भारत को केवल आधुनिक अर्थों में एक राष्ट्र-राज्य के रूप में देखना उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक व्यापकता को सीमित करना होगा। वस्तुतः भारत एक प्राचीन, सतत और जीवंत सभ्यता है, जिसने सहस्राब्दियों से विश्व मानवता को आध्यात्मिक दृष्टि, सांस्कृतिक समन्वय, वैज्ञानिक चिंतन और नैतिक मूल्यों की दिशा प्रदान की है।
सिंधु घाटी सभ्यता की सुव्यवस्थित नगरीय परंपरा से लेकर वैदिक युग के दार्शनिक विमर्श, उपनिषदों की अद्वैत चेतना, बौद्ध और जैन दर्शनों की करुणा-अहिंसा की साधना, भक्ति आंदोलन की लोकधर्मी धारा तथा सूफी संतों के समन्वयकारी संदेश तक— भारतीय चिंतन निरंतर आत्ममंथन और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया से गुजरता रहा है। यही निरंतरता भारत को मात्र एक राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक चेतना के रूप में स्थापित करती है।
प्राचीन काल में भारत को “विश्वगुरु” कहा जाता था। यह विशेषण केवल गौरवबोध का प्रतीक नहीं था, बल्कि उस ज्ञान-परंपरा की स्वीकृति था, जिसने वैश्विक बौद्धिक इतिहास को प्रभावित किया। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय विश्वभर के विद्यार्थियों के आकर्षण का केंद्र थे। गणित और खगोलशास्त्र में आर्यभट द्वारा शून्य और दशमलव पद्धति का प्रतिपादन मानव सभ्यता के लिए क्रांतिकारी सिद्ध हुआ। योग और आयुर्वेद ने स्वास्थ्य को समग्र दृष्टि से देखने की परंपरा विकसित की। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का सिद्धांत भारतीय दर्शन की उस सार्वभौमिक दृष्टि को अभिव्यक्त करता है, जो समस्त मानवता को एक परिवार मानता है।
औपनिवेशिक शासन और पश्चिमी बौद्धिक प्रभाव ने इस आत्मछवि को चुनौती दी। अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के माध्यम से भारतीय ज्ञान-परंपराओं को हाशिये पर डालने का प्रयास हुआ।
स्वतंत्रता के बाद भी उपभोक्तावाद, अंधानुकरण और वैश्वीकरण के दबावों ने युवाओं के एक वर्ग को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर किया। ऐसे समय में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रश्न केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की दिशा से जुड़ा विषय बन जाता है।
इक्कीसवीं सदी में भारत की वैश्विक भूमिका पुनर्परिभाषित हो रही है। जी-20 शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता, चंद्रयान-3 की सफलता और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की वैश्विक मान्यता ने भारत की बहुआयामी क्षमता को रेखांकित किया है। इन उपलब्धियों के बीच यह आवश्यक है कि आर्थिक और तकनीकी प्रगति के साथ सांस्कृतिक आत्मबोध भी सुदृढ़ हो।
इसी परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा अपने शताब्दी वर्ष (2025-26) के अवसर पर प्रतिपादित “पंच परिवर्तन” की अवधारणा महत्वपूर्ण प्रतीत होती है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित इस संगठन ने राष्ट्र-निर्माण को व्यक्ति-निर्माण से जोड़ा है। “पंच परिवर्तन” को व्यक्ति, परिवार और समाज के स्तर पर समग्र परिवर्तन की रूपरेखा के रूप में देखा जा सकता है।
इस संकल्पना के पाँच प्रमुख आयाम हैं—स्व का बोध, नागरिक कर्तव्यबोध, पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन, और सामाजिक समरसता।
स्व का बोध और स्वदेशी जीवनशैली
“स्व” का अर्थ केवल व्यक्तिगत पहचान नहीं, बल्कि सभ्यतागत आत्मचेतना है। जब व्यक्ति अपनी भाषा, इतिहास, परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ता है, तभी आत्मविश्वास का निर्माण होता है। स्वदेशी का आशय केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन-पद्धति में स्थानीय संसाधनों, ज्ञान और परंपराओं को महत्व देना है। भारतीय ज्ञान प्रणाली, योग, आयुर्वेद, खादी, स्थानीय उद्योग और मातृभाषा में शिक्षा— ये सभी स्वदेशी दृष्टि के व्यावहारिक आयाम हैं। आत्मनिर्भरता का भाव आर्थिक प्रगति के साथ सांस्कृतिक आत्मविश्वास को भी सुदृढ़ करता है।

