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स्वदेशी का आग्रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

स्वदेशी का आग्रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

by हिंदी विवेक
in देश-विदेश, मार्च 2026, संघ
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संघ के स्वदेशी आंदोलन ने स्वाभिमानी आर्थिक सोच को जन्म दिया। इसका परिणाम है कि आज ‘मेड इन इंडिया’ एक ब्रांड बन चुका है और भारत अपनी शर्तों पर वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सेदार बन रहा है। स्वदेशी का यह आग्रह भविष्य में भारत को एक आर्थिक महाशक्ति बनाने में नींव का पत्थर सिद्ध हो सकता है।

भारत की सर्वांगीण स्वतंत्रता एवं विकास का सपना देखने वाले महापुरुषों ने ‘स्वदेशी’ का महत्व समझा और भारत को आत्मनिर्भर एवं सशक्त बनाने के लिए समाज से स्वदेशी आचरण का आग्रह किया। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि यदि हमें फिर से उन्नति करनी है तो लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की शिक्षा देनी होगी। स्वातंत्र्यवीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय और महात्मा गांधी से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक प. पू. सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार तक, सभी ने स्वदेशी को अपनाने का आग्रह किया। भारत के निर्माण का सपना देखने वाले विचारक यह भली-भांति जानते थे कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति के मूल में स्वदेशी का आचरण ही है।

भारत को परमवैभव पर ले जाने की महान आकांक्षा के साथ 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई, तब से ही संघ ने स्वदेशी को लेकर समाज का प्रबोधन प्रारम्भ कर दिया था। संघ के लिए स्वदेशी केवल एक आर्थिक नारा नहीं बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का मूल मंत्र है। संघ ने अपनी स्थापना के साथ ही भारत की आत्मनिर्भरता और भारतीय मूल्यों पर आधारित अर्थतंत्र की वकालत की है।

वैश्वीकरण के दौर में जब दुनिया एक बाजार बन रही थी, तब संघ ने स्वदेशी के आग्रह को एक आंदोलन का रूप दिया। आज उसका महत्व दुनिया को समझ आ रहा है। संघ के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार कहते हैं, भारत में जब हमने स्वदेशी का आंदोलन खड़ा किया, तब कहा गया कि स्वदेशी का आंदोलन दकियानूसी विचार है। यह पुरातनपंथी बात है। जब दुनिया वैश्विक परिवार में बदल रही है, तब स्वदेशी की बात करके हम अलग-थलग पड़ जाएंगे। कोई देश स्वदेशी के आधार पर जिंदा नहीं रह सकता। आज क्या हो रहा है? दुनियाभर के देश अपने यहां स्वदेशी को आगे बढ़ाने के लिए आयात शुल्क बढ़ा रहे हैं। मतलब साफ है कि इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा में यदि किसी देश को अपनी स्थिति मजबूत रखनी है तो उसका आत्मनिर्भर होना आवश्यक है और इसके लिए स्वदेशी के विचार का अनुसरण करना ही होगा।

आज भारत में स्वदेशी के प्रति जो जागरण दिखाई दे रहा है, उसके मूल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयास हैं। संघ के प्रयासों से भारत में लम्बे समय तक स्वदेशी का आंदोलन चलता रहा है। अपने शताब्दी वर्ष में संघ ने समाज से ‘पंच परिवर्तन’ का आग्रह किया है। इस पंच परिवर्तन का एक सबसे महत्वपूर्ण आग्रह ‘स्वदेशी’ का है। संघ के लिए स्वदेशी का आग्रह केवल अर्थ तक सीमित नहीं है अपितु उसके दायरे में भाषा से लेकर विचार तक शामिल हैं। स्वदेशी की अवधारणा का अभिप्राय स्वयं को दुनिया से अलग-थलग करना भी नहीं है। स्वदेशी को ‘स्वदेश प्रेम और देश-भक्ति का आविष्कार’ बताते हुए संघ के द्वितीय प.पू. सरसंघचालक श्रीगुरुजी कहते थे कि स्वदेशी देश को विश्व से काटता नहीं है बल्कि विश्व के साथ चलने का सामर्थ्य प्रदान करता है।

