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युद्ध के धुएँ में शांति की खोज।

युद्ध के धुएँ में शांति की खोज।

by अमोल पेडणेकर
in ट्रेंडींग, देश-विदेश
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शांति का अर्थ: केवल युद्ध का अभाव नहीं होता है। परंतु वास्तविक शांति इससे कहीं अधिक व्यापक है। गौतम बुद्ध ने शांति को भीतर की स्थिति बताया, जहाँ द्वेष, लोभ और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। शांति को हमने अक्सर युद्ध के अभाव तक सीमित कर दिया है, परंतु शांति का वास्तविक अर्थ इससे कहीं गहरा है।

“आँख के बदले आँख वाली फितरत पूरे विश्व को अंधा बना देगी।” वर्तमान समय में इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे  विनाशकारी संघर्ष  देखते हुए यह बात सटीक बैठ रही है। वर्तमान समय में जब विश्व का आकाश बारूद की गंध से भरा है, तब मनुष्य का अंतर्मन एक अनजाने भय से कांप रहा है। यह बढता तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के मन में भविष्य के संदर्भ में छाया हुआ एक गहरा प्रश्न है। यह युद्ध केवल उन तीन देशों में ही नहीं लड़ा जा रहा, बल्कि संपूर्ण विश्व के मनुष्यता की चेतना, विवेक और अस्तित्व के भीतर भी चल रहा है।

वर्तमान में चल रहा यह युद्ध तलवारों या बंदूकों का नहीं, बल्कि तकनीक, अहंकार और अस्तित्व की जिद का युद्ध है। आकाश में उड़ते ड्रोन, धरती के नीचे छिपे मिसाइल और एक बटन से होने वाला संभावित न्यूक्लियर युद्ध, ये सब मिलकर उस भयावह संभावना को जन्म देते हैं, जहाँ जीतने वाला भी अंततः हार ही जाता है। युद्ध की भयावहता और वैश्विक आशंका के कारण आज का यह युद्ध पारंपरिक सीमाओं को लांघ चुका है।

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अत्याधुनिक हथियार, ड्रोन तकनीक, साइबर युद्ध और परमाणु हथियारों की संभावनाएं इसे और भी खतरनाक बना रही हैं। यदि यह संघर्ष व्यापक हुआ, तो यह केवल राष्ट्रों का नहीं, बल्कि पूरी पृथ्वी का संकट बन सकता है। विश्व के जनमानस में भय इसलिए भी है क्योंकि आज का युद्ध “जीत” के लिए नहीं, बल्कि “विनाश” के लिए लड़ा जा रहा है। यह स्थिति हमें पुनः सोचने पर मजबूर करती है कि क्या मानव प्रगति का अर्थ केवल शक्ति और वर्चस्व है? ऐसे समय में प्रश्न यह नहीं है कि कौन शक्तिशाली है, बल्कि यह है कि कौन संवेदनशील है। क्योंकि शक्ति विनाश कर सकती है, पर संवेदना ही सृजन कर सकती है।

ऐसे समय में शांति की अवधारणा केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव जीवन के अस्तित्व की अनिवार्यता बन जाती है।  शांति का अर्थ: केवल युद्ध का अभाव नहीं होता है। परंतु वास्तविक शांति इससे कहीं अधिक व्यापक है। गौतम बुद्ध ने शांति को भीतर की स्थिति बताया, जहाँ द्वेष, लोभ और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। शांति को हमने अक्सर युद्ध के अभाव तक सीमित कर दिया है, परंतु शांति का वास्तविक अर्थ इससे कहीं गहरा है। शांति वह है जहाँ मन का कोलाहल शांत हो, जहाँ विचारों में संतुलन हो, और जहाँ संबंधों में विश्वास हो।

गौतम बुद्ध ने शांति को बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना से जोड़ा। उन्होंने बताया कि  मनुष्य और मनुष्य से बना यह समाज या राष्ट्र अपने भीतर के द्वेष, लोभ और अहंकार को नहीं जीतता, तब तक बाहरी युद्ध समाप्त नहीं हो सकते। आज जब विश्व बाहरी युद्धों में उलझा है, तब सबसे बड़ी आवश्यकता भीतर के युद्ध को समाप्त करने की है।

