21 अप्रैल की शांति वार्ता होने से पहले ही डोनाल्ड ट्रंप के द्वारा अनिश्चितकालीन युद्ध विराम घोषित कर दिया गया। वैश्विक शांति नाजुक हालात से गुजर रही है। ऐसे समय में अमेरिका या ईरान की थोड़ी सी असावधानी या राजनीतिक जिद पूरे विश्व को संकट में डाल सकती है। इसलिए सभी अपने तात्कालिक हितों से ऊपर उठकर दीर्घकालिक स्थिरता और शांति को प्राथमिकता दें।
जिस युद्ध का परिणाम अनिश्चित हो, वह केवल रणभूमि तक सीमित नहीं रहता बल्कि उसका प्रभाव नेतृत्व, अर्थव्यवस्था और वैश्विक स्थिरता तक पड़ता है। आज अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव इसी अनिश्चितता का प्रतीक बन चुका है। इस प्रकार के युद्ध का परिणाम उसका नेतृत्व करने वालों को भी संकट में डाल देता है। अमेरिका, इजरायल और ईरान अब इसी युद्ध के कारण संकट में दिख रहे हैं। इस संघर्ष ने न केवल इन देशों के नेतृत्व को चुनौती दी है बल्कि सम्पूर्ण विश्व को असमंजस, अनिश्चितता और भय के घेरे में ला खड़ा किया है।
मध्य पूर्व का क्षेत्र लम्बे समय से वैश्विक राजनीति का सबसे संवेदनशील और अस्थिर क्षेत्र रहा है। तेल सम्पदा, धार्मिक विभाजन, सांस्कृतिक टकराव और क्षेत्रीय वर्चस्व की महत्वाकांक्षा ने इसे लगातार संघर्षों की भूमि बनाए रखा है। वर्तमान परिदृश्य में इजरायल और ईरान के बीच तनाव तथा अमेरिका की सक्रिय भागीदारी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। प्रारम्भिक आक्रामक वक्तव्यों और त्वरित जीत के दावे अब लम्बी खिंचती अनिश्चितता में बदल चुके हैं। युद्ध का कोई स्पष्ट परिणाम सामने नहीं है।

अमेरिका के द्वारा किए गए प्रथम युद्ध विराम के बाद तीनों में से किसी भी राष्ट्र को न तो सैन्य मोर्चे पर निर्णायक जीत मिली और न ही शांति वार्ता की मेज पर कूटनीतिक स्तर पर कोई ठोस समाधान मिला। अमेरिकी नेतृत्व द्वारा प्रारम्भ में अपनाई गई आक्रामकता, जिसमें ईरान पर त्वरित विजय और सत्ता परिवर्तन की बातें शामिल थीं। ये सारी बातें आज अमेरिका के लिए चुनौती बन गई हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को दी हुई 48 घंटे की डेडलाइन और धमकी के बीच अचानक दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा करके ट्रम्प ने सारी दुनिया को चौंका दिया था। ईरान और अमेरिका के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम के बाद मध्य पूर्व में तनाव कुछ सीमा तक कम हुआ था, किंतु शांति प्रयास लागू होने से पहले ही विफल हो गया और इसलिए ऐसा लगता है कि यह समझौता केवल कागजों पर ही रह जाएगा।

हालांकि युद्ध विराम की इस घोषणा के बाद इजरायली प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी निर्णय का स्वागत करते हुए स्पष्ट किया कि यह युद्धविराम केवल ईरान के लिए है और इसमें लेबनान या हिजबुल्लाह शामिल नहीं हैं। अमेरिका ने भी इस स्थिति की पुष्टि की और कहा कि लेबनान एक अलग संघर्ष है। इसके विपरीत ईरान का दावा था कि लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हौथी विद्रोही और इराकी सभी समझौते का हिस्सा हैं। युद्धविराम की घोषणा के कुछ ही घंटों के भीतर, इजरायल ने लेबनान और बेरूत में हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर हवाई आक्रमण किए। इन आक्रमणों में 180 से अधिक लोग मारे गए, कुछ रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 250 से अधिक बताई गई है।
दुनिया की इस पर पैनी दृष्टि थी। ईरान ने इसे समझौते का उल्लंघन माना और शांति वार्ता विफल रही। इस प्रथम शांति वार्ता के असफल होने के बाद ईरान ने एक बार फिर होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया। साथ में अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य से आनेवाले जहाजों की नाकाबंदी कर दी। अब पूरी दुनिया दोहरी मार सहन कर रही है।

