दूसरे में समरसता, निचले तबके के लोगों को ऊपर के वर्गों में जाने के लिए जातियों के भीतर विरोध न होना, इसके लिए सबसे प्रोत्साहन प्राप्त होना, महिलाओं को सभी क्षेत्रों में समान न्याय दिलाना, उनकी ओर देखने का विकृत दृष्टिकोण बदलना, देश में परिवर्तन के लिए मतदान करते समय ‘राष्ट्र विकास’ को ध्यान में रखकर ही वोट देना जैसे अनेक मुद्दे सामाजिक आधुनिकता की कक्षा में आते हैं। ये सारे पैमाने वर्तमान भारतीय समाज को लगाए तो लगेगा कि हमने अच्छी प्रगति की है; लेकिन राष्ट्र के रूप में, समाज के रूप में वैचारिक विशालता के बारे में हम सामाजिक विकास नहीं कर पाए। लगता है, इस बारे में हम पिछड़ गए हैं। केवल बाहरी आधुनिकता की ओर न देखते हुए हमारे समाज में और उसके अंतर्मन में ‘सामाजिक अत्याधुनिकता’ पूरी तरह रिसेगी तभी सच्चे अर्थ में भारत के विकास का चक्र पूरा होगा।

 

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