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शांति का सही अर्थ है: मन की स्थिरता और संतुलन। समाज में न्याय और समानता निर्माण होना। राष्ट्रों के बीच विश्वास और सहयोग निर्माण होना। प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व निर्माण होना। इन सारी बातों को ध्यान में लेकर जब हम शांति की व्याख्या को समझने का प्रयत्न करते हैं तब शांति का अर्थ ऐसा होता है कि, शांति एक आंतरिक चेतना और बाहरी व्यवस्था, दोनों का समन्वय है।

भारत की सभ्यता ने कभी युद्ध को महिमा मंडित नहीं किया, बल्कि शांति को जीवन का मूल तत्व माना। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का विचार केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि एक वैश्विक दृष्टि है, जहाँ समस्त विश्व को एक परिवार के रूप में देखा जाता है। भारत की परंपरा हमें सिखाती है कि संवाद, सह-अस्तित्व और समरसता ही स्थायी समाधान हैं। भगवान महावीर और महात्मा गांधी की अहिंसा, बुद्ध का मध्यम मार्ग, और उपनिषदों का समत्व ये सब मिलकर एक ऐसी भारतीय वैचारिक धारा बनती हैं, जो आज के अशांत विश्व के लिए प्रकाश स्तंभ बन सकती है।

यह  प्रश्न अत्यंत गूढ़ है कि जब चारों ओर युद्ध का भयावह वातावरण हो, तब भगवान श्री कृष्ण के युद्ध और शांति संबंधी संदेशों को कैसे समझा जाए? इसके उत्तर के लिए हमें भगवदगीता के मूल प्रसंग और उसके दार्शनिक आधार को गहराई से समझना होगा। भगवद गीता का उपदेश किसी आश्रम की शांत माहौल में नहीं, बल्कि कुरुक्षेत्र में युद्ध की रणभूमि में दिया गया था। जब अर्जुन मोह, करुणा और भ्रम में डूबकर अपने कर्तव्य से पीछे हटने लगे, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें जीवन का गूढ़ सत्य समझाया। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, गीता युद्ध को बढ़ावा देने के लिए नहीं, बल्कि धर्म और कर्तव्य और मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए कही गई थी।

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युद्ध का अर्थ केवल हिंसा नहीं, धर्म रक्षण हेतु किया हुआ संघर्ष है।‌ श्रीकृष्ण ने युद्ध को केवल शारीरिक संघर्ष के रूप में नहीं देखा। उन्होंने इसे धर्म और अधर्म के बीच का संघर्ष बताया। जब अन्याय, अत्याचार और अधर्म समाज को जकड़ लेते हैं, जब संवाद, धैर्य और शांति के सारे मार्ग समाप्त हो जाते हैं, तब युद्ध एक अंतिम विकल्प के रूप में सामने आता है। इस संदर्भ में कृष्ण का संदेश स्पष्ट है, युद्ध स्वार्थ के लिए नहीं होना चाहिए, युद्ध अहंकार के लिए नहीं होना चाहिए, युद्ध केवल धर्म की रक्षा के लिए होना चाहिए।

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दूसरी ओर, श्रीकृष्ण ने शांति को अत्यंत उच्च स्थान दिया है। उन्होंने “स्थितप्रज्ञ” की अवधारणा दी, स्थितप्रज्ञ यानी ऐसा व्यक्ति जो सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान रहता है। शांति का अर्थ,  आंतरिक संतुलन। शांति का अर्थ है,  मन की स्थिरता। परिणामों से मुक्त होकर कर्म करना, आसक्ति और भय से ऊपर उठना अर्थात, कृष्ण के अनुसार शांति कोई बाहरी परिस्थिति नहीं, बल्कि एक आंतरिक अवस्था है। पहली दृष्टि में यह विरोधाभास लगता है कि एक ही व्यक्ति युद्ध का भी समर्थन करता है और शांति का भी। परंतु गहराई से देखें तो यह विरोध नहीं, बल्कि संतुलन है। युद्ध और शांति का समन्वय है। बाहरी स्तर पर धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक होने पर संघर्ष लेकिन भीतरी स्तर पर: पूर्ण शांति, संतुलन और निष्काम भाव। यही गीता का अद्वितीय दर्शन है, “हाथ में शस्त्र, लेकिन हृदय में शांति।”