संघ के विचारकों, विशेषकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय और दत्तोपंत ठेंगड़ी ने स्वदेशी की एक स्पष्ट परिभाषा गढ़ी। उनके अनुसार स्वदेशी का अर्थ दुनिया से कटना नहीं बल्कि अपनी शर्तों पर दुनिया से जुड़ना है। स्वदेशी केवल वस्तुओं के क्रय-विक्रय तक सीमित नहीं है बल्कि यह देशभक्ति की साकार अभिव्यक्ति और राष्ट्रीय स्वाभिमान का एक व्यापक विचार है। संघ का मानना है कि अर्थव्यवस्था का केंद्र बड़ी मशीनें या बहुराष्ट्रीय कम्पनियां नहीं बल्कि मानव होना चाहिए। इसके साथ ही संघ का आग्रह रहा है कि भारत को पश्चिमी पूंजीवाद या साम्यवाद की नकल करने के बजाए अपने पारम्परिक कुटीर उद्योगों और कौशल पर आधारित ‘तीसरा विकल्प’ तैयार करना चाहिए।

संघ ने स्वदेशी के विचार को केवल सैद्धांतिक रूप से ही मजबूत नहीं किया अपितु समाज में धरातल पर भी उतारने का भगीरथ कार्य किया है। जब 1990 के दशक में भारत में उदारीकरण और वैश्वीकरण की शुरुआत हुई तो संघ को आभास हुआ कि इससे भारतीय कुटीर उद्योग और छोटे व्यापारी नष्ट हो सकते हैं। इसके प्रतिकार और विकल्प के रूप में 1991 में दत्तोपंत ठेंगड़ी की प्रेरणा से ‘स्वदेशी जागरण मंच’ की स्थापना हुई। स्वदेशी जागरण मंच ने डंकेल प्रस्तावों और विश्व व्यापार संगठन की उन नीतियों का कड़ा विरोध किया, जो भारत के हित में नहीं थीं। इसी प्रकार संघ से जुड़े भारतीय मजदूर संघ ने भी हमेशा इस बात पर जोर दिया कि विनिवेश के नाम पर देश की रणनीतिक सम्पत्ति विदेशी हाथों में न जाए। जब विदेशी कम्पनियां हल्दी, नीम, बासमती और बीजों का पेटेंट कराकर भारतीय कृषि और पारम्परिक ज्ञान पर एकाधिकार जमाना चाहती थीं, तब स्वदेशी आंदोलन के माध्यम से संघ के कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया।

मीडिया में जब विदेशी निवेश की बात आई, तब संघ के तत्कालीन पू. सरसंघचालक कु.सी. सुदर्शन जी ने विदेशी निवेश का स्पष्ट विरोध किया। चीन के साथ हमारे सम्बंध बिगड़ने से पहले ही संघ ने चीन को लेकर भारतीय नागरिकों को सजग करने का प्रयास किया था। सस्ते चीनी सामान ने जब भारतीय बाजार को निगलना शुरू किया, तब संघ ही था जो उसके विरोध में सबसे आगे खड़ा रहा। संघ की प्रेरणा से जब चीनी सामान के बहिष्कार के लिए व्यापक जन-जागरण अभियान शुरू हुए, तब अन्य लोग मजाक बना रहे थे, पर राष्ट्रभक्त नागरिक इस आंदोलन को मजबूत कर रहे थे। इसका परिणाम यह रहा कि अब स्थानीय उत्पाद निर्माताओं एवं विक्रेताओं को फिर से ग्राहक मिल रहे हैं और बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ गई है।

संघ के प्रयासों का सुफल यह भी है कि स्वदेशी को लेकर सरकार का मानस भी बदला है। सरकार की ओर से स्वदेशी को प्रोत्साहित किया जाने लगा है। संघ के विचारों से संस्कारित प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की पहलकदमी पर वर्तमान केंद्र सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ का नारा देकर संघ के स्वदेशी दर्शन का ही व्यावहारिक और नीतिगत विस्तार किया है।

सरकार के इस दृष्टिकोण और आग्रह का सुफल यह भी है कि अभी हाल में पाकिस्तान के साथ हुए सीमित युद्ध ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में स्वदेशी हथियारों ने शत्रु देश के छक्के तो छुड़ाए ही, दुनिया की महाशक्तियों का ध्यान भी आकर्षित किया। कभी रक्षा उपकरणों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर रहने वाला भारत आज स्वदेशी मिसाइलों, तेजस विमानों और रक्षा उपकरणों का न केवल निर्माण कर रहा है बल्कि निर्यात भी कर रहा है। स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित किया। इसके पीछे भी संघ का ही स्वदेशी विचार है। वास्तव में संघ ‘स्व-रोजगार’ के आग्रह के माध्यम से युवाओं में नौकरी मांगने के बजाए नौकरी देने की मानसिकता को बढ़ावा देने का प्रयास करता है। जिस खादी को हम स्वदेशी की पहचान मानते हैं, उसे फैशन और मुख्यधारा में लाने का श्रेय संघ के कार्यकर्ताओं और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है।

डॉ. लोकेंद्र सिंह

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