नागेश सुर्वे की सफलता के पीछे वर्षों का संघर्ष रहा है। मुंबई जैसे प्रतिस्पर्धी शहर में अपनी पहचान बनाना आसान नहीं था, परंतु निरंतर परिश्रम, अभ्यास और संगीत के प्रति समर्पण ने उन्हें आगे बढ़ाया। उनकी यात्रा उन कलाकारों के लिए प्रेरणा मानी जाती है जो सीमित संसाधनों के बाद भी बड़े सपने देखते हैं।
प्रत्येक वर्ष 21 जून को विश्व संगीत दिवस मनाया जाता है। फ्रांस में 1982 में प्रारम्भ इस पर्व का उद्देश्य सामान्य जनता को संगीत से जोड़ना है। ग्रीष्म संक्रांति का यह दिन संगीत की सार्वभौमिकता का प्रतीक है। इस दिन सड़कों से लेकर सभागारों तक संगीत गूंजता है, परंतु संगीत का यह जादू केवल वाद्यों या गायन तक सीमित नहीं बल्कि मानवीय सांसों की अनोखी कला में भी बसता है। ऐसा ही एक अनमोल नाम है- नागेश सुर्वे, जिन्होंने सीटी को संगीत का दर्जा दिया।
नागेश सुर्वे का सफर मुंबई के दादर की गलियों से शुरू हुआ। 1975 से लेकर अब तक उन्होंने 1600 से अधिक फिल्मों में अपनी सीटी से गीतों को जीवंत किया है। बॉलीवुड के ये अनसुने नायक कभी कैमरे के सामने नहीं आए, पर उनकी सीटी सुनते ही पहचान ली जाती है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि तब आई जब उन्होंने स्वयं उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को चौंका दिया। शहनाई के जादूगर ने उनकी सीटी सुनकर कहा था कि यह कोई साधारण कला नहीं बल्कि साधना है।

किशोर कुमार जैसे महान गायक ने भी नागेश की प्रशंसा की थी। उनके द्वारा सीटी बजाए गए प्रसिद्ध गीतों में मेरा प्यार भी तू है, ओम शांति ओम, खट्टा मीठा के गाने शामिल हैं, पर यह कला उनके साथ समाप्त नहीं हुई। उनकी बेटी रूपाली सुर्वे अब इस पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही कला को आगे बढ़ा रही हैं। डिजिटल युग में भी इस कला का महत्व बना हुआ है क्योंकि उनकी सीटी में वह मिठास और सुरीली लय है, जिसे कोई मशीन या ऐप नहीं दोहरा सकता।
विश्व संगीत दिवस का यही संदेश है- संगीत की असली जादूगरी इंसानी सांसों में बसती है। नागेश सुर्वे ने सिद्ध किया कि सीटी भी एक गहरी संगीत साधना हो सकती है। 21 जून का दिन उन सभी अनकहे, अनदेखे कलाकारों को नमन करने का दिन है, जिन्होंने अपनी सांसों से संगीत के आसमान में नए तारे रच दिए।
सीटी की अनमोल धुनें : नागेश सुर्वे की सिग्नेचर ट्यून और यादगार गाने
बॉलीवुड के इतिहास में ऐसे कई गीत हैं, जिनकी जान सीटी की वह मधुर आवाज है। चाहे ‘दिल तो पागल है’ का ‘अरे-रे-अरे’ हो, ‘फना’ का ‘चांद सिफारिश’ या ‘धूम 2’ का ‘धूम अगेन’- इन गानों को सुनते ही जो सीटी गूंजती है, वह नागेश सुर्वे की ही देन है। उनकी सीटी इतनी साफ और मधुर है कि लोग प्राय: इसे बांसुरी समझ बैठते हैं।
नागेश की सबसे पहचानी जाने वाली सिग्नेचर ट्यून है
राग यमन कल्याण पर उनकी सीटी। इसी धुन ने स्वयं उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को चौंका दिया था, जब उन्होंने इसे बांसुरी समझ लिया था। यह उनकी कला की गहराई का प्रमाण है।
