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NCERT की शल्यक्रिया

NCERT की शल्यक्रिया

by हिंदी विवेक
in जुलाई 2026
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भारतीय दृष्टि से इतिहास लेखन केवल शैक्षणिक सुधार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यदि यह कार्य सत्यनिष्ठा, शोध और प्रमाणों के आधार पर सम्पन्न होता है, तो आने वाली पीढ़ियां भारत को केवल एक देश नहीं, बल्कि एक गौरवशाली सभ्यता के रूप में समझ सकेंगी।

भारत का इतिहास उस सभ्यता की जीवनगाथा है जिसने हजारों वर्षों तक विश्व को ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, अध्यात्म और मानवीय मूल्यों का मार्ग दिखाया। संपूर्ण विश्व को भारत के ज्ञान और उसकी परंपरा से आलोकित किया। किन्तु दुर्भाग्य कहिए कि जिस राष्ट्र ने वेदों की ऋचाएं रचीं, उपनिषदों का चिंतन दिया, शून्य और दशमलव की खोज की, योग और आयुर्वेद जैसी अक्षय संपदा विश्व को प्रदान की उसी राष्ट्र में 15 अगस्त 1947 के बाद से स्वातंत्र्योत्तर कालखंड में उसके ऐतिहासिक गौरव-बोध को सत्ता के संरक्षण में विकृत किया जाता रहा। पंडित नेहरू और मौलाना आज़ाद के संरक्षण में कम्युनिस्टों ने भारतीय बोध को नष्ट और पथभ्रष्ट करने का अभियान चलाया।

स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक में मार्क्स-लेनिन और माओ के पिछलग्गुओं ने योजनाबद्ध ढंग से भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात किया। ब्रिटिश उपनिवेश और पश्चिम की हीनग्रंथि से भारत को उसके मूल से काटने का ही यत्न किया। शैक्षिणक संस्थानों को दासता के चंगुल में जकड़ दिया गया। क्रूर और बर्बर इस्लामिक आक्रामकों को ’बादशाह’, ’महान’ की संज्ञा दी गई।

NCERT Launches New Initiatives to Enhance Education in India: Dharmendra  Pradhan's Vision for Students, ETEducation

हिन्दुओं का नरसंहार करने वालों, मंदिरों को नष्ट करने वालों को सुधारक बताया गया। भारतीय राजाओं को पराजित और कमजोर बताया गया। यानी जो भी भारतीय था उसे हीन बताने का एक सुदीर्घ अभियान चलाया गया। उसका दुष्परिणाम ये हुआ कि पूरे समाज को पराजयबोध, हीनता का वैचारिक दंश झेलने के लिए कांग्रेस सरकारों ने बाध्य कर दिया। पाठ्य पुस्तकों के ज़रिए हिन्दू घृणा परोसी गई।

आप ही सोचिए कि यदि कोई विद्यार्थी दशकों तक इतिहास की पुस्तकों में केवल आक्रमणों, गुलामी और विदेशी साम्राज्यों की कथाएं पढ़ता रहे, तो उसके मन में अपने राष्ट्र के प्रति गर्व की भावना कैसे विकसित होगी? इतिहास केवल अतीत का लेखा-जोखा नहीं होता, वह राष्ट्रीय चेतना का निर्माण भी करता है। यही कारण है कि विश्व के प्रत्येक राष्ट्र ने अपने इतिहास को अपने दृष्टिकोण से लिखा और पढ़ाया है।

चीन अपने प्राचीन वैभव को याद रखता है, जापान अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को शिक्षा का आधार बनाता है और इज़राइल हजारों वर्ष पुराने अपने इतिहास को भी राष्ट्रीय चेतना का केंद्र मानता है। ऐसे में भारत यदि अपनी संतानों को अपने सभ्यतागत वैभव से परिचित कराना चाहता है, तो इसमें आपत्ति का कारण क्या हो सकता है?

किन्तु जब भारत और भारतीयता की बात करने वाली सरकार आई तो व्यवस्थाओं में परिवर्तन होना प्रारम्भ हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में बदलाव का कार्य आरंभ करवाया। उसके परिणाम दिखाई ही देते कि 2004 में भाजपा सत्ता से चली गई।

किन्तु समय ने करवट बदली साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई। इसी समय से शिक्षा और इतिहास लेखन के क्षेत्र में भारत-केंद्रित दृष्टिकोण को लेकर गंभीर चर्चा प्रारंभ हुई। इसरो के पूर्व प्रमुख के. कस्तूरी रंगन की अध्यक्षता में 2017 में समिति बनी। 2020 में भारतीयता की बात करने वाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 आई। इस नीति ने पहली बार स्पष्ट शब्दों में कहा कि शिक्षा व्यवस्था को भारतीय ज्ञान परंपरा, भारतीय भाषाओं, सांस्कृतिक विरासत और भारतीय जीवन मूल्यों से जोड़ना आवश्यक है। नीति का उद्देश्य केवल डिग्रीधारी युवाओं का निर्माण नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना है जो अपनी सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रीय विरासत पर गर्व कर सकें।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बाद तैयार की गई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा और एनसीईआरटी की नई पुस्तकों में इस सोच का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इतिहास की नई पुस्तकों में भारतीय सभ्यता को केवल राजनीतिक घटनाओं की श्रृंखला के रूप में नहीं, बल्कि एक सतत सांस्कृतिक यात्रा के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। सिंधु घाटी सभ्यता के साथ सरस्वती नदी से जुड़े शोधों का उल्लेख किया गया है। मराठा, राजपूत शक्ति, भारतीय प्रतिरोध, दक्षिण भारत के चोल, पल्लव और विजयनगर जैसे साम्राज्यों को अधिक महत्व दिया गया है।

