समय-समय पर प्राकृतिक आपदाएं मनुष्यों को एक गम्भीर चेतावनी देते आए हैं कि ‘अब भी सुधर जाओ अन्यथा आपदा जब महाप्रलय बन कर आएगी तो कहीं के नहीं रहोगे।‘ अत: जलवायु परिवर्तन को गम्भीरता से लेते हुए पर्यावरण के अनुकूल विकास नीति को अपनाना चाहिए।
मनुष्य चंद्रमा तक पहुंच गया है। मंगल ग्रह पर जीवन की सम्भावना खोज रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से प्रकृति के अनेक रहस्यों को समझने का दावा कर रहा है, परंतु जब प्रकृति स्वयं अपना रौद्र रूप धारण करती है, तब मनुष्य की सारी वैज्ञानिक उपलब्धियां उसके सामने कितनी छोटी हैं, इसका एहसास बार-बार होता है।
नेपाल में आई हालिया जलप्रलय की त्रासदी ने इसी सत्य को फिर सामने ला दिया है। पानी का वेग अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को बहा ले गया। गांवों के गांव उजड़ गए, सड़कें और पुल टूट गए, घर ध्वस्त हो गए। अनेक परिवार आज भी अपने प्रियजनों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। राहत और बचाव कार्य जारी हैं, परंतु ऐसी हर आपदा के बाद हमारा ध्यान सामान्यतः मृतकों की संख्या, आर्थिक हानि और राहत कार्य तक सीमित रह जाता है।
कुछ दिनों तक राजनीतिक और सामाजिक चर्चा होती है और फिर जीवन अपनी सामान्य गति पर लौट आता है। नेपाल की इस त्रासदी को हमें इस तरह नहीं देखना चाहिए। यह केवल नेपाल की त्रासदी नहीं है। यह हिमालय की बदलती प्रकृति का संकेत है। यह जलवायु परिवर्तन की चेतावनी है और यह दक्षिण एशिया के भविष्य के लिए गम्भीर संदेश है।
हिमालय हमें हमेशा शांत दिखाई देता है। बर्फ से ढकी चोटियां, ऊंचे पर्वत और दूर तक फैली पर्वत श्रृंखलाएं देखकर लगता है कि यह सब कुछ सदियों से जैसा था, वैसा ही आज भी है, किंतु हिमालय स्थिर नहीं है। कहीं ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। कहीं हिम तालाबों का आकार बढ़ रहा है। कहीं अचानक बादल फट रहे हैं। कहीं पहाड़ दरक रहे हैं। कहीं नदियां अपने पुराने रास्ते बदल रही हैं। ये अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं। इनके भीतर एक साझा संकेत छिपा है। हिमालय का प्राकृतिक संतुलन बदल रहा है। नेपाल में हुई आपदा को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है।

भारत के लिए हिमालय केवल भौगोलिक सीमा या सामरिक सुरक्षा का क्षेत्र नहीं है, वह भारत की जल जीवनरेखा है। हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र से निकलने वाली सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया के करोड़ों लोगों के जीवन का आधार हैं। खेती, पेयजल, ऊर्जा, उद्योग और करोड़ों लोगों की आजीविका इन नदियों से जुड़ी हुई है। इसलिए हिमालय की बर्फ में होने वाला परिवर्तन केवल पर्वतों पर जमा बर्फ का कम होना नहीं है इसका सीधा सम्बंध आने वाले समय में पानी की उपलब्धता से है। हिमनद तेजी से पिघलते हैं तो कुछ समय के लिए नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है, किंतु लम्बे समय में हिमनदों का भंडार कम होने के कारण नदियों के प्रवाह पर गम्भीर प्रभाव पड़ सकता है। इसके साथ ही पिघलती बर्फ से बनने वाले हिम तालाबों के फटने का संकट भी बढ़ता है अर्थात एक ही संकट हमें पहले बाढ़ और बाद में जल संकट की ओर ले जा सकता है।

हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र पर काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था खउखचजऊ की रिपोर्टों ने हिमनदों में हो रहे तेज बदलावों को लेकर चिंता व्यक्त की है। हिमनदों का पीछे हटना, बर्फ के भंडार में कमी और तापमान में वृद्धि केवल वैज्ञानिक आंकड़े नहीं हैं। ये भविष्य की सम्भावित आपदाओं के संकेत हैं, पर चिंता की एक दूसरी बात भी है। जिस हिमालय पर अरबों लोगों का जीवन निर्भर है, उसके अनेक हिस्सों का वैज्ञानिक अध्ययन अभी भी पर्याप्त नहीं हुआ है अर्थात हम संकट की चर्चा तो कर रहे हैं, किंतु संकट का पूरा नक्शा हमारे पास नहीं है। कहां कौन-सा हिम तालाब घातक स्थिति में है? कौन-सा ग्लेशियर तेजी से बदल रहा है? किस घाटी में बाढ़ का संकट अधिक है? किस क्षेत्र में निर्माण पूरी तरह रोकना चाहिए? इन प्रश्नों के उत्तर जितनी तेजी से खोजे जाने चाहिए, उतनी तेजी से नहीं खोजे जा रहे हैं।

आपदा के बाद दो तर्क आसानी से सामने आते हैं। पहला, यह प्राकृतिक आपदा थी, इसे रोका नहीं जा सकता था। दूसरा, यह जलवायु परिवर्तन के कारण हुआ, परंतु इन दोनों तर्कों के पीछे छिपकर हम अपने दायित्व से बच नहीं सकते। निश्चित रूप से हर बादल फटना, हर भूकम्प और हर हिमखंड टूटना मनुष्य के नियंत्रण में नहीं है, पर यह हमारे हाथ में है कि नदी के कितने करीब निर्माण कार्य हो, पर्वत की कितनी कटाई हो, किस घाटी में सड़क बने, कहां बांध बनाया जाए, पर्यटन संख्या कितनी मर्यादित हो और आपदा आने से पहले कैसे लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जाए। प्राकृतिक आपदा को रोकना हमेशा सम्भव नहीं होता, पर प्राकृतिक घटना को मानवीय महाविनाश बनने से रोकना बहुत सीमा तक सम्भव है।
हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सड़क चाहिए, बिजली चाहिए, अस्पताल चाहिए, रोजगार चाहिए, पर्यटन चाहिए, बेहतर जीवन चाहिए। इसलिए पर्यावरण के नाम पर विकास को पूरी तरह रोक देना समाधान नहीं है। समस्या विकास में नहीं है। समस्या है प्रकृति की क्षमता को समझे बिना किया गया विकास। विकास आवश्यक है, पर हिमालय की कीमत पर नहीं। पर्वत मैदान नहीं हैं, वहां की जमीन, ढलान, चट्टान और जलधारा का अपना व्यवहार है। यदि हम पहाड़ काटकर सड़कें बनाएंगे, नदी के प्राकृतिक प्रवाह को रोकेंगे, संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े निर्माण करेंगे और फिर आपदा आने पर केवल प्रकृति को दोष देंगे तो यह उचित नहीं होगा। हिमालय में सुरक्षा का अर्थ अधिक कंक्रीट नहीं है। हिमालय में सुरक्षा का अर्थ है प्रकृति को समझकर विकास करना।
हिमालय और तिब्बत के संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण भी क्षेत्रीय पर्यावरण की दृष्टि से गम्भीर विषय है। नदियां राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानतीं। उनका जलप्रवाह, मलबा और पारिस्थितिक प्रभाव सीमा पार जाता है। इसलिए हिमालयी नदियों को केवल राष्ट्रीय विकास का विषय मानना पर्याप्त नहीं है। भारत, नेपाल, भूटान और चीन सहित हिमालय से जुड़े देशों के बीच जल, मौसम, ग्लेशियर और आपदा सम्बंधी सूचनाओं को साझा करने की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए क्योंकि नदी को पासपोर्ट नहीं चाहिए, किचड़ को सीमा का पता नहीं होता, बाढ़ सीमा शुल्क नहीं देती, इस एक सत्य में हिमालयी सहयोग की पूरी दिशा छिपी हुई है।
एक और प्रश्न पर विचार करने का समय आ गया है। पर्वतारोहण साहस और मानवीय क्षमता का प्रतीक है, किंतु आज दुनिया में सबसे कम समय में पर्वत की चोटी पर पहुंचने के रिकॉर्ड बनाने की होड़ दिखाई देती है। यहां हमें रुककर पूछना चाहिए, क्या हम हिमालय को जीतने निकले हैं? क्या हमारा उद्देश्य हिमालय को समझना है या उसे जीतना? हेलीकॉप्टर, आधुनिक उपकरण और भारी संसाधनों की सहायता से पर्वतारोहण निश्चित रूप से आसान हुआ है, पर इसके साथ हिमालय पर मानवीय दबाव भी बढ़ रहा है। पर्वत को चुनौती देना और पर्वत की क्षमता को समझना इन दोनों में अंतर है। हमें हिमालय के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं, सह-अस्तित्व सीखना होगा।
केदारनाथ प्रलय और सिक्किम से नेपाल तक की त्रासदी अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है। केदारनाथ की आपदा हो, सिक्किम की त्रासदी हो या हिमालय के अन्य क्षेत्रों में हुई घटनाएं, बार-बार हमें एक ही संदेश मिला है।
हमने हर बार राहत पहुंचाई। पीड़ितों की सहायता की। मुआवजा दिया, किंतु क्या हमने एक बार भी अपनी विकास नीति बदली? क्या हमने संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण कार्य रोक दिया? क्या हमने नदियों को उनका प्राकृतिक क्षेत्र वापस दिया? क्या हमने आपदा के संकट वाले क्षेत्रों में रहने वाली जनसंख्या का पर्याप्त पुनर्वास किया? यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ है तो हमें स्वीकार करना होगा कि समस्या केवल प्राकृतिक नहीं है। आपदा का एक हिस्सा प्रकृति पैदा करती है और दूसरा हिस्सा हमारी गलत योजनाएं।
जलवायु परिवर्तन की चर्चा अब केवल वैज्ञानिक सम्मेलनों का विषय नहीं रह गई है। पिछले लगभग 200 वर्षों में औद्योगिकीकरण और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन ने पृथ्वी के तापमान को प्रभावित किया है। कार्बन उत्सर्जन का असर पहाड़ों तक पहुंच चुका है, इसका असर हिमालय पर भी दिखाई दे रहा है। दुनिया के एक हिस्से में विकास और सुविधा का विस्तार हुआ, किंतु उसके पर्यावरणीय परिणामों का बोझ प्राय: उन क्षेत्रों ने उठाया जो सबसे अधिक संवेदनशील थे, हिमालय ऐसा ही एक क्षेत्र है। विडम्बना यह है कि जिन लोगों का कार्बन उत्सर्जन में योगदान अपेक्षाकृत कम है, उन्हें जलवायु परिवर्तन के परिणाम अधिक गम्भीर रूप से भुगतने पड़ सकते हैं। इसलिए जलवायु न्याय की चर्चा में हिमालय को केंद्र में रखना आवश्यक है।
नेपाल की त्रासदी से यदि वास्तव में कोई सीख लेना है तो केवल राहत व्यवस्था मजबूत करना पर्याप्त नहीं होगा। हमें हिमालय के लिए एक नई विकास नीति की आवश्यकता है। पहला, हिमनदों और हिमतालों की चौबीसों घंटे निगरानी की आधुनिक व्यवस्था विकसित करनी होगी। दूसरा, हिमालय के प्रत्येक संवेदनशील क्षेत्र का विस्तृत जोखिम मानचित्र तैयार करना होगा। तीसरा, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण रोकना होगा। चौथा, बड़ी परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल एक परियोजना के रूप में नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र पर पड़ने वाले संचयी पर्यावरणीय प्रभाव के आधार पर करना होगा। पांचवां, पर्वतीय पर्यटन की भी एक सीमा निर्धारित करनी होगी। छठा, स्थानीय लोगों को आपदा प्रबंधन का सक्रिय भागीदार बनाना होगा और सबसे महत्वपूर्ण, हिमालय से जुड़े सभी देशों को वैज्ञानिक जानकारी और आपदा सम्बंधी आंकड़े साझा करने की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।
नेपाल की त्रासदी को केवल नेपाल की त्रासदी मानना हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। यह घटना हमें बता रही है कि प्रकृति की उपेक्षा करके किया गया विकास अंततः मनुष्य के लिए ही संकट पैदा करता है। यह हमें बता रही है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की समस्या नहीं है। यह हमें बता रही है कि तकनीक प्रकृति की जगह नहीं ले सकती और सबसे महत्वपूर्ण, यह हमें बता रही है कि हिमालय को जीतना नहीं, समझना होगा। मनुष्य चंद्रमा पर पहुंच सकता है, किंतु वह नदी की प्रकृति को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता। वह ग्लेशियर की तस्वीर उपग्रह से ले सकता है, पर ग्लेशियर को अपने आदेश पर पिघलने से रोक नहीं सकता। वह पहाड़ के भीतर सुरंग बना सकता है, परंतु पहाड़ के स्वभाव को बदल नहीं सकता।

इसलिए हमें अपनी विकास की परिभाषा पर पुनर्विचार करना होगा। दुखद शोक से आगे बढ़कर संकल्प की आवश्यकता है। आज भी नेपाल में अनेक परिवार अपने प्रियजनों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनके दुख की भरपाई नहीं हो सकती है। उनके प्रति संवेदना व्यक्त करना हमारा मानवीय कर्तव्य है, परंतु उनके दुख को केवल संवेदना तक सीमित रखना उनके साथ न्याय नहीं होगा। इस त्रासदी से सीख लेकर हमें एक ऐसी नीति बनानी होगी जिससे भविष्य में कम से कम लोग ऐसी त्रासदी के शिकार हों क्योंकि अगली आपदा कब आएगी, यह हम कदाचित् नहीं जानते, पर यह अवश्य जानते हैं कि हिमालय बदल रहा है। उसकी बर्फ बदल रही है, उसकी नदियां बदल रही हैं, उसका मौसम बदल रहा है, उसकी ढलानें बदल रही हैं। हिमालय बोलता नहीं है, पर वह लगातार संकेत दे रहा है। अब निर्णय हमारे हाथ में है। हम उन संकेतों को अनदेखा करेंगे या समय रहते अपनी दिशा बदलेंगे? नेपाल का जलप्रलय केवल पानी का प्रवाह नहीं था। वह हिमालय की ओर से आया हुआ एक संदेश था, प्रकृति की सीमाओं का सम्मान करो, विकास की दिशा बदलो और आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी को रहने योग्य बनाए रखो।
अमोल पेडणेकर
