| चुनावी रणनीतियां अब डिजिटल वॉर रूम और वॉलंटियर आर्मी की सक्रियता पर निर्भर करती हैं, जो त्वरित संदेश प्रसारण सुनिश्चित करते हैं। इसका उपयोग मतदाता जागरूकता और सटीक सूचना प्रसारण के लिए किया जाने लगा है। इस प्रकार सोशल मीडिया लोकतंत्र के इस महापर्व को अधिक समावेशी और प्रभावशाली बना रहा है। |
आज के दौर में सूचना की गति राजनीति की दिशा तय करती है। पारम्परिक मीडिया की अपनी सीमाएं हैं, पर डिजिटल मीडिया ने ’रियल-टाइम’ संवाद को जन्म दिया है। अब मतदाता केवल सूचना प्राप्तकर्ता नहीं है बल्कि वह स्वयं एक कंटेंट क्रिएटर और प्रचारक बन चुका है। सूचना की गति और राजनीति के बदलते व्याकरण ने डिजिटल अभियान को अनिवार्य बना दिया। यह समाज के उस अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने का सबसे सटीक माध्यम है, जो कदाचित् किसी राजनैतिक रैली में न जाए, पर दिन में 100 बार अपना फोन अवश्य देखता है। इसने लोकतंत्र को ’फिजिकल’ से ’डिजिटल’ स्पेस में शिफ्ट कर दिया है, जहां विमर्श अब चाय की दुकानों से ज्यादा व्हाट्सएप ग्रुप्स में गढ़ा जाता है।

डिजिटल कैंपेन का इतिहास: वैश्विक फलक से भारत की जमीन तक
वैश्विक स्तर पर डिजिटल चुनाव अभियान की वास्तविक शुरुआत 2008 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से मानी जाती है, जहां बराक ओबामा ने फेसबुक और ईमेल मार्केटिंग के जरिए युवाओं को जोड़कर और रिकॉर्ड फंड जुटाकर दुनिया को चौंका दिया था। इसके बाद 2012 के अमेरिकी चुनावों में ’बिग डेटा’ का उपयोग एक हथियार की तरह हुआ। भारत में डिजिटल चुनाव अभियान की शुरुआत तकनीकी रूप से 2009 में लालकृष्ण आडवाणी ने की थी, परंतु इसे एक सफल, आक्रामक और गेम-चेंजिंग हथियार के रूप में 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में और लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने स्थापित किया।
2014 के आम चुनावों ने भारतीय राजनीति के तौर-तरीकों को हमेशा के लिए बदल दिया। ’चाय पर चर्चा’ जैसे अभियानों और थ्री-डी होलोग्राम रैलियों ने यह सिद्ध कर दिया कि तकनीक अब केवल सहायक नहीं बल्कि चुनावी जीत की मुख्य पटकथा है। 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद फाइनेंशियल टाइम्स ने नरेंद्र मोदी को ’India’s First Social Media Prime Minister’ कहा. 2019 और उसके बाद के विधानसभा चुनावों तक आते-आते भारत दुनिया का सबसे बड़ा ’डिजिटल इलेक्शन ग्राउंड’ बन गया।

जनसम्पर्क का सीधा और प्रभावी माध्यम: बिना किसी ’फिल्टर’ के संवाद
डिजिटल मीडिया ने नेताओं और जनता के बीच की दीवार को गिरा दिया है। पहले नेता की बात समाचारपत्रों की सुर्खियों या टीवी की बाइट्स के माध्यम से छनकर पहुंचती थी, जिसे पत्रकार अपने हिसाब से मोड़ सकते थे। अब एक फेसबुक लाइव या इंस्टाग्राम रील के जरिए नेता सीधे अपनी बात ’अनकट’ रूप में रख सकता है। यह माध्यम न केवल सस्ता है बल्कि इसकी पहुंच असीमित है। एक छोटे से कस्बे का प्रत्याशी भी बिना भारी-भरकम विज्ञापन बजट के लाखों लोगों तक अपनी विचारधारा पहुंचा सकता है।