पूर्वोत्तर भारत के इतिहास, अहोम साम्राज्य और लचित बरफूकन जैसे वीरों को उचित स्थान देने का प्रयास हुआ है। जनजातीय समाज के नायकों यथा- भगवान बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, तिलका मांझी और रानी गाइदिन्ल्यू-को भी राष्ट्रीय इतिहास के मुख्य प्रवाह में लाया गया है। पाठ्यक्रम में इस्लामिक आक्रांताओं को ’शासक’ नहीं आक्रांता के तौर पर उद्धृत किया गया। उनकी क्रूरताओं को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। बाबर, अकबर, औरंगजेब, खिलजी समेत तमाम इस्लामिक लुटेरों और आतंकियों का क्रूर सच पाठ्यक्रम का हिस्सा बना। नरसंहारों, मंदिरों का विध्वंस करने वालों, हिन्दू स्त्रियों की अस्मिता पर हमला करने वालों का रक्तचरित्र सीधे तौर पर उल्लेखित किया गया।

 

इतना ही नहीं, पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान-विज्ञान की परंपरा को भी नई दृष्टि से प्रस्तुत किया जा रहा है। आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, चरक, सुश्रुत, पाणिनि और पतंजलि जैसे मनीषियों के योगदान को केवल उल्लेख भर तक सीमित न रखकर यह बताने का प्रयास किया गया है कि भारत का बौद्धिक इतिहास कितना समृद्ध रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों को शामिल किया गया। नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों का उल्लेख कर भारत की आध्यात्मिक और बौद्धिक महाशक्ति से साक्षात्कार कराया गया।

इसका परिणाम ये हुआ कि अंग्रेजों और इस्लामिक लुटेरों की नाजायज़ औलादें बिलबिलाने लगीं। मार्क्स और मैकाले पुत्र पागल कुत्ते की तरह काटने के लिए दौड़ने लगे। जब पाठ्यक्रम में भारत बोध और भारतीय दृष्टि उद्धृत की जाने लगी तो ये बिलबिला कर बिल से निकले। फुंफकार लगाते हुए ’भगवाकरण’ करने की वही चिरपरिचित बौद्धिक जुगाली करने लगे। किन्तु इनकी यहां एक नहीं चली। किन्तु सवाल ये कि क्या भारतीय नायकों को उचित स्थान देना इतिहास का राजनीतिकरण है? क्या भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख करना सांप्रदायिकता है? आख़िर इस्लामिक आक्रामकों से इन्हें इतना प्यार क्यों है, जबकि इनके रहनुमा भारत का 1947 में विभाजन कर पाकिस्तान बना चुके हैं।

एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम निर्माण की समिति में इतिहास, सामाजिक विज्ञान और राजनीति विज्ञान विषय में लंबे समय तक वामपंथियों/कम्युनिस्टों को विशेषज्ञ के तौर पर कांग्रेस सरकारों ने स्थापित किया। आंदोलन जीवियों, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों की पार्टी लाइन वाले प्रोफेसर्स को प्लांट किया गया। किन्तु मोदी सरकार आने के बाद जब पाठ्यक्रम में बदलाव, भारतीय दृष्टि से इतिहास का लेखन, प्रस्तुतिकरण किया जाने लगा तो ये सब बौखला गए। अब भी ये गिरोह जहां भी है, वहां भारत और भारतीयता के ख़िलाफ़ विष-वमन करता आ रहा है।

जब भी भारत के वास्तविक इतिहास लेखन की बात आती है तो वही पुराने चेहरे नए मुखौटे लगाकर आ जाते हैं। कभी तकनीकी पहलू तो कभी औपनिवेशिक सोच, कभी अपने एजेंडे के तहत इतिहास लेखन/पुस्तक लेखन में रोड़ा बनते हैं। ऐसे में आवश्यकता है कि सरकार और उसके जिम्मेदार कर्ताधर्ता गंभीरतापूर्वक विचार करें। एनसीईआरटी की पाठ्यक्रम निर्माण समिति की शल्यक्रिया करें। भारतबोध के लिए आवश्यक पड़े तो कठोर क़दम भी उठाएं। जवाबदेही भी सुनिश्चित करें। ताकि भारत की नई पीढ़ी को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखकर, विकसित होने का पथ प्रशस्त किया जा सके। ये नई पीढ़ी जब बढ़े तो गौरव-बोध के साथ पढ़े और प्रगति करे। राष्ट्र को नई दिशा दे और दशा बदले।

भारतीय दृष्टि से इतिहास लेखन केवल शैक्षणिक सुधार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यदि यह कार्य सत्यनिष्ठा, शोध और प्रमाणों के आधार पर सम्पन्न होता है, तो आने वाली पीढ़ियां भारत को केवल एक देश नहीं, बल्कि एक गौरवशाली सभ्यता के रूप में समझ सकेंगी। नव परिवर्तन की साक्षी बनेंगी।

क्योंकि इतिहास केवल अतीत का दर्पण नहीं होता, वह भविष्य की दिशा भी निर्धारित करता है। जिस राष्ट्र की नई पीढ़ी अपने पूर्वजों के शौर्य, संघर्ष और उपलब्धियों से परिचित होती है, वह राष्ट्र आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है। ये परिवर्तन नया भारत अवश्य करेगा।

कृष्णमुरारी त्रिपाठी ’अटल’

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