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India Naxalism End 2026

Naxal Free India: लाल आतंक का अंत

by हिंदी विवेक
in देश-विदेश
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धरती पर आज सुबह की किरणे नई आभा लेकर आई हैं। वामपंथी लाल आतंकी हिंसा का जो घनघोर अंधकार 6 दशकों से फ़ैला हुआ था, उसकी समाप्ति की औपचारिक घोषणा हो चुकी है। अधिकांश नक्सलवादियों ने हथियार डाल दिए हैं। अब भारत में वामपंथी लाल अंधकार का अंत हो चुका है। शांति के कपोत अब खुले आसमान में निर्भय उड़ान भर रहे हैं।

मोदी सरकार के दृढ़ संकल्प और छत्तीसगढ़ सरकार की अथक मेहनत ने राष्ट्र की देह में पल रहे इस बुरे नासूर की शल्य चिकित्सा कर दी गई है। यह मात्र एक राजनीतिक विजय नहीं, बल्कि लाखों जनजातीय परिवारों की मुक्ति, हजारों जवानों के सर्वोच्च बलिदान का फल और एक राष्ट्र की सामूहिक आस्था की जीत है। इसे इतिहास कभी भुला नहीं सकता।

पीछे जाएं तो देखते हैं तो नक्सलवाद की कहानी शुरू होती है वर्ष 1967 से, जब पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव में एक छोटा सा किसान विद्रोह भड़का। उस समय के कम्युनिस्ट नेताओं चारू मजूमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में गरीब किसानों और आदिवासियों ने जमींदारों के खिलाफ हथियार उठा लिए।

Maoist (Naxalbari) movement in India - Modern Diplomacy

नक्सलबाड़ी आंदोलन ने वामपंथी विचारधारा को हिंसक रूप दिया। सीपीआई एमएल जैसी पार्टियां बनीं। 1970 के दशक में यह बिहार, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और मध्य प्रदेश तक पहुंच गया। 1980 के दशक में पीपुल्स वॉर ग्रुप और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर जैसी संगठन सक्रिय हुए। 2004 में इनका विलय होकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया माओइस्ट बना। इसने रेड कॉरिडोर का रूप ले लिया। छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा और आंध्र जैसे राज्यों के जंगलों में यह संगठन राज करने लगा।

Guidelines for Surrender-cum-Rehabilitation of Naxalites in the Naxal  affected States - iPleaders

जनजातीय के रहवास वनों में इन्होंने अपना डेरा डाला और छुपने की जगह बनाई और शोषण के नाम पर वनवासी युवाओं को बंदूकें थमाई। नक्सली कहते थे कि वे वनवासियों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। पर वास्तव में नक्सलियों ने वनों की धरती को वनवासियों के रक्त से ही लाल किया, उन्हें ही अपना शिकार बनाया। उन्होंने स्कूल जलाए, सड़कें तोड़ीं, विकास कार्य रोके और अपनी ही जनता पर अत्याचार किए। यह लाल अंधकार धीरे-धीरे राष्ट्र की देह में कैंसर की तरह फैलता गया।

अब बात करते हैं उन हत्याओं की जो नक्सलियों ने कीं। यह संख्या दिल दहला देने वाली है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2004 से नवंबर 2025 तक लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म ने 8956 लोगों को मार डाला। इनमें अधिकांश जंगल के निवासी थे जिन्हें नक्सली पुलिस मुखबिर बताकर क्रूरता से मारते थे। 2010 में दंतेवाड़ा हमले में अकेले 76 सीआरपीएफ जवान बलिदान हो गए। बस्तर में सैकड़ों ग्रामीणों को जिंदा जलाया गया। एर्राबोर के नृशंस सामुहिक हत्याकांड को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

India's Deadly War on Naxalites and Adivasis in Chhattisgarh

नक्सल जनित हर हत्या के पीछे एक परिवार का आंसू था, एक मां का रोना था, एक बच्चे का भविष्य छिन जाना था। यह मात्र आंकड़े नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी है। छत्तीसगढ़ के जंगलों में जहां कभी वनवासी गीत गुनगुनाते थे, नृत्य करते थे, अपने त्योहार मनाते थे, वहां नक्सली आतंक ने चुप्पी छा दी। गांवों से लोगों ने अपने बच्चों को शहर भेज दिया ताकि वे नक्सलियों के हाथों न पड़ जाएं। हर घर से एक बच्चे को वे जबरिया अपने संगठन में भर्ती करने लगे थे। इसका दुष्परिणाम अब दिखाई देने लगा है। मैंने अनुभव किया है कि शहरों में रहने वाले बच्चे अब बड़े होकर अपने समुदाय की बोली और संस्कृति तथा देवी देवता भूल चुके हैं, जिन्हें पीढियों से उनके पुरखे मानते आए हैं।

