द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वैश्विक राजनीति में यदि किसी एक देश का सबसे अधिक प्रभाव रहा है तो वह अमेरिका है। सोवियत संघ के पतन के बाद तो अमेरिका लगभग एकमात्र वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरा। इस दौर में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक धारणा प्रचलित हुई कि “दुनिया में वही होगा जो अमेरिका चाहेगा।” अमेरिका की विदेश नीति में अक्सर यह भाव दिखाई देता है कि यदि कोई देश उसके हितों के अनुरूप चलता है तो वह उसका सहयोगी बन जाता है और यदि विरोध करता है तो उसे किसी न किसी प्रकार दबाव में लाया जाता है।
पिछले दो दशकों में इराक युद्ध से लेकर मध्य एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति तक, अमेरिका के इस रवैये को दुनिया ने महसूस किया है, लेकिन अब विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रही है। नई आर्थिक शक्तियाँ उभर रही हैं और उनमें सबसे प्रमुख नाम भारत का है। भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता और सामरिक सामर्थ्य अब विश्व राजनीति में नई चर्चा का विषय बन रही है।

हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित प्रतिष्ठित वैश्विक सम्मेलन रायसीना डायलॉग में अमेरिका के डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट ने भारत को “असीमित संभावनाओं वाला देश” बताया, लेकिन इसी वक्तव्य में उन्होंने भारत को एक चेतावनी भी दी कि “हम वह भूल अब नहीं दोहराएंगे जो हमने 20 वर्ष पहले चीन के साथ की थी।” यह बयान साधारण नहीं है। यह उस मनोविज्ञान को प्रकट करता है जिसके आधार पर अमेरिका वैश्विक शक्तियों को देखता है।
अमेरिका ने 1980 से लेकर 1990 तक के दशक में चीन के साथ व्यापक व्यापारिक संबंध बनाए। उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था में शामिल किया, निवेश और तकनीक दी। इसका परिणाम यह हुआ कि चीन की अर्थव्यवस्था अत्यंत तेज़ी से बढ़ी और वह वैश्विक स्तर पर अमेरिका के लिए एक बड़ा प्रतिस्पर्धी बन गया। आज चीन के साथ अमेरिका का संघर्ष केवल व्यापार या तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि सामरिक और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में भी बदल चुका है।
अमेरिका को अब यह आशंका है कि यदि भारत भी इसी प्रकार तेजी से उभरता रहा तो भविष्य में वह भी एक बड़ी शक्ति बनकर सामने आएगा। इसलिए अमेरिका भारत के साथ सहयोग भी रखना चाहता है और साथ ही एक संतुलन भी बनाए रखना चाहता है। यही कारण है कि वह भारत की प्रशंसा भी करता है और अप्रत्यक्ष रूप से सावधान भी करता है।
संभावित प्रतिद्वंद्वी को नियंत्रित करना यह अमेरिका की वैश्विक नीति रही है। अमेरिका की विदेश नीति का इतिहास देखें तो एक स्पष्ट पैटर्न दिखाई देता है। अमेरिका ने हमेशा इस बात का प्रयास किया है कि कोई भी देश इतना शक्तिशाली न बन पाए कि वह उसकी वैश्विक नेतृत्व की स्थिति को चुनौती दे सके। उदाहरण के रूप में 2003 का इराक युद्ध देखा जा सकता है। उस युद्ध को लोकतंत्र, विश्व शांति एवं सुरक्षा के नाम पर प्रस्तुत किया गया, लेकिन उसके पीछे पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन और संसाधनों पर नियंत्रण का प्रश्न भी जुड़ा हुआ था।
इसी प्रकार पश्चिम एशिया की राजनीति में अमेरिका ने हमेशा अपने रणनीतिक सहयोगियों को मजबूत किया। उदाहरण के लिए इजरायल को ईरान के विरुद्ध संतुलन के रूप में देखा जाता है। वहीं दक्षिण एशिया में पाकिस्तान लंबे समय तक अमेरिका का प्रमुख सहयोगी रहा है।
पाकिस्तान को अमेरिका का समर्थन या सहयोग यह अमेरिका की रणनीति है। पाकिस्तान को अमेरिका का समर्थन केवल भावनात्मक या वैचारिक कारणों से नहीं मिला। इसके पीछे स्पष्ट रणनीतिक उद्देश्य रहे हैं।