युवा और शहरी मतदाताओं का एकीकरण: स्मार्टफोन से पोलिंग बूथ तक
भारत की 65% जनसंख्या युवाओं की है, जो अपना अधिकांश समय डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बिताती है। शहरी और युवा मतदाता, जो प्राय: राजनीति से विमुख रहते थे, उन्हें गेमिंग, मीम्स और इंटरैक्टिव पोल्स के जरिए राजनीति में शामिल किया गया है। डिजिटल स्ट्रैटेजी अब इस पर केंद्रित होती है कि कैसे एक 15 सेकंड की रील के माध्यम से मतदाता को बूथ तक जाने के लिए प्रेरित किया जाए। यह ’पॉलिटिकल कंज्यूमरिज्म’ का दौर है, जहां हर वोटर को एक विशेष ’यूजर’ मानकर उसे कंटेंट परोसा जा रहा है।
डेटा एनालिटिक्स: लक्षित और निजीकृत
प्रचार की शक्ति
आज के चुनाव ’डेटा’ पर लड़े जा रहे हैं। डिजिटल स्ट्रैटेजिस्ट मतदाता सूची को डिजिटल डेटा के साथ जोड़कर यह पता लगाते हैं कि किस क्षेत्र में लोग किस मुद्दे पर नाराज हैं। डेटा एनालिटिक्स की सहायता से ’माइक्रो-टारगेटिंग’ की जाती है। उदाहरण के लिए यदि किसी विशेष क्षेत्र में पानी की समस्या है तो वहां के फेसबुक यूजर्स को केवल पानी की समस्या के समाधान वाले वीडियो ही दिखाए जाएंगे। यह निजीकृत प्रचार मतदाता के मनोविज्ञान पर सीधा असर डालता है।
रुझान निर्धारण और जनभावना: मीम्स और ट्रेंड्स का राजनीतिक शास्त्र
सोशल मीडिया पर क्या ’ट्रेंड’ कर रहा है, यह तय करता है कि अगले दिन समाचारपत्रों की सुर्खी क्या होगी। मीम्स आज के दौर के ’कार्टूनिस्ट’ हैं। एक प्रभावी मीम विरोधी दल की साख को पल भर में धूमिल कर सकता है। सेंटीमेंट एनालिसिस टूल्स के जरिए डिजिटल वॉर रूम यह ट्रैक करते हैं कि जनता का झुकाव किस ओर है। यदि कोई मुद्दा नकारात्मक जा रहा है तो तुरंत ’नैरेटिव’ बदलने की कवायद शुरू कर दी जाती है।
डिजिटल वॉर रूम और वॉलंटियर आर्मी: अदृश्य शक्ति का संचालन
हर बड़ी पार्टी के पास अब एक हाई-टेक ’डिजिटल वॉर रूम’ है। यहां से व्हाट्सएप के हजारों समूहों का नेटवर्क संचालित होता है। इन समूहों में बैठे ’डिजिटल वॉलंटियर्स’ किसी भी सूचना को जंगल की आग की तरह फैलाने की क्षमता रखते हैं। ये वॉर रूम चौबीसों घंटे विपक्ष के हमलों का उत्तर देने और अपने पक्ष में सकारात्मक वाताावरण बनाने का काम करते हैं। यह एक ऐसी समानांतर व्यवस्था है जो चुनाव के दौरान जमीन पर उपस्थित कार्यकर्ताओं से कहीं अधिक सक्रिय रहती है।
चुनावी अभियान में सोशल मीडिया की भूमिका अब अपरिहार्य है। इसने चुनावी प्रक्रिया को समावेशी और सक्रिय तो बनाया है, किंतु साथ ही साथ ’फेक न्यूज’ और ’डेटा चोरी’ जैसे संकटों को भी जन्म दिया है। डिजिटल कैंपेन केवल चुनाव जीतने का जरिया नहीं बल्कि जनता की आवाज बनने का माध्यम होना चाहिए।
चुनाव और डिजिटल दुनिया: कुछ अनछुए एवं महत्वपूर्ण तथ्य
डार्क ऐड्स: ये ऐसे विज्ञापन होते हैं जो केवल लक्षित दर्शकों को ही दिखते हैं, सार्वजनिक रूप से किसी की प्रोफाइल पर उपलब्ध नहीं होते। इनका उपयोग गुप्त रूप से नैरेटिव सेट करने में किया जाता है।
–विप्लव विकास

