राक्षसों के वध से भरे पड़े हैं हमारे सारे धर्मग्रंथ

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जिस महाभारत को श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र के प्रयोग से महज 5 मिनट में निपटा सकते थे भला उसके लिए 18 दिन तक युद्ध लड़ने की क्या जरूरत थी. लेकिन... रणनीति में हर चीज का एक महत्व होता है... जिसके काफी दूरगामी परिणाम होते हैं. इसीलिए... मैं कभी भी उतावलेपन का समर्थन नहीं करता हूँ. क्योंकि, मुझे ये बात अच्छी तरह मालूम है कि.... रावण, कंस, दुर्योधन, रक्तबीज और हिरणकश्यपु आदि का विनाश तो निश्चित है तथा यही उनकी नियति है..!!

इंडीजेनस डे का खंडन करता है बिरसा मुंडा का उलगुलान

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मूलनिवासी दिवस या इंडिजिनस पीपल डे एक भारत मे एक नया षड्यंत्र है। सबसे बड़ी बात यह कि इस षड्यंत्र को जिस जनजातीय समाज के विरुद्ध किया जा रहा  है, उसी जनजातीय समाज के कांधो पर इसकी शोभायमान पालकी भी चतुराई पूर्वक निकाली जा रही है। वस्तुतः प्रतिवर्ष इस दिन यूरोपियन्स और पोप को आठ करोड़ मूल निवासियों का निर्मम नरसंहार करने के लिए क्षमा मांगनी चाहिए। यह दिन यूरोपियन्स के लिए पश्चाताप व क्षमा का दिन है। यह दिन चतुर गोरे ईसाई व्यापारियों द्वारा भोलेभाले जनजातीय समाज को  मार काट करके उनकी भूमि छीन लिए जाने का शर्मनाक दिन है। यूरोपियन्स ने इस दिन को षड़यंत्रपूर्वक उत्सव का दिन बना दिया और आश्चर्य यह कि भारत का वनवासी समाज भी इस कुचक्र में फंस गया है।

स्वतंत्रता संग्राम में संघ का क्या योगदान है?

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सबसे पहले इस प्रश्न का उत्तर कि स्वतंत्रता संग्राम में संघ का क्या योगदान है? इसका यदि सीधा उत्तर देना हो तो कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता संग्राम में संघ का योगदान लगभग शून्य है,पर संघ स्वयंसेवकों का योगदान उल्लेखनीय है।इस उत्तर से अनेक पाठकों को आश्चर्य होगा।इस उत्तर का मर्म जानने के लिए सबसे पहले संघ निर्माता डॉ.केशव बलिराम हेडगेवार और इसी संदर्भ में संघ की वैचारिक भूमिका थोड़ी विस्तार से समझनी होगी। ‘स्वतंत्रता कब और कैसे मिलेगी’यह प्रश्न जब सर्वत्रपूछा जा रहा हो तब ‘हम पराधीन क्यों हुए और हमारी स्वतंत्रता अक्षुण्ण कैसे रहे’इस प्रश्न का न केवल मूलभूत चिंतन, अपितु इसके उत्तर हेतु भी डॉक्टरजीने प्रयास आरंभ कर दिए थे। डॉ हेडगेवार ने हमेशा ‘नैमित्तिक’आंदोलनात्मक कार्य तथा राष्ट्र निर्माण के ‘नित्य’कार्य को महत्व किया।इसप्रकार केआंदोलन करने की आवश्यकता ही न पड़े ऐसी परिस्थिति निर्माण करना ही वास्तव में डॉक्टरजीका दीर्घकालिकउद्देश्य था। आग लगने पर ही आग बुझाने के लिए दमकल को भेजा जाए इस पक्ष में संघ नहीं था। हिंदू समाज की आंतरिक शक्ति बढ़ाने पर उसका सारा जोर और ध्यान केंद्रित था।