उनके यादगार गानों की सूची बहुत लम्बी है: ‘कर्ज’ का ‘इक हसीना थी’, हिरो का ‘डिंग डोंग’, ‘कुछ कुछ होता है’ का ’हाय हाय ये लड़का’ ‘सत्या’ का ‘सपने में मिलती है’, ‘मोहब्बतें’ का ‘चलते- चलते’ और ‘बर्फी’ के गाने भी उनकी सीटी के बिना अधूरे लगते हैं। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने ‘पहेली’ और ‘कृष’ में पक्षियों की आवाज भी अपनी सीटी से बनाई। किशोर कुमार ने एक बार उनसे कहा था, तुम वैसे ही सीटी बजाते हो जैसे मैं गाता हूं- बिना किसी मेहनत और त्रुटि के। यही नागेश सुर्वे की सीटी की असली पहचान है- एक ऐसी धुन जो दिलों में उतर जाती है और कभी समाप्त नहीं होती।
प्रारम्भिक जीवन
नागेश सुर्वे का जन्म महाराष्ट्र के एक साधारण परिवार में हुआ। बचपन से ही उन्हें संगीत में गहरी रुचि थी। पारिवारिक वातावरण में लोकधुनों और पारम्परिक संगीत का प्रभाव होने के कारण उन्होंने बहुत कम आयु में गायन शुरू कर दिया।
विद्यालयी कार्यक्रमों, स्थानीय सांस्कृतिक आयोजनों और संगीत प्रतियोगिताओं में भाग लेते हुए उन्होंने अपनी प्रतिभा को निखारा। बाद में उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा भी प्राप्त की, जिससे उनकी गायकी में तकनीकी मजबूती आई।
संगीत यात्रा की शुरुआत
नागेश सुर्वे ने अपने करियर की शुरुआत छोटे मंचीय कार्यक्रमों और ऑर्केस्ट्रा से की। उनकी आवाज में मधुरता और भावनात्मक गहराई होने के कारण वे जल्दी ही संगीत प्रेमियों की दृष्टि में आने लगे।
मुंबई पहुंचने के बाद उन्होंने संघर्षपूर्ण दौर देखा। कई वर्षों तक उन्होंने स्टूडियो रिकॉर्डिंग, लाइव शो और बैकग्राउंड वोकल्स के माध्यम से अपनी जगह बनाने का प्रयास किया। धीरे-धीरे उन्हें बॉलीवुड संगीत उद्योग में अवसर मिलने लगे।

बॉलीवुड में पहचान
नागेश सुर्वे ने बॉलीवुड फिल्मों के लिए गीत गाकर अपनी पहचान मजबूत की। उनकी गायकी में लोक और आधुनिक संगीत का संतुलन देखने को मिलता है। वे विशेष रूप से भावपूर्ण गीतों, सूफियाना अंदाज और रोमांटिक प्रस्तुतियों के लिए सराहे जाते हैं। उनकी आवाज की विशेषता यह मानी जाती है कि वे सरल शब्दों को भी गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि उनके कई गीत श्रोताओं के दिलों में लम्बे समय तक बसे रहते हैं।
गायकी की विशेषताएं
भावपूर्ण प्रस्तुति
उनकी आवाज में दर्द, प्रेम और संवेदना का अनोखा मेल दिखाई देता है।
लोक-संगीत का प्रभाव
महाराष्ट्र की लोकधुनों का प्रभाव उनके गायन में स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है।
मंचीय ऊर्जा
लाइव परफॉर्मेंस में वे दर्शकों से सीधा जुड़ाव बनाने के लिए जाने जाते हैं।
बहुआयामी शैली
वे रोमांटिक, भक्ति, सूफी और लोकगीत- सभी प्रकार के गीतों में अपनी छाप छोड़ते हैं।
सिर्फ एक गायक ही नहीं बल्कि नागेश सुर्वे भारतीय लोक-संस्कृति और पारम्परिक संगीत को आगे बढ़ाने के प्रयासों से भी जुड़े रहे हैं। वे युवा कलाकारों को मंच देने और संगीत शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए भी कार्य करते रहे हैं।
राकेश भट्ट

