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लोकतंत्र की मजबूती संवाद की गुणवत्ता में है

लोकतंत्र की मजबूती संवाद की गुणवत्ता में है

by अमोल पेडणेकर
in देश-विदेश
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किसी विचारक ने अत्यंत सही बात कही है कि “जब राजनीति में भाषा का पतन होता है, तब विचार भी पतन की ओर बढ़ते हैं।” भारतीय राजनीति में हाल के वर्षों में ‘भाषा का स्तर’ लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आतंकवादी शब्द का इस्तेमाल किया। यह केवल बयान को अलग अर्थ में समझने या जुबान फिसलने का मामला नहीं, भारतीय राजनीति में भाषा के गिरते स्तर का प्रतीक है।

मल्लिकार्जुन खरगे ने हालांकि बाद में सफाई दी, लेकिन तब तक तो हानि हो चुकी थी। ताजा विवाद में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में आपत्तिजनक शब्द के प्रयोग ने राजनीतिक नेताओं द्वारा होने वाले संवाद और उसके परिणामों की बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है।

Didn't call PM Modi a terrorist,' Kharge clarifies remarks; accuses him of  'terrorising' political opponent - The Hindu

लोकतंत्र में असहमति और आलोचना का महत्वपूर्ण स्थान है। विपक्ष का दायित्व ही सरकार से प्रश्न पूछना और उसकी नीतियों की समीक्षा करना है, किंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि आलोचना की भाषा संयमित और मर्यादित रहे। जब शब्दों की सीमा टूटती है, तो संवाद की गुणवत्ता गिरती है और मुद्दों से ध्यान भटककर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप पर आ जाता है।

तमिलनाडु जैसे राज्यों में चुनाव के दौरान जब रोजगार, महिला सशक्तिकरण, भाषा नीति और सामाजिक न्याय जैसे गंभीर मुद्दे चर्चा के केंद्र में होने चाहिए, तब देश के प्रधान मंत्री पर ऐसे विवादित बयान विमर्श को भटका देते हैं। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गुणवत्ता प्रभावित होती है। राजनीति में भाषा का पतन केवल राजनीतिक वर्ग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। जब मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ही मर्यादा का पालन नहीं करता, तो सार्वजनिक संवाद में भी कटुता और असहिष्णुता बढ़ती है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर कर सकती है।

Congress leader Mallikarjun Kharge targets PM Modi for 'not keeping  promises'

इससे पहले भी कांग्रेस और विपक्ष ने मोदी पर लाखों अपशब्दों की बौछार की है, जिनमें ‘मौत का सौदागर’, ‘चौकीदार चोर है’, ‘भस्मासुर’ जैसे शब्द शामिल हैं। कांग्रेस की वरिष्ठ नेताओं द्वारा नरेंद्र मोदी जी को अब तक जितने भी अपशब्द कहे गए हैं, वे सब अत्यंत घृणा के साथ कहे गए हैं, लेकिन फिर भी नरेंद्र मोदी के संदर्भ में जनता का विश्वास जरा भी कम होता दिखाई नहीं दे रहा है। अब कांग्रेस ने देश के प्रधान मंत्री को ‘आतंकवादी’ कहकर अपमानित किया है।

खरगे की इन भद्दी टिप्पणियों से उनका गुस्सा साफ झलकता है। खरगे और कांग्रेस की रगों में मोदी के प्रति कितनी गहरी नफरत है, यह उनकी ऐसी टिप्पणियों से स्पष्ट है। इसीलिए खरगे ने मोदी को ‘आतंकवादी’ तक कह दिया।
यह समस्या किसी एक दल या नेता तक सीमित नहीं है। पिछले वर्षों में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा एक-दूसरे के लिए कठोर और कई बार आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया है। चुनावी राजनीति में तीखी बयानबाज़ी को अक्सर रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे समर्थकों का ध्रुवीकरण हो सके और राजनीतिक लाभ लिया जा सके।

प्रश्न है कि नेता बिगड़े बोल क्यों बोलते हैं? दरअसल उनसे जुड़े विशिष्ट मतदाता समूह को अपने साथ बनाए रखने का हथकंडा होता है। किसी के खिलाफ बोलकर या उसकी भावनाओं को आहत करके वे उसके विरोधियों को खुश करने की कोशिश कर रहे होते हैं। इसलिए वे अपने मतदाता समूह के विरोधियों को निशाना बनाते हैं। गरिमा और मर्यादा को भूल जाते हैं। वोट बैंक की राजनीति में अक्सर नेता चाहते हैं कि लोग ‘हम बनाम वे’ में बंट जाएं। इसके लिए वे सख्त या विवादास्पद बयान से लोगों की भावनाएं भड़काने वाले तीखा या विवादास्पद बयान देंगे, तो सुर्खियों में आएंगे। इससे उनका एक खास वर्ग उनसे जुड़ा महसूस करता है। इस ध्रुवीकरण से वे वोटों की फसल काटते हैं। नेता अपने विवादास्पद बयानों से मतदाताओं की भावनाओं को उकसाते हैं।

इस कारण ज्यादातर नेता जानबूझकर सख्त भाषा इस्तेमाल करते हैं, ताकि विपक्षी घबराए या जवाबी गलती करे।
प्राचीन भारतीय चिंतन में भी राजनीति को मर्यादा और जिम्मेदारी से जोड़ा गया है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राजनीति को केवल अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य और अनुशासन का दायित्व बताया है। इसी संदर्भ में आज के नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी भाषा और आचरण में संयम रखें। यह भी समझना आवश्यक है कि तीखे और विवादास्पद बयान अक्सर तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए दिए जाते हैं।

‘हम बनाम वे’ की राजनीति को बढ़ावा देने के लिए भावनात्मक मुद्दों को उभारा जाता है। लेकिन दीर्घकाल में यह रणनीति लोकतंत्र और सामाजिक सौहार्द दोनों के लिए हानिकारक साबित होती है।

आज जरूरत इस बात की है कि सभी राजनीतिक दल आत्ममंथन करें और संवाद की गरिमा को बनाए रखने का प्रयास करें, तभी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वस्थ हो सकती है, यदि उसमें शालीनता और विचारों का स्तर ऊंचा बना रहे। लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों से नहीं, बल्कि संवाद की गुणवत्ता से भी तय होती है। इसलिए यह आवश्यक है कि भाषा की मर्यादा को केवल औपचारिकता न माना जाए, बल्कि उसे लोकतांत्रिक संस्कार का अनिवार्य हिस्सा समझा जाए।

 

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Tags: #MallikarjunKharge #IndianDemocracy #PoliticsIndia #FreeSpeech #PoliticalAnalysis #CurrentAffairs #DebateIndia #RespectfulDialogue #PoliticalAwareness

अमोल पेडणेकर

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