सामाजिक समरसता और रक्षाबंधन का त्यौहार

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भारत में वर्तमान परिस्थितियों के देखते हुए रक्षाबंधन त्यौहार का महत्व और भी बढ़ जाता है। देश में भारतीय सनातन हिंदू संस्कृति पर लगातार हमले हो रहे हैं। जिस प्रकार अंग्रेजों एवं मुगलों ने अपने शासनकाल में भारतीय सनातन हिंदू संस्कृति को नुक्सान पहुंचाया था एवं हिंदुओं को अपने ही धर्म से विमुख करने के भरपूर प्रयास किए थे। हालांकि, इन कुत्सित प्रयासों में वे पूर्णतः विफल रहे थे, परंतु आज फिर कुछ विदेशी ताकतें एवं आतंकवादी संगठन, भारत के ही कुछ भटके हुए नागरिकों के साथ मिलकर भारत में अव्यवस्था फैलाने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं। रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्यौहार के दिन हम सभी भारतीय नागरिकों को, एक दूसरे को, पवित्र रक्षासूत्र बांधकर एक दूसरे की रक्षा करने का संकल्प लेने की आज महती आवश्यकता है। साथ ही, रक्षाबंधन त्यौहार को देश में सामाजिक समरसता स्थापित करने के पवित्र उत्सव के रूप में मनाये जाने की सख्त आवश्यकता है। रक्षाबंधन त्यौहार के माध्यम से आगे आने वाली अपनी युवा पीढ़ी को  भारतीय परंपराओं एवं संस्कारों से भी अवगत कराया जाना चाहिए।    

त्याग और तपस्या का परिणाम

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फिर मैं बोला, *"बेटा! सिर्फ़ अपनी थाली देख। दूसरे की देखेगा तो तेरी अपनी थाली भी चली जायेगी...... और सिर्फ़ अपनी ही थाली देखेगा तो क्या पता कि तेरी थाली किस स्तर तक अच्छी होती चली जाये। इस रूखी-सूखी थाली में मैं तेरा भविष्य देख रहा हूँ। इसका अनादर मत कर। इसमें जो कुछ भी परोसा गया है उसे मुस्करा कर खा ले ....।" उसने फिर मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और जो कुछ भी परोसा गया था खा लिया। उसके बाद से मेरे किसी बच्चे ने मुझसे किसी भी प्रकार की कोई भी मांग नहीं रखी । बाबू जी! आज का दिन मेरे बच्चों के उसी त्याग औऱ तपस्या का परिणाम है। उसकी बातों को रमेश बाबू बड़ी तन्मयता के साथ लगातार चुपचाप सुनते रहे औऱ बस यही सोचते रहे कि आज के बच्चों की कैसी मानसिकता है कि वे अपने अभिभावकों की हैसियत पर दृष्टि डाले बिना उन पर लगातार अपनी ऊटपटाँग माँगों का दबाव डालते रहते हैं............!!

मौद्रिक समीक्षा पर महंगाई का साया

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वैसे,अभी भी समग्र मांग एवं निवेश के लिहाज से अनिश्चितता का माहौल दिखरहा है। विश्व की लगभग सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं अपनी वृद्धि रफ्तार को दुरुस्त करने की को​शिश कर रही हैं और भारत भी मामले में अपवाद नहीं है, लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था अन्य देशों की तुलना में ज्यादा मजबूत है। इसलिए, ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है। फिर भी,महंगाई के दबाव में भारतीय कंपनियां भी अपने उत्पादों की कीमत बढ़ाने के लिए मजबूर हैं, जिससे महंगाई का बोझ अंतत: ग्राहकों को उठाना पड़ रहा है। 

लव जिहाद से निपटने का इजराइली तरीका

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जैसे अपने यहां बजरंग दल है, विहिप है वैसे ही इजराइल में एक संगठन है "#लेहवा" (#lehava). 2005 में खास तौर पर लव जिहाद के विरोध में बना था। ये लोग इजराइल के अंदर हरेक स्कूल कॉलेज के आसपास बहुत तीखी नजर रखते हैं कि कोई अरबी लड़का किसी यहूदी लड़कीं के चक्कर मे तो नहीं घूम रहा। लेहवा के पास सबकुछ है। कमांडो तक हैं। बुलेटप्रूफ गाड़ियां तक है। और आपको पता है कि हथियार तो सामान्य नागरिक को भी रखना allow है तो वह भी मोजूद है। इनलोगों का हेल्पलाइन नम्बर भी सभी के पास रहता है।

दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल ?

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अखंड भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए वर्षों पर्यंत बलिदान देने वाले वास्तविक सेनानियों के साथ विश्वासघात कर के भारत को खंडित करके, कथित आजादी की सारी मलाई चाटने वाले लोग आज भी जब ‘दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल’ गीत को बजाते, सुनाते एवं सुनते हैं तो कलेजा फट जाता है। कल्पना करें कि फांसी के तख्तों पर लटकने वाले क्रांति योद्धाओं की आत्मा कितनी तड़पती होगी। यह गीत वास्तव में सरदार ऊधम सिंह, वीर सावरकर, रास बिहारी बोस, श्यामजी कृष्ण वर्मा, खुदीराम बोस, चाफेकर बंधु एवं सुभाष चन्द्र बोस का अपमान करके उनकी खिल्ली उड़ाता है। यह गीत बम, बन्दूक, तलवार को धत्ता बता कर ‘भीख के कटोरे’ को भारत रत्न प्रदान करता है। 