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वर्तमान युद्ध के माहौल में इसका अर्थ जब विश्व में इज़राइल, अमेरिका और ईरान जैसे देशों के बीच तनाव बढ़ रहा है, तब श्रीकृष्ण का यह संदेश हमें संतुलन सिखाता है।  युद्ध का औचित्य परखना आवश्यक है। हर संघर्ष “धर्मयुद्ध” नहीं होता। आज के कई युद्ध सत्ता, संसाधन और वर्चस्व के लिए होते हैं , जो गीता के सिद्धांतों के विरुद्ध हैं। कृष्ण ने निरंतर शांति को प्राथमिकता दी है। कृष्ण ने कभी युद्ध को पहला विकल्प नहीं बताया। उन्होंने पहले संवाद, समझौता और शांति के प्रयासों को महत्व दिया।आंतरिक शांति बनाए रखना आवश्यक होता है। भले ही बाहरी परिस्थितियाँ अशांत हों, व्यक्ति को अपने भीतर संतुलन बनाए रखना चाहिए।

 वैश्विक संदर्भ में वर्तमान नेताओं के लिए कृष्ण का संदेश यह है कि नेता का निर्णय धर्म, न्याय और मानवता के आधार पर हों । समाज के लिए संदेश यह है कि, भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि विवेक भाव से सोचें । व्यक्ति के लिए संदेश यह है कि अपने भीतर के भय, क्रोध और द्वेष पर विजय प्राप्त करें। भगवान श्री कृष्ण का यह संदेश न तो अंधी शांति का है, न ही अंधे युद्ध का। वह संतुलन का संदेश है। जब अन्याय बढ़े, तो खड़े हो जाओ। लेकिन जब खड़े हो, तो भीतर से शांत रहो। आज के भयावह युद्ध माहौल में यही संतुलन सबसे अधिक आवश्यक है। क्योंकि यदि मनुष्य केवल युद्ध सीखेगा, तो विनाश निश्चित है और यदि केवल शांति की बात करेगा, बिना अन्याय का सामना किए, तो भी संतुलन नहीं बनेगा। इसलिए गीता हमें सिखाती है, “धर्म के लिए संघर्ष करो, लेकिन मन में शांति बनाए रखो।” यही संदेश आज की वैश्विक मानवता के लिए सबसे प्रासंगिक और आवश्यक है।

आज जब विश्व हिंसा के चक्र में फंसा है, तब गौतम बुद्ध एवं  भगवान महावीर का “मध्यम मार्ग” और “अहिंसा” का सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। बुद्ध ने कहा था: “द्वेष से द्वेष कभी समाप्त नहीं होता, प्रेम से ही समाप्त होता है।”  गौतम बुद्ध और भगवान महावीर जी के यह विचार केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैश्विक कूटनीति का भी आधार बन सकता है।

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भारत की वैचारिक भूमिका के संदर्भ में जब हम सोचते हैं तो भारत की सभ्यता ने सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश दिया है। पूरी पृथ्वी एक परिवार है। भारत की परंपरा युद्ध की नहीं, बल्कि संतुलन और समरसता की रही है। भारत वैश्विक मंच पर “मध्यस्थ” और “संतुलनकारी शक्ति” के रूप में उभर सकता है, जो युद्धरत पक्षों को संवाद के लिए प्रेरित करे।

अब सवाल यह  है कि विश्व में शांति क्यों स्थापित नहीं हो पा रही? विश्व में शांति की स्थापना में कई बाधाएँ हैं, जिसमें सत्ता और वर्चस्व की राजनीति, आर्थिक हित और हथियारों का व्यापार,  धार्मिक और वैचारिक कट्टरता,  परस्पर विश्वास की कमी और ऐतिहासिक द्वेष। वैश्विक नेतृत्व की संकीर्ण सोच भी स्थिति के लिए जिम्मेदार है। जब तक राष्ट्र “सह-अस्तित्व” के बजाय “प्रभुत्व और वर्चस्व ” को प्राथमिकता देंगे, शांति केवल एक कल्पना बनी रहेगी। शायद, मनुष्य ने प्रगति को शक्ति से जोड़ा और शक्ति को वर्चस्व से जोडा है। इसी कारण शांति आवश्यक और मूल्यवान होने पर भी विश्व में स्थाई नहीं हो पा रही है। बलशाली राष्ट्रों ने सुरक्षा को हथियारों में खोजा और विश्वास को संदेह में खो दिया। आर्थिक हित, राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और ऐतिहासिक द्वेष ये सब मिलकर शांति के मार्ग में अदृश्य दीवारें खड़ी कर देते हैं।