पूर्व सरकारों ने इस समस्या को हल करने की कोई अधिक कोशिश नहीं की। कभी सिर्फ बातचीत, कभी सिर्फ ऑपरेशन। नतीजा यह हुआ कि नक्सलवाद 100 से अधिक जिलों में फैल गया। 2014 के बाद मोदी सरकार ने बदलाव किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने तीन सूत्री फॉर्मूला अपनाया समर्थन, सशक्तिकरण और समाधान। सुरक्षा बलों को आधुनिक हथियार दिए गए। खुफिया जानकारी मजबूत की गई। सबसे महत्वपूर्ण, विकास को हथियार बनाया गया। सड़कें बनीं, बिजली पहुंची, मोबाइल टावर लगे, स्कूल खुले और स्थानीय निवासियों के लिए रोजगार के साधन उपलब्ध कराएं और नक्सली कैडरों को सरेंडर पैकेज देकर पुनर्वास पर जोर दिया गया।

छत्तीसगढ़ सरकार ने इस लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाई। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में बस्तर पंडुम जैसी योजनाएं शुरू हुईं। स्थानीय पुलिस और केंद्रीय बलों का समन्वय बढ़ा। 2023 के बाद से छत्तीसगढ़ में अभियान तेज हुए। बस्तर रेंज में सैकड़ों कैडरों ने हथियार डाले। महिलाएं भी मुख्यधारा में आईं। विष्णुदेव साय सरकार ने कहा कि जनजातीय को बंदूक नहीं, विकास चाहिए। उन्होंने पुनर्वास पैकेज बढ़ाया, कौशल विकास केंद्र खोले और ट्राइबल युवाओं को आईटीआई में प्रशिक्षण दिया। यह स्थानीय स्तर की लड़ाई थी जो राष्ट्र स्तर की जीत बन गई।

Days of those who indulge in Naxalite violence are now over": Amit Shah

राष्ट्रीय स्तर पर मोदी सरकार का संकल्प देखते ही बनता है। अमित शाह ने अगस्त २०२४ में घोषणा की कि मार्च २०२६ तक नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा और यह लक्ष्य साकार होता दिख रहा है। गृह मंत्रालय के अनुसार 2014 से अब तक 10000 से अधिक नक्सली मुख्यधारा में आए। यह मोदी सरकार की दूरदर्शिता का परिणाम है। उन्होंने नोटबंदी के माध्यम से नक्सलियों के वित्तीय स्रोतों पर प्रहार किया, जिससे उनके जमा किये गये नोट रातों रात कागज में बदल गये। उनके फंडिंग नेटवर्क को तोड़ा और विकास को हथियार बनाया।

यह संयोग नहीं, बल्कि इतिहास का न्याय है। लाल अंधकार चीरकर शांति की किरणें निकल रही हैं। शांति के कपोत अब आसमान में स्वतंत्र उड़ रहे हैं। कोई डर नहीं, कोई गोली नहीं, सिर्फ विकास की हवा। छत्तीसगढ़ के जंगलों में अब स्कूल की घंटियां बज बजने लगेंगी। भीतर के क्षेत्रों में सड़के बनेंगी, सड़कों के माध्यम से मूलभूत सुविधाएं गांवों तक पहुंचेंगी, सड़कों पर निर्भय होकर वाहन चलेंगे। मोबाइल के टावर लगने से ग्रामीण क्षेत्र के लोग भी सुविधाओं का लाभ उठाएंगे।

यह विजय पूरे राष्ट्र की है। मोदी सरकार ने दृढ़ता दिखाई। छत्तीसगढ़ सरकार ने स्थानीय स्तर पर संघर्ष किया। दोनों ने मिलकर राष्ट्र की देह से नासूर निकाल दिया। वामपंथी उग्रवाद को लोगों ने नकार दिया और समर्पण करने वाले नक्सली भी अब समझ गये हैं कि भारत में हथियारों के बल पर सत्ता हासिल नहीं की जा सकती, जिसने भी यह प्रयास किया, उसे एक दिन पराजित होना ही पड़ा है। भले ही यहां कदम कदम विभिन्नताएं है, लेकिन भारत की सनातन संस्कृति सभी को एक सूत्र में बांधती है। यहां किसी भी प्रकार की हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है।
– वंदे मातरम्।
– आचार्य ललित मुनि

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Tags: #Naxalism #NaxalismEnd #IndiaSecurity #LeftWingExtremism #Bastar #Chhattisgarh #TribalDevelopment #InternalSecurity

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