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अवसरवादी राजनीति क्षणिक, शाश्वत है आस्था

अवसरवादी राजनीति क्षणिक, शाश्वत है आस्था

by अमोल पेडणेकर
in अगस्त 2026, संघ, सामाजिक
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राम विरोधी राजनीति करनेवाले नेता आज अवसर मिलते ही कालनेमी बनकर रामनाम का जाप करते हुए हिंदू धर्म, आस्था, संस्कृति को चोट पहुंचाने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं और समाज को भ्रमित करना चाहते हैं, परंतु उनका यह षड्यंत्र कभी सफल नहीं होगा।

अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि मंदिर केवल एक भव्य स्थापत्य या धार्मिक परिसर नहीं है। यह करोड़ों भारतीयों की आस्था, सांस्कृतिक चेतना और लम्बे सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक है। इस कारण यदि वहां दान अथवा वित्तीय अनियमितता जैसे आरोप सामने आते हैं तो उसे किसी सामान्य मंदिर में हुई चोरी की घटना मानकर नहीं देखा जा सकता। यह घटना आर्थिक अपराध से कहीं अधिक श्रद्धालुओं के विश्वास, धार्मिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और व्यवस्थागत उत्तरदायित्व की कसौटी बन जाती है।

ऐसे समय समाज में दो प्रकार की प्रतिक्रियाएं दिखाई दे रही हैं। एक ओर करोड़ों रामभक्तों की स्वाभाविक पीड़ा हैं, जो चाहते हैं कि दोषियों को कठोर दंड मिले और मंदिर की पवित्रता अक्षुण्ण रहे। दूसरी ओर राजनीतिक दल और हिंदू विचारधारा के घोर विरोधी वैचारिक समूह इस घटना को अपने-अपने राजनीतिक लाभ के लिए भूना रहे हैं और मौका परस्त राजनीति का परिचय दे रहे हैं।

भारत में भगवान श्रीराम केवल पूजा के विषय नहीं हैं। वे मर्यादा, कर्तव्य, न्याय, लोककल्याण और राष्ट्रीय सांस्कृतिक स्मृति के प्रतीक हैं। राम भारतीय मानस में राजनीति से पहले और राजनीति से ऊपर हैं। इसलिए राम मंदिर में किसी प्रकार की अनियमितता का प्रभाव केवल मंदिर प्रबंधन तक सीमित नहीं रहता बल्कि करोड़ों लोगों के मन तक पहुंचता है।

किसी कर्मचारी, अधिकारी या प्रबंधन से जुड़े व्यक्ति ने श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित दान का दुरुपयोग किया है तो उसने केवल धन की चोरी नहीं की बल्कि करोड़ों भक्तों की आस्था के साथ विश्वासघात किया हैं। ऐसे व्यक्ति केवल कानून के अपराधी नहीं बल्कि नैतिक और धार्मिक दृष्टि से भी उत्तरदायी हैं। इसलिए जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और शीघ्र होनी चाहिए तथा दोषियों को बिना किसी पक्षपात के कठोर दंड मिलना चाहिए। दोषी कौन है? कितना दोषी है? यह तो समय ही बताएगा, किंतु समाचारों की और सोशल मीडिया की आंधी में यह महसूस हो रहा है कि सदाचार तिनके की तरह उड़ जाता है। अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित करने वाले चम्पत राय जैसे समर्पित व्यक्तित्व की सम्पूर्ण तपस्या इस आंधी में धुमिल हो गई, यह अत्यंत चिंता और चिंतन का विषय है।

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस घटना के कारण श्रीराम मंदिर आंदोलन, करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था अथवा पूरे हिंदू समाज की निष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगाने का प्रयास न किया जाए। किसी संस्था या व्यवस्था में कुछ व्यक्तियों के अपराध को पूरी परम्परा का चरित्र घोषित करना न न्याय है और न ही बौद्धिक निष्ठा। चम्पत राय जैसे ऋषि तुल्य व्यक्तित्व अवसरवादियों के चंगुल में अति आत्मविश्वास के कारण फंस गए। चम्पत राय और राम मंदिर का व्यवस्थापन के सिस्टम के विश्वास का कुछ गलत लोगों ने दुरुपयोग किया है। सिस्टम का पालन ठीक से नहीं हो पाया था। यह प्रश्न भी विचारणीय है कि क्या केवल विश्वास के आधार पर इतनी विशाल व्यवस्था संचालित की जा सकती है? इस बात का स्पष्ट उत्तर… ‘नहीं’ है।

शाखा चलाने के लिए साधना और तपस्या की जरूरत : दत्तात्रेय होसबाले

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी इस विषय को अत्यंत गम्भीर माना है। संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने स्पष्ट कहा कि यह करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा विषय हैं तथा दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यह प्रतिक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि किसी भी प्रकार की अनियमितता को संगठनात्मक संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। श्रद्धा का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा जब उत्तरदायित्व भी उतना ही स्पष्ट होगा।