*युवा शक्ति का पर्व कांवड़ यात्रा डाक कावड़

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यह डाक कावड़ बिना रुके बिना थके हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपने गांव की दूरी यह युवा दौड़ते हुए पूरी करते हैं। यह दौड़ देखने लायक है इस दौड़ में ऐसे युवा भाग लेते हैं जो स्वयं को भारतीय फौज के लिए तैयार कर रहे हैं। सही मायने में देखा जाए तो यह यात्रा भविष्य के होने वाले भारतीय फौज में भर्ती के लिए अपनी तैयारियों को जांचने परखने की यात्रा भी मानी जाती है। जब यह जल लेकर निकलते हैं तो एक लड़का हाथ में जल लिए सबसे आगे दौड़ रहा होता है। उसके बराबर से दो मोटरसाइकिल में दौड़ रही होती है जिनके पीछे और लड़के बैठे होते हैं। जितनी दूरी तक यह पहला लड़का दौड़ सकता है दौड़ता है। जैसे ही वह थकता है तुरंत साथ चल रही मोटर सायकिल से दूसरा लड़का उसके हाथ से जल ले उसके स्थान पर दौड़ने लगता है। इस प्रकार यह एक के बाद एक अपनी पोजीशन बदलते जाते हैं और पूरा लगभग 150 से लेकर 200 तक की दूरी बिना रुके तय करते हैं।

हर घर तिरंगा अभियान और विकृत राजनीति

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यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि जब से तिरंगा अभियान की बात शुरू हुई तभी से इस विरोधी दलों ने अपनी विकृत राजनीति भी शुरू कर दी । जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट के माध्यम से तिरंगे का इतिहास बताया और 13 से 15 अगस्त तक अपने घरों में तिरंगा फहराने की अपील की तो कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा था कि ये खादी से राष्ट्रीय ध्वज बनाने वालों की आजीविका को नष्ट कर रहे हैं। वहीं जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती व  फारूक अब्दुल्ला जैसे नेताओं को भी हर तिरंगा अभियान पसंद नहीं आ रहा है। यह लोग तिरंगे को घर पर रखने की बात कह रहे हैं  । यह वही महबूबा मुफ्ती हैं जिन्होंने धारा 370 हटाते समय कहा था कि अगर 370 हटी तो घाटी में कोई तिरंगा फहराने वाला नहीं मिलेगा लेकिन आज उनका यह सपना पूरी तरह से टूट चुका है और जम्मू –कश्मीर के लोग हर घर तिरंगा अभियान को पूरी ताकत के साथ सफल बनाने के लिए जुट चुके हैं ।  तिरंगे  के बहाने आज जम्मू कश्मीर  में एक बार फिर राष्ट्रवाद की जड़ें मजबूत हो रही हैं वहीं अलगाववाद के काले मंसूबे ध्वस्त हो रहे हैं। 

लगातार मजबूत होते भारतीय बैंक

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भारतीय बैंकों का पूंजी पर्याप्तता अनुपात, 31 मार्च 2022 को, बढ़कर 16.7 प्रतिशत के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह अमेरिकी बैंकों, जिनका पूंजी पर्याप्तता अनुपात पूरे विश्व में बहुत अच्छे स्तर पर माना जाता है, के 16.3 प्रतिशत से भी अधिक है। इससे भारतीय बैंकों के अच्छे स्वास्थ्य का पता चलता है। भारतीय बैकों का प्रावधान राशि अनुपात (प्रोविजन कवरेज रेशो) भी मार्च 2021 के 67.6 प्रतिशत से बढ़कर मार्च 2022 में 70.9 प्रतिशत पर आ गया है।

‘नव भारत’ निर्माण करने का अवसर

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स्वतंत्रता के 75 वर्षों के पश्चात् भी अगर देश का बुद्धिजीवी समाज हीन भाव से ग्रसित है तो उसका सर्व प्रमुख कारण हमारी शिक्षा नीति रही जिसमें हमें पश्चिम का भक्त होना सिखाया गया। पर पिछले एक दशक से जनमानस में स्व का भाव जाग्रत हुआ है क्योंकि प्रधान मंत्री ने अपने हर क्रिया-कलाप से राष्ट्र के स्व को जगाने का प्रयास किया है।

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