पहला कारण भौगोलिक स्थिति है। पाकिस्तान मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के संगम पर स्थित है। अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य अभियानों के दौरान पाकिस्तान का महत्व और भी बढ़ गया था। दूसरा कारण क्षेत्रीय शक्ति संतुलन है। भारत एक बड़ी शक्ति के रूप में उभर रहा था, इसलिए अमेरिका ने पाकिस्तान को एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में भी देखा।
यही कारण है कि समय-समय पर पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक सहायता दी जाती रही है। तीसरा कारण यह है कि अमेरिका अक्सर क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा को संतुलित करके अपनी भूमिका बनाए रखना चाहता है। जब क्षेत्र में दो शक्तियाँ परस्पर प्रतिस्पर्धा में होती हैं तो बाहरी शक्ति के रूप में अमेरिका का प्रभाव बना रहता है।
ऐसी स्थिति में भारत के सामने संभावित चुनौतियाँ बड़ी मात्रा में है। भारत आज तेजी से आगे बढ़ रहा है। अर्थव्यवस्था, डिजिटल तकनीक, अंतरिक्ष, रक्षा और वैश्विक कूटनीति इन सभी क्षेत्रों में भारत की स्थिति मजबूत हो रही है, लेकिन इसी कारण भविष्य में कुछ चुनौतियाँ भी सामने आ सकती हैं। पहली चुनौती आर्थिक प्रतिस्पर्धा की होगी।
यदि भारत नवनिर्माण, तकनीक और व्यापार में तेजी से आगे बढ़ता है तो वह वैश्विक बाजार में अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए प्रतिस्पर्धी बन सकता है। दूसरी चुनौती रणनीतिक दबाव की हो सकती है। वैश्विक गठबंधनों, रक्षा समझौतों और तकनीकी प्रतिबंधों के माध्यम से बड़े देश अक्सर उभरती शक्तियों को सीमित करने का प्रयास करते हैं। तीसरी चुनौती क्षेत्रीय राजनीति से जुड़ी है। दक्षिण एशिया में यदि अमेरिका पाकिस्तान को फिर से अधिक समर्थन देता है तो भारत के सामने सुरक्षा और कूटनीतिक चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं।
भारत की रणनीति अत्यंत सावधान स्वरूप में होनी चाहिए। ऐसी परिस्थिति में भारत को अत्यंत संतुलित और दूरदर्शी नीति अपनानी होगी। सबसे पहले, भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए। भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से स्वतंत्र रही है और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
दूसरा, भारत को अपनी आर्थिक शक्ति को और मजबूत करना होगा। मजबूत अर्थव्यवस्था किसी भी देश की वैश्विक शक्ति का आधार होती है। विनिर्माण, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता अत्यंत आवश्यक है। तीसरा, भारत को अपनी सैन्य क्षमता को आधुनिक बनाना होगा।
आधुनिक युद्ध केवल सैनिकों की संख्या से नहीं बल्कि तकनीक, साइबर क्षमता और अंतरिक्ष शक्ति से तय होते हैं। चौथा, भारत को बहुपक्षीय कूटनीति को मजबूत करना होगा। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ मजबूत संबंध बनाकर भारत एक संतुलित वैश्विक नेटवर्क तैयार कर सकता है।

भारत ने “विश्व गुरु” बनने का जो स्वप्न देखा है, वह केवल शक्ति से नहीं बल्कि मूल्य आधारित नेतृत्व से पूरा होगा। भारत की सभ्यता, लोकतंत्र, सहअस्तित्व की भावना और वैश्विक सहयोग की नीति उसे अलग पहचान देती है।
यदि भारत अपनी आर्थिक शक्ति, तकनीकी क्षमता और सांस्कृतिक नेतृत्व को संतुलित रूप से विकसित करता है तो वह भविष्य की विश्व व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
आज की दुनिया बहुध्रुवीय बन रही है। ऐसे समय में भारत के लिए अवसर भी हैं और चुनौतियाँ भी। अमेरिका के संकेतों को समझते हुए भारत को अपनी शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ एक संतुलित और आत्मविश्वासी विदेश नीति अपनानी होगी। इसी में भारत के सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य की दिशा निहित है।
– अमोल पेडणेकर