पूरी दुनिया की दृष्टि जिस बात पर टिकी थी वह शांति वार्ता मात्र औपचारिकता रही, इससे कोई ठोस समाधान नहीं निकला है। इससे वैश्विक तनाव कम होने के बजाए और बढ़ गया है और शांति की प्रतीक्षा लम्बी हो गई है। इन संघर्षों से वैश्विक बाजार को भारी हानि हो रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से भारत सहित सम्पूर्ण एशिया खंड के कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो गई है। यदि यह तनाव शीघ्र हल नहीं हुआ तो तेल की कीमतें आसमान छू जाएंगी, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
प्रथम युद्धविराम की घोषणा के कुछ ही घंटों में प्रथम शांति वार्ता असफल होकर इन तीनों राष्ट्रों में संघर्ष का पुनः भड़क उठना, यह दर्शाता है कि इस क्षेत्र में संकट कितना गहरा है। ऐसे समय में भारत का दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण और सराहनीय है। भारत ने स्पष्ट रूप से युद्ध का समर्थन करने से मना कर दिया है और शांति, संवाद तथा कूटनीति पर बल दिया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर का संसद में दिया गया वक्तव्य इस नीति का स्पष्ट प्रतिबिम्ब है। भारत की यह नीति नई नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से भारत ने गुटनिरपेक्षता, संतुलन और बहुदेशीय विश्व व्यवस्था को बढ़ावा दिया है। आज भी भारत किसी एक पक्ष के साथ अंधानुकरण नहीं करता है।

भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करता है तथा संवाद और मध्यस्थता को प्राथमिकता देता है। भारत के लिए यह मुद्दा संवेदनशील है, कारण मध्य पूर्व से भारत के गहरे सम्बंध हैं। ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। लाखों भारतीय कामगार यहां कार्यरत हैं। व्यापार और निवेश के महत्वपूर्ण सम्बंध हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, इराक और ईरान जैसे देशों के साथ भारत के सम्बंध संतुलित और बहुआयामी हैं। इसलिए भारत के लिए किसी एक पक्ष का समर्थन करना न तो व्यावहारिक है और न ही हितकर। भारतीय संसद में कुछ विपक्षी दलों द्वारा ईरान के समर्थन की मांग भावनात्मक अधिक और रणनीतिक रूप से कम परिपक्व प्रतीत होती है। विदेश नीति भावनाओं से नहीं बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों और वैश्विक संतुलन से संचालित होती है। भारत का संयमित दृष्टिकोण इसी परिपक्वता का परिचायक है।
वैश्विक महाशक्तियों की लालसा के कारण हुए प्रथम और दूसरे महायुद्ध से पूरी दुनिया ध्वस्त हो चुकी थी। यह इतिहास के सबसे भयावह युद्ध थे, जिसमें 6-8 करोड़ लोग मारे गए थे। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोगों के विस्थापन से फ्लू फैल गया, जिसमें 5 से 10 करोड़ मौतें हुई। इतने बड़े विध्वंस के बाद भी विश्व की महाशक्तियों के पास इतने परमाणु हथियार है कि मानवता का नामोनिशान कुछ मिनटों में मिट सकता है। रूस ने 30 अक्टूबर 1961 को ऐसे घातक परमाणु हथियार का परीक्षण किया था, जो हिरोशिमा पर गिराए गए एटम बम से 3300 गुना ज्यादा शक्तिशाली है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध मानव इतिहास की सबसे भयावह घटनाएं थीं, जिनमें करोड़ों लोगों की जान गई। इसके बाद आज भी विश्व के पास इतने परमाणु हथियार हैं कि मानवता का अस्तित्व कुछ ही क्षणों में समाप्त हो सकता है। ऐसे में वर्तमान संघर्ष केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं बल्कि वैश्विक अस्तित्व का प्रश्न भी बन सकता है। इतिहास का सबक और वर्तमान की चुनौती को ध्यान में रखकर विश्व नेतृत्व को अपने कदमताल करने की अत्यंत आवश्यक है।
आज जब विश्व हिंसा के चक्र में फंसा है, तब गौतम बुद्ध एवं भगवान महावीर का मध्यम मार्ग और अहिंसा का सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। बुद्ध ने कहा था, द्वेष से द्वेष कभी समाप्त नहीं होता, प्रेम से ही द्वेष समाप्त होता है। गौतम बुद्ध और भगवान महावीर के ये विचार केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक और वैश्विक कूटनीति का भी आधार बन सकते हैं। भारत की वैचारिक भूमिका के संदर्भ में जब हम सोचते हैं तो भारत की सभ्यता ने सदैव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दिया है और पूरी पृथ्वी को एक परिवार माना है। भारत की परम्परा युद्ध की नहीं बल्कि संतुलन और समरसता की रही है, जो युद्धरत पक्षों को संवाद के लिए प्रेरित करे। भारत ने कभी विस्तारवाद या वर्चस्व की नीति नहीं अपनाई। यही कारण है कि आज जब विश्व अशांति के दौर से गुजर रहा है, तब भारत से एक जिम्मेदार और संतुलित भूमिका की अपेक्षा की जाती है। भारत का संदेश स्पष्ट है, युद्ध समाधान नहीं है बल्कि संवाद ही स्थाई शांति का मार्ग है।
वर्तमान में विश्व बहुत ही नाजुक मोड़ पर है और पश्चिम एशिया एक बार फिर बड़े युद्ध के कगार पर खड़ा है। ऐसे समय में 21 अप्रैल के दिन अमेरिका और ईरान के बीच हुए अनिश्चितकालीन युद्धविराम जैसी स्थिति को समझने के लिए थोड़ा संतुलित और तथ्याधारित दृष्टिकोण आवश्यक है। सीधे शब्दों में कहें तो यह कोई औपचारिक शांति समझौता नहीं है बल्कि तनाव कम करने के लिए लिया गया कूटनीतिक निर्णय है।
डोनाल्ड ट्रम्प की नीति प्रायः मैक्सिमम प्रेशर और सरप्राइज डिप्लोमेसी की रही है, एक ओर कड़े प्रतिबंध और सैन्य दबाव, दूसरी ओर अचानक बातचीत या युद्धविराम की पहल, इसी कारण से इसे सरप्राइज मूव कहा जाता है।