यह भी सत्य है कि जैसे-जैसे कोई संगठन व्यापक होता है, उसके सामने नई चुनौतियां खड़ी होती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने लगभग एक शताब्दी तक अपने स्वयंसेवकों में चरित्र, अनुशासन और राष्ट्रसेवा के संस्कार विकसित करने का प्रयास किया है। भारतीय जनता पार्टी भी 2 सांसदों से देश की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनने तक पहुंची है। संगठन का विस्तार अपने साथ अवसर भी लाता है और जोखिम भी। संघ के 100 वर्ष पूर्ण हो गए हैं। संघ ने भविष्य में उज्जवल राष्ट्र निर्माण की दृष्टि सम्मुख रखकर व्यक्ति निर्माण का अपना लक्ष्य निर्धारित किया है। समाज के विभिन्न सामाजिक वर्गों तक पहुंचाने का प्रयास संघ कर रहा है। स्वाभाविक रूप से इस प्रकार की अनचाही घटना संगठन की असहजता बढ़ाता है।

संघ कार्य का विस्तार हो रहा है और राष्ट्र के सभी आयामों में संघ का प्रभाव भी निर्माण हो रहा हैं। जब कोई विचार समाज के व्यापक वर्गों तक पहुंचता है, तब उसके साथ ऐसे लोग भी जुड़ जाते हैं जिनका उद्देश्य विचार नहीं बल्कि व्यक्तिगत लाभ, पद, प्रतिष्ठा या सत्ता होता हैं। यही वह बिंदु है जहां प्रत्येक संगठन को अत्यधिक सजग रहने की आवश्यकता होती हैं।

संघ और भाजपा के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती विरोधियों से अधिक अपने भीतर प्रवेश करनेवाले अवसरवादी मानसिकता के लोग हैं। समर्पित स्वयंसेवक और कार्यकर्ता अपने जीवन समर्पण से विचारधारा की शक्ति संगठन के रूप में स्थापित करते हैं, किंतु स्वार्थी प्रवृत्तियां और घुसपैठिएं उसी संगठन को भीतर से कमजोर करते हैं। इसलिए संगठनात्मक विस्तार के साथ-साथ वैचारिक प्रशिक्षण, चरित्र परीक्षण, संस्कार और उत्तरदायित्व की संस्कृति को भी समान महत्व देना होगा। संगठन का विस्तार होते समय यदि यह संतुलन नहीं रहा तो कुछ अवसरवादी घुसपैठी व्यक्तियों की गलतियां पूरे आंदोलन की छवि को प्रभावित कर सकती हैं। आस्था और प्रशासन दोनों समान रूप से आवश्यक हैं। जहां केवल श्रद्धा होगी और व्यवस्था नहीं होगी, वहां अवसरवादियों से दुरुपयोग की सम्भावना बनी रहेगी।

देश के विविध धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान में धोखाधड़ी के मामले नए नहीं हैं। मंदिरों में दिए गए दान की चोरी या गबन की घटनाएं बार-बार सामने आई हैं। मंदिरों में दान, भक्तों से प्राप्त कीमती सामान, सोने-चांदी के हिसाब-किताब और वित्तीय लेन-देन में अनियमितताओं की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। इसीलिए भविष्य में बड़े मंदिरों में एक मानक संचालन प्रक्रिया (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) अनिवार्य होनी चाहिए। दानपात्र खोलने से लेकर नकदी की गणना, सीसीटीवी निगरानी, स्वतंत्र ऑडिट, बैंक में जमा और मासिक आय-व्यय का सार्वजनिक विवरण, इन सभी प्रक्रियाओं को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए। पारदर्शिता किसी धार्मिक संस्था की गरिमा को कम नहीं करती बल्कि उसे और अधिक विश्वसनीय बनाती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या किसी एक मंदिर की नहीं बल्कि व्यवस्थागत सुधार की है। यदि किसी स्थान पर चोरी होती है तो समाधान व्यवस्था को मजबूत करना है, न कि आस्था को कटघरे में खड़ा करना।

दुर्भाग्य यह है कि आज की राजनीति हर घटना को चुनावी चश्मे से देखने लगी हैं। विपक्ष इस प्रकरण को भाजपा और उसके वैचारिक आधार पर हमला करने के अवसर के रूप में देख रहा है। राम मंदिर के कारण हुए हिंदू एकीकरण ने भाजपा को देश के बड़े हिस्से में अपने विस्तार करने में सहायता की है। राम मंदिर मुद्दा भाजपा और संघ के लिए अत्यंत महत्वाकांक्षी और परिवर्तनकारी बन गया था। वही हिंदुत्व का तीर मंदिर चढ़ावा चोरी मुद्दे के कारण उल्टा चलाने के लिए समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, शिवसेना के उद्धव ठाकरे और अन्य विपक्षियों ने भाजपा और संघ पर हमला बोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, किंतु आज राम मंदिर के समर्थन में भाजपा और संघ पर हमला बोलने वाले विपक्षियों का अयोध्या राम मंदिर मुद्दा कभी नहीं रहा है।

