21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था में यदि किसी एक तत्व ने कच्चे माल से आगे बढ़कर सामरिक, तकनीकी और कूटनीतिक शक्ति का रूप धारण किया है, तो वह है, सिलिका। यही वह मूल पदार्थ है जिससे सेमीकंडक्टर चिप्स निर्मित होते हैं, और यही चिप्स आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा प्रणालियों, 5जी-6जी संचार, क्वांटम कंप्यूटिंग, अंतरिक्ष अनुसंधान और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की धुरी बने हुए हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत और अमेरिका के बीच हुआ ‘पैक्स सिलिका’ समझौता केवल एक औद्योगिक संधि नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन को पुनर्परिभाषित करने वाला ऐतिहासिक कदम है। ‘पैक्स’ शब्द लैटिन भाषा से आया है, जिसका अर्थ है “शांति” या “स्थिर व्यवस्था”। अतः ‘पैक्स सिलिका’ का आशय ऐसी वैश्विक व्यवस्था से है जिसमें उच्च शुद्धता वाली सिलिका और उससे निर्मित सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला को स्थिर, सुरक्षित और बहुध्रुवीय बनाया जाए, ताकि किसी एक देश का एकाधिकार विश्व अर्थव्यवस्था को असंतुलित न कर सके।

पिछले एक दशक में चीन ने दुर्लभ खनिजों, परिशोधित सिलिका और सेमीकंडक्टर निर्माण से संबंधित अनेक घटकों पर गहरी पकड़ बनाई। विश्व की बड़ी टेक कंपनियाँ, ऑटोमोबाइल उद्योग, रक्षा प्रतिष्ठान और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माता उसकी आपूर्ति शृंखला पर निर्भर हो गए। कोरोना महामारी के समय जब वैश्विक आपूर्ति तंत्र चरमरा गया, तब यह स्पष्ट हो गया कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता आर्थिक और सामरिक दृष्टि से जोखिमपूर्ण है। चिप संकट के चलते वाहन निर्माण से लेकर मोबाइल फोन उत्पादन तक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसी अनुभव ने विश्व शक्तियों को वैकल्पिक, विश्वसनीय और लोकतांत्रिक आपूर्ति शृंखलाओं की आवश्यकता का बोध कराया।
भारत के संदर्भ में स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत के पास विशाल युवा जनसंख्या, बढ़ता उपभोक्ता बाजार, तकनीकी प्रतिभा और सिलिका संसाधनों की उपलब्धता है, किंतु लंबे समय तक वह उच्च-स्तरीय सेमीकंडक्टर निर्माण में आत्मनिर्भर नहीं बन सका। चिप्स और उच्च-प्रौद्योगिकी घटकों के लिए आयात पर निर्भरता बनी रही। ‘मेक इन इंडिया’ और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से सरकार ने विनिर्माण को बढ़ावा देने का प्रयास किया, परंतु कच्चे माल की परिशुद्धता और आपूर्ति शृंखला की वैश्विक भागीदारी के बिना यह लक्ष्य पूर्ण नहीं हो सकता था। यहाँ ‘पैक्स सिलिका’ समझौता एक सेतु की भूमिका निभाता है।
यह साझेदारी केवल खनन या निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि उच्च शुद्धता वाली सिलिका के परिशोधन, वेफर निर्माण, चिप डिजाइन, परीक्षण, अनुसंधान एवं विकास तथा कौशल निर्माण तक विस्तारित है। अमेरिका के पास उन्नत चिप डिजाइन, अनुसंधान और बौद्धिक संपदा का विशाल आधार है, जबकि भारत के पास विशाल इंजीनियरिंग प्रतिभा, अपेक्षाकृत कम लागत वाला श्रमबल और तेजी से विकसित होता औद्योगिक ढाँचा है। इन दोनों की सम्मिलित शक्ति वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक संतुलन स्थापित कर सकती है।