होर्मुज जलडमरुमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल यहीं से गुजरता है। ईरान, अमेरिका और उसके सहयोगी यहां जलडमरूमध्य पर अपना-अपना प्रतिबंध बनाए रखकर युद्धविराम की बात कर रहे हैं। हालांकि सीधी सैन्य कार्रवाई पर रोक होगी और दोनों पक्ष खुली लड़ाई से पीछे हटेंगे। अमेरिका और ईरान में तनाव कम होने के संकेत मिल रहे हैं और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत शुरू हो सकती है।
अनिश्चितकालीन युद्धविराम क्या यह स्थाई शांति है? विश्लेषकों के अनुसार यह स्थाई शांति नहीं है। यह एक अस्थाई राहत है, स्थाई समाधान नहीं। कारण मूल मुद्दे अभी भी बाकी हैं, ईरान का परमाणु कार्यक्रम, अमेरिका के प्रतिबंध, मध्य पूर्व में प्रभाव की लड़ाई जैसे कई मुद्दे अभी भी बाकी हैं। वैश्विक प्रभाव की दृष्टि से इस अनिश्चितकालीन युद्ध विराम से तेल की कीमतों में अस्थिरता कम हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार को राहत मिलेगी, किंतु विश्व में अनिश्चितता बनी रहेगी। इन दो राष्ट्रों में कभी भी तनाव फिर से बढ़ सकता है। यह युद्धविराम असल में एक रणनीतिक विराम है, न कि पूर्ण शांति।
डोनाल्ड ट्रम्प की नीति में दबाव और संवाद दोनों साथ चलते हैं, जबकि होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण की लड़ाई इस पूरे संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। इससे यह बात महसूस हो रही है कि तथाकथित शांति के शुरू होने से पहले ही भविष्य के भीषण युद्ध की सम्भावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है। वैश्विक नेताओं के माध्यम से विश्व में शांति की अपेक्षा हम कर रहे हैं, उन्हीं महाशक्तियों के नेताओं ने विश्व को भविष्य की मरण-यातना देने वाली चिंताओं के कगार पर लाकर खड़ा किया है। ऐसे अहंकारी, भू-विस्तारवादी, धार्मिक उन्मादी और युद्धज्वर से बाधित नेताओं से विश्व में शांति की प्रक्रिया किस प्रकार पूरी हो सकती है, भगवान ही जाने।
आज की वैश्विक राजनीति में भावनात्मक प्रतिक्रियाओं की बजाए विवेकपूर्ण निर्णयों की आवश्यकता है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रहा यह संघर्ष इस बात को सिद्ध करता है कि अधीरता और अहंकार से शुरू हुए युद्ध लम्बे समय तक अनिश्चितता और विनाश को जन्म देते हैं। भारत ने जो मार्ग चुना है, संयम, संवाद और कूटनीति का, वही शांति का मार्ग भविष्य का राजमार्ग है। यह न केवल भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करता है बल्कि वैश्विक शांति की दिशा में भी एक सकारात्मक योगदान देता है।