राम मंदिर निर्माण का विरोध करने वाले, कारसेवकों पर गोलियां चलाने वाली समाजवादी पार्टी की छवि हिंदू समाज के मन में स्थायी है। इस कारण विरोधियों को वर्तमान में कोई लाभ नहीं मिल रहा है। आज अवसरवादी विरोधी पार्टियां हिंदूहित का दिखावा कर रही है, पर इसके पीछे की सच्चाई को छुपाया नहीं जा सकता। विपक्षियों की भूमिका राजनीति के सुविधा के अनुसार बदलती है तो गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले विपक्षियों के राजनीतिक स्वभाव को हिंदू समाज समझता है।

केजरीवाल के बाद अखिलेश और उद्धव का नाम... I.N.D.I.A. में एक ही दिन में PM पद के 3 दावेदार - INDIA Coalition PM Candidates akhilesh yadav arvind kejriwal uddhav Thackeray before mumbai

असल बात है कि अखिलेश यादव, उद्धव ठाकरे, केजरीवाल और अन्य विपक्षियों द्वारा श्रीराम के नाम पर किया गया आह्वान हिंदू जनता को आकर्षित नहीं कर रहा है क्योंकि वे अवसरवादी हैं, यह जनता भलीभांति जानती है। मंदिर के स्थान पर यदि भ्रष्टाचार हुआ है तो उसे स्वीकार करना, दोषियों को दंडित करना और व्यवस्था सुधारना आवश्यक है, पर यदि कोई इस घटना के आधार पर पूरे हिंदू समाज, राम मंदिर आंदोलन या भारतीय सांस्कृतिक चेतना को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास करता है तो वह भी वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता।

भारतीय समाज में श्रीराम का स्थान किसी राजनीतिक दल के कारण नहीं बना। श्रीराम भारत की सांस्कृतिक स्मृति में हजारों वर्षों से प्रतिष्ठित हैं। इसलिए किसी राजनीतिक दल की सफलता या असफलता से राम की प्रतिष्ठा न घटती है और न बढ़ती है। कारण राजनीति क्षणिक है, पर आस्था शाश्वत हैं। यह भी समझना होगा कि हिंदुत्व केवल चुनावी नारा नहीं है। भारतीय चिंतन में हिंदुत्व का आधार अध्यात्म, कर्तव्य और सांस्कृतिक जीवनदृष्टि है। भारत का मूल विचार अध्यात्म है। उसी अध्यात्म ने यहां के जीवन को आकार दिया और उसी जीवन से धर्म अर्थात् श्रेष्ठ आचरण की परम्परा विकसित हुईं। भारतीय संदर्भ में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं बल्कि सत्य, कर्तव्य और नैतिक आचरण है। इसलिए यह घटना हमें पुनः स्मरण कराती है कि धार्मिकता केवल बाहरी प्रतीकों से सिद्ध नहीं होती।

Devotees rush to India’s newly inaugurated Ram temple

वर्तमान समय में एक और चिंता दिखाई देती है। कुछ वैचारिक समूह भारत की सांस्कृतिक पहचान, अध्यात्म और हिंदू समाज की परम्पराओं को कमजोर करने के लिए प्रत्येक ऐसी घटना का उपयोग समाज में भ्रम निर्माण करने वाले व्यापक हिंदू विरोधी वैचारिक अभियान के रूप में करते हैं। आलोचना और उत्तरदायित्व लोकतंत्र का हिस्सा हैं, पर किसी अपराध को पूरे हिंदू धर्म के विरुद्ध प्रचार का माध्यम बनाना उचित नहीं कहा जा सकता।

इस घटना से सबसे बड़ी सीख यही है कि धार्मिक संस्थाओं में प्रशासनिक दक्षता, वित्तीय अनुशासन और सार्वजनिक उत्तरदायित्व को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। साथ ही संघ और भाजपा जैसे व्यापक प्रभाव वाले संगठनों को भी यह आत्ममंथन करना होगा कि विस्तार के साथ वैचारिक एवं संस्कारों से जुड़ी गुणवत्ता कैसे बनाए रखी जाए। केवल संगठन का बढ़ना पर्याप्त नहीं, उसके भीतर चरित्र, सेवा और राष्ट्रनिष्ठा के संस्कार भी उतनी ही दृढ़ता से विकसित होने चाहिए। संगठन विस्तार के दिखने वाले लाभ को भांपकर संघ और भाजपा के नजदीक आने वाले अवसरवादी और स्वार्थी तत्व किसी भी संगठन की सबसे बड़ी कमजोरी बन सकते हैं। इसलिए संगठनात्मक अनुशासन, नैतिक प्रशिक्षण और समय-समय पर