‘पैक्स सिलिका’ का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य चीन पर निर्भरता को कम करना है, किंतु यह किसी टकराव की नीति नहीं, बल्कि संतुलन की रणनीति है। विश्व अर्थव्यवस्था को स्थिरता चाहिए, और स्थिरता तब आती है जब आपूर्ति विविध स्रोतों से उपलब्ध हो। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश की भागीदारी से आपूर्ति शृंखला अधिक पारदर्शी, नियम-आधारित और टिकाऊ बन सकती है। इससे वैश्विक निवेशकों का विश्वास भी मजबूत होगा।
सामरिक दृष्टि से भी इस समझौते का महत्व अत्यंत गहरा है। आज आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं पर लड़े जाने वाले पारंपरिक युद्ध नहीं हैं; वे साइबर सुरक्षा, ड्रोन तकनीक, उपग्रह संचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी और सटीक हथियार प्रणालियों पर निर्भर हैं। इन सभी के मूल में सेमीकंडक्टर चिप्स हैं। यदि किसी देश की चिप आपूर्ति बाधित हो जाए, तो उसकी रक्षा क्षमता प्रभावित हो सकती है। अतः ‘पैक्स सिलिका’ को रक्षा सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए।
आर्थिक दृष्टि से यह समझौता भारत में व्यापक औद्योगिक परिवर्तन ला सकता है। सेमीकंडक्टर निर्माण एक पूंजी-गहन और प्रौद्योगिकी-गहन उद्योग है, जो सहायक उद्योगों की पूरी श्रृंखला विकसित करता है—रसायन, गैस, मशीनरी, लॉजिस्टिक्स, परीक्षण प्रयोगशालाएँ, और उच्च-कौशल प्रशिक्षण केंद्र। यदि भारत में सिलिका परिशोधन और वेफर निर्माण इकाइयाँ स्थापित होती हैं, तो यह लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर उत्पन्न कर सकता है। इसके अतिरिक्त, यह देश को वैश्विक निर्यात केंद्र के रूप में स्थापित कर सकता है।
शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में भी इसका प्रभाव दूरगामी होगा। उच्च शुद्धता वाली सिलिका और नैनो-स्तरीय तकनीक के लिए विशेष अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बीच सहयोग आवश्यक होगा। भारत के प्रौद्योगिकी संस्थान, वैज्ञानिक प्रयोगशालाएँ और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र इस साझेदारी से नया जीवन प्राप्त कर सकते हैं। अनुसंधान के नए क्षेत्रों—जैसे सिलिकॉन फोटोनिक्स, उन्नत सेंसर और क्वांटम डिवाइस—में प्रगति की संभावना बढ़ेगी।
पर्यावरणीय दृष्टि से भी सावधानी अपेक्षित है। सिलिका खनन और परिशोधन प्रक्रिया में जल और ऊर्जा की बड़ी मात्रा की आवश्यकता होती है। यदि यह उद्योग असंतुलित ढंग से विकसित हुआ, तो पर्यावरणीय चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए ‘पैक्स सिलिका’ को हरित प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा और सतत विकास के सिद्धांतों से जोड़ना होगा। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि औद्योगिक विस्तार पारिस्थितिक संतुलन को क्षति न पहुँचाए।
कूटनीतिक दृष्टि से यह समझौता भारत की वैश्विक स्थिति को सुदृढ़ करेगा। आज विश्व बहुध्रुवीयता की ओर अग्रसर है, जहाँ केवल सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि तकनीकी और आपूर्ति शृंखला की विश्वसनीयता भी प्रतिष्ठा का स्रोत है। भारत यदि उच्च-प्रौद्योगिकी उत्पादन में अग्रणी बनता है, तो उसकी वार्ताकार शक्ति बढ़ेगी। यह उसे एशिया और वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में स्थापित करेगा।