शांति किसी संधि पर लिखी जाने वाली शर्त नहीं, बल्कि एक चेतना है, जो भीतर से बाहर की ओर प्रवाहित होती है। शांति का मार्ग भीतर से बाहर की यात्रा है। जब व्यक्ति अपने भीतर संतुलन स्थापित करता है, तभी समाज में समरसता आती है। जब समाज में समरसता होती है, तभी राष्ट्र संवाद की भाषा समझते हैं।

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शांति केवल संधियों से नहीं, बल्कि मानसिकता के परिवर्तन से संभव है। शांति के संभावित मार्ग  इस प्रकार हो सकतें हैं। संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता देना। हथियारों की होड़ पर नियंत्रण रखना। शिक्षा में नैतिकता और सह-अस्तित्व का समावेश लाना। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को सशक्त बनाना। सांस्कृतिक आदान-प्रदान और मानवीय सहयोग बढ़ाना। आज आवश्यकता ऐसे नेतृत्व की है जो शक्ति के बजाय संवेदनशीलता को महत्व दे।  युद्ध के बजाय संवाद को प्राथमिकता दे। राष्ट्रीय हित के साथ मानवता को भी केंद्र में रखे। यदि विश्व में शांति स्थापित होती है, तो इसके बहुआयामी परिणाम संपूर्ण विश्व में होंगे।

सामाजिक स्तर पर सोचें तो भय और असुरक्षा में कमी आ सकती है। मानव संबंधों में विश्वास की वृद्धि हो सकती हैं। आर्थिक स्तर पर सोचें तो विकास और समृद्धि में तेजी आएगी। संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकता है।

 मानसिक स्तर पर सोचें तो तनाव और चिंता में कमी आ सकती है। रचनात्मकता और नवाचार में वृद्धि निर्माण होगी। पर्यावरणीय स्तर पर विचार करें तो युद्धजनित विनाश में कमी आकर प्रकृति के संरक्षण को बढ़ावा मिल सकता है।

आज का समय हमें एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा करता है। एक ओर विनाश की अंधेरी राह है, और दूसरी ओर शांति का प्रकाश। शांति कोई कमजोर विकल्प नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है। यह केवल राष्ट्रों के बीच समझौता नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर जागृत होने वाली चेतना है और जब राष्ट्र संवाद करते हैं, तभी विश्व में स्थायी शांति संभव होती है। आज मानवता एक चौराहे पर खड़ी है। मनुष्य के मन में अपने भविष्य को लेकर प्रश्न है कि, विनाश या विकास? एक मार्ग विनाश की ओर जाता है, जहाँ युद्ध, अहंकार और प्रतिस्पर्धा है।

दूसरा मार्ग शांति की ओर जाता है, जहाँ सहयोग, संवेदना और सह-अस्तित्व है। यदि विश्व शांति को अपनाता है, तो भविष्य केवल सुरक्षित ही नहीं, बल्कि समृद्ध और संतुलित भी होगा। मनुष्य भय से मुक्त होकर सृजन कर सकेगा और पृथ्वी एक बार फिर जीवन के उत्सव से भर उठेगी।

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युद्ध के धुएँ में भी शांति की एक किरण हमेशा मौजूद रहती है। शांति ही अंतिम सत्य है। प्रश्न केवल इतना है, क्या हम उसे महसूस करने के लिए तैयार हैं? आज आवश्यकता है कि विश्व पुनः उस मूल सत्य को पहचाने, जिसे गौतम बुद्ध और भगवान महावीर ने हजारों वर्ष पहले कहा था, “शांति बाहर नहीं, भीतर से प्रारंभ होती है।” जब मनुष्य अपने भीतर शांति का दीप जलाएगा, तभी विश्व के अंधकार को दूर किया जा सकेगा। और शायद तब , युद्ध की यह भयावह गाथा,

मानवता के जागरण की एक नई कथा में परिवर्तित हो जाएगी। यदि विश्व को बचाना है, तो हमें युद्ध की भाषा छोड़कर शांति की भाषा सीखनी होगी। और शायद यही वह क्षण है जब मानवता को पुनः गौतम बुद्ध  और भगवान महावीर के उस संदेश को आत्मसात करना होगा, “घृणा से घृणा कभी समाप्त नहीं होती, प्रेम से ही घृणा समाप्त होती है।”

:- अमोल पेडणेकर

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