| कर्ज लेकर जनता को उपहारों की सौगात देना राज्यों की सरकारों और जनता दोनों के लिए घातक है। एक ओर राज्यों पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है और दूसरी ओर जनता को मुफ्त में सेवाएं लेने की आदत पड रही है। इन दोनों आदतों के परिणामस्वरूप जनता की मेहनत करने की आदत और राज्य का विकास दोनों छूटते चले जाएंगे। |
भारत की संघीय आर्थिक संरचना में राज्यों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे नागरिकों के दैनिक जीवन से जुड़े अधिकांश विकासात्मक कार्यों का संचालन करते हैं। किंतु वर्ष 2026 में राज्यों की वित्तीय स्थिति का विश्लेषण एक चिंताजनक प्रवृत्ति को उजागर करता है, तेजी से बढ़ता कर्ज और उस पर चुकाए जाने वाले ब्याज का असंतुलित दबाव। कई राज्यों की स्थिति ऐसी हो गई है कि उनकी आय का बड़ा हिस्सा केवल ब्याज भुगतान में ही समाप्त हो रहा है, जिससे विकास की सम्भावनाएं सीमित होती जा रही हैं।
यदि हम उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होता है कि पश्चिम बंगाल और पंजाब इस संकट के केंद्र में हैं। पश्चिम बंगाल में ब्याज भुगतान राज्य की आय का लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जबकि पंजाब में यह 30 प्रतिशत से अधिक है। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि इन राज्यों की वित्तीय संरचना पर पुराने कर्ज का दबाव अत्यधिक हो चुका है। इन दोनों राज्यों में ऋण और सकल राज्य घरेलू उत्पाद के बीच का अनुपात भी राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है, जो दीर्घकालिक वित्तीय अस्थिरता का संकेत देता है।
इसी क्रम में केरल, राजस्थान, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्य भी मध्यम से उच्च स्तर के कर्ज दबाव का सामना कर रहे हैं। यद्यपि इन राज्यों की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत गतिशील है, फिर भी बढ़ते ब्याज भुगतान उनके राजकोषीय संतुलन को प्रभावित कर रहे हैं। दूसरी ओर, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों पर कुल कर्ज की मात्रा अधिक है, लेकिन उनकी आय क्षमता के कारण उनका ब्याज-भार अनुपात अपेक्षाकृत नियंत्रित है। यह अंतर इस बात को स्पष्ट करता है कि समस्या केवल कर्ज की मात्रा नहीं, बल्कि उसकी तुलना में आय की क्षमता भी है।
इस प्रवृत्ति के पीछे कई संरचनात्मक और नीतिगत कारण निहित हैं। पहला प्रमुख कारण राजस्व संरचना की कमजोरी है। जीएसटी व्यवस्था लागू होने के बाद राज्यों की कराधान स्वतंत्रता सीमित हुई है। कई राज्यों में कर संग्रह की दक्षता अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाई है। परिणामस्वरूप, राजस्व वृद्धि धीमी है, जबकि व्यय में निरंतर वृद्धि हो रही है। इस असंतुलन को पूरा करने के लिए राज्यों को उधार लेना पड़ता है। इसी प्रकार व्यय की प्रकृति में असंतुलन दूसरा महत्वपूर्ण कारण है । आर्थिक विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि कई राज्यों में व्यय का बड़ा हिस्सा राजस्व व्यय के रूप में होता है, जैसे वेतन, पेंशन, और सब्सिडी। पूंजीगत व्यय, जो दीर्घकालिक आर्थिक विकास को गति देता है, अपेक्षाकृत कम है। जब कर्ज का उपयोग उत्पादक क्षेत्रों में नहीं होता, तो उससे भविष्य में आय सृजन नहीं हो पाता और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जाता है।
हाल के वर्षों में अपनी लोक लुभावन नीतियों के विस्तार के कारण कई राज्यों ने मुफ्त बिजली, जल आपूर्ति, परिवहन, और ऋण माफी जैसी योजनाओं को बढ़ावा दिया है। यद्यपि ये योजनाएं सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकती हैं, परंतु इनके लिए स्थाई वित्तीय स्रोतों का अभाव कर्ज पर निर्भरता को बढ़ाता है। पंजाब और तमिलनाडु इस प्रवृत्ति के प्रमुख उदाहरण हैं। इसी प्रकार कई राज्यों में कर्ज के पुनर्गठन और प्रभावी प्रबंधन की कमी देखी जाती है। उच्च ब्याज दरों पर लिए गए पुराने कर्ज का बोझ नए कजर्र् के साथ मिलकर वित्तीय दबाव को और बढ़ा देता है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर ब्याज दरों में वृद्धि ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। यद्यपि राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम राज्यों के लिए कर्ज और घाटे की सीमाएं निर्धारित करता है, फिर भी व्यावहारिक स्तर पर इनका पालन कई बार शिथिल हो जाता है। कोविड-19 के बाद राज्यों को अतिरिक्त उधारी की अनुमति दी गई थी, जिसका प्रभाव अभी भी उनकी वित्तीय स्थिति पर दिखाई दे रहा है।
इस बढ़ते ब्याज-भार का प्रत्यक्ष प्रभाव विकास पर पड़ रहा है। जब राज्य की आय का बड़ा हिस्सा ब्याज भुगतान में चला जाता है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत ढांचे जैसे क्षेत्रों के लिए संसाधन सीमित हो जाते हैं। इससे दीर्घकालिक विकास की गति प्रभावित होती है और सामाजिक असमानताएं बढ़ सकती हैं। यदि इस स्थिति का गहन विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि भारत के कुछ राज्य ऋणपाश की ओर बढ़ रहे हैं। ऋणपाश वह स्थिति होती है, जहां सरकार को पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए नया कर्ज लेना पड़ता है। यह एक चक्रीय प्रक्रिया बन जाती है, जिससे बाहर निकलना अत्यंत कठिन होता है।
इस चुनौती से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है। सबसे पहले, राज्यों को अपनी राजस्व क्षमता में सुधार करना होगा। कर प्रशासन को मजबूत करना, कर आधार का विस्तार करना, और निवेश को आकर्षित करना आवश्यक कदम हैं। दूसरे, व्यय संरचना में सुधार करना होगा। पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देना और गैर-जरूरी राजस्व व्यय को नियंत्रित करना आवश्यक है। इससे कर्ज़ का उपयोग अधिक उत्पादक क्षेत्रों में हो सकेगा। तीसरे, लोकलुभावन नीतियों का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है। सरकारों को ऐसी योजनाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए, जो दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक लाभ प्रदान करें और जिनके लिए स्थाई वित्तीय स्रोत उपलब्ध हों। ऋण प्रबंधन और पारदर्शिता को सुदृढ़ करना होगा, यदि कर्ज़ का उपयोग और उसकी शर्तें स्पष्ट और पारदर्शी होंगी, तो बेहतर वित्तीय निर्णय लिए जा सकेंगे।
अंततः, केंद्र और राज्यों के बीच सहकारी संघवाद को मजबूत करना आवश्यक है, ताकि वित्तीय संसाधनों का संतुलित वितरण सुनिश्चित हो सके। इस प्रकार में हम कह सकते है कि वर्ष 2026 में राज्यों की वित्तीय स्थिति एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। यह केवल कर्ज का प्रश्न नहीं है, बल्कि वित्तीय प्रबंधन, नीतिगत प्राथमिकताओं और विकास की दिशा का भी प्रश्न है। यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और गहरा सकता है। अतः आवश्यक है कि राज्य सरकारें दूरदर्शिता और अनुशासन के साथ अपनी वित्तीय नीतियों का पुनर्गठन करें, ताकि विकास और स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके।
डॉ. रामेश्वर मिश्र