‘पैक्स सिलिका’ को भारत की दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता रणनीति से भी जोड़कर देखना चाहिए। आत्मनिर्भरता का अर्थ आत्मकेंद्रित होना नहीं, बल्कि वैश्विक साझेदारी में अपनी क्षमताओं को सुदृढ़ करना है। यह समझौता उसी विचार को मूर्त रूप देता है—सहयोग के माध्यम से आत्मशक्ति का विस्तार।
हालाँकि चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सेमीकंडक्टर उद्योग में प्रतिस्पर्धा अत्यंत तीव्र है। ताइवान, दक्षिण कोरिया और जापान पहले से ही स्थापित खिलाड़ी हैं। निवेश की भारी आवश्यकता, अत्याधुनिक मशीनरी की उपलब्धता और वैश्विक बाजार में मूल्य प्रतिस्पर्धा—ये सभी कारक भारत के सामने परीक्षा की तरह खड़े होंगे। नीति की निरंतरता, पारदर्शी विनियमन और दीर्घकालिक कर प्रोत्साहन आवश्यक होंगे।

इसके अतिरिक्त, कौशल विकास भी एक प्रमुख चुनौती है। चिप निर्माण अत्यधिक परिशुद्धता और विशेषज्ञता की माँग करता है। भारत को इंजीनियरों, तकनीशियनों और वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण हेतु विशेष कार्यक्रम चलाने होंगे। विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बीच गहन सहयोग स्थापित करना होगा, ताकि शैक्षणिक ज्ञान और औद्योगिक आवश्यकताओं के बीच की दूरी कम हो सके।
वैश्विक राजनीति के संदर्भ में भी यह समझौता महत्वपूर्ण है। अमेरिका लंबे समय से विश्वसनीय साझेदारों के साथ आपूर्ति शृंखला पुनर्संतुलन की रणनीति पर कार्य कर रहा है। भारत के साथ यह साझेदारी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा दे सकती है। इससे केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक संबंध भी सुदृढ़ होंगे।
अंततः ‘पैक्स सिलिका’ को भविष्य की डिजिटल सभ्यता की आधारशिला कहा जा सकता है। जिस प्रकार औद्योगिक क्रांति में कोयला और इस्पात ने भूमिका निभाई, उसी प्रकार डिजिटल युग में सिलिका और सेमीकंडक्टर वह मूल तत्व हैं जिन पर संपूर्ण तकनीकी संरचना आधारित है। भारत यदि इस क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाता है, तो वह केवल एक उपभोक्ता राष्ट्र नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी निर्माता राष्ट्र के रूप में उभरेगा।
यह समझौता हमें यह भी सिखाता है कि कच्चे संसाधन तभी शक्ति बनते हैं जब उन्हें ज्ञान, नवाचार और वैश्विक सहयोग से जोड़ा जाए। सिलिका धरती में उपलब्ध एक साधारण खनिज प्रतीत हो सकता है, किंतु जब वह अत्याधुनिक चिप का रूप लेता है, तो वही विश्व अर्थव्यवस्था की धड़कन बन जाता है। ‘पैक्स सिलिका’ उसी रूपांतरण की कहानी है—खनिज से शक्ति तक, संसाधन से रणनीति तक, और सहयोग से स्थिरता तक।
इस प्रकार ‘पैक्स सिलिका’ केवल एक औद्योगिक समझौता नहीं, बल्कि 21वीं सदी की वैश्विक तकनीकी राजनीति में भारत की सशक्त उपस्थिति का उद्घोष है। यदि इसे दूरदृष्टि, पारदर्शिता और पर्यावरणीय संतुलन के साथ लागू किया गया, तो यह न केवल भारत-अमेरिका संबंधों को नई ऊँचाई देगा, बल्कि विश्व आपूर्ति शृंखला में स्थायित्व और संतुलन की नई धारा प्रवाहित करेगा। यही इसकी वास्तविक सार्थकता है, एक ऐसी शांति व्यवस्था, जहाँ सिलिका के माध्यम से स्थिर और न्यायसंगत तकनीकी भविष्य का निर्माण हो।
– डॉ दीपक कोहली