नागरिक कर्तव्यबोध
लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं, कर्तव्यों से भी संचालित होता है। संविधान में वर्णित मौलिक कर्तव्य नागरिक जीवन की नैतिक आधारशिला हैं। कर का ईमानदारी से भुगतान, मतदान में सहभागिता, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सद्भाव— ये सभी उत्तरदायी नागरिकता के उदाहरण हैं। जब नागरिक कर्तव्यनिष्ठ होते हैं, तब लोकतांत्रिक संस्थाएं अधिक सशक्त और पारदर्शी बनती हैं।

पर्यावरण संरक्षण
भारतीय परंपरा में प्रकृति को माता के रूप में पूजनीय माना गया है। आज जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण जैसी चुनौतियों ने पर्यावरण संरक्षण को अत्यंत आवश्यक बना दिया है। जल-संरक्षण, वृक्षारोपण, प्लास्टिक के उपयोग में कमी और ऊर्जा-संयम जैसे कदम व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर उठाए जाने चाहिए। सतत विकास के बिना सांस्कृतिक पुनर्जागरण अधूरा रहेगा।
सामाजिक समरसता
भारत की विविधता उसकी शक्ति है, परंतु सामाजिक विषमताएं और विभाजन चुनौती भी प्रस्तुत करते हैं। समरस समाज का अर्थ केवल कानूनी समानता नहीं, बल्कि पारस्परिक सम्मान और अवसर-समानता है। संवाद, शिक्षा और सहभागिता के माध्यम से सामाजिक दूरी को कम किया जा सकता है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना सामाजिक समरसता का दार्शनिक आधार है।

कुटुंब प्रबोधन
परिवार भारतीय समाज की मूल इकाई है। बदलती जीवनशैली और डिजिटल प्रभाव के बीच पारिवारिक संवाद और मूल्य-संप्रेषण की आवश्यकता बढ़ गई है। परिवार में संस्कार, परंपरा और पारस्परिक सम्मान की भावना समाज की स्थिरता का आधार बनती है। सुदृढ़ परिवार ही सुदृढ़ समाज का निर्माण करते हैं।
समकालीन समय में उपभोक्तावाद, अतिव्यक्तिवाद और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसी चुनौतियां स्पष्ट हैं। इनका समाधान केवल सरकारी नीतियों से संभव नहीं, बल्कि नागरिक चेतना के जागरण से ही संभव है। “पंच परिवर्तन” इसी आंतरिक परिवर्तन का आह्वान करता है। यह किसी एक संगठन का सीमित कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाजव्यापी जागरण का आह्वान है।

हँलांकि, किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल आर्थिक उपलब्धियों से सुनिश्चित नहीं होती; वह जागरूक, नैतिक और उत्तरदायी नागरिकों पर निर्भर करती है। यदि स्व का बोध, कर्तव्यनिष्ठा, समरसता, पर्यावरण-संवेदनशीलता और सुदृढ़ पारिवारिक मूल्यों को जीवन में उतारा जाए, तो सांस्कृतिक पुनर्जागरण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। “पंच परिवर्तन” को इसी दिशा में एक सार्थक और विचारोत्तेजक पहल के रूप में देखा जा सकता है।
– प्रो. रूबी मिश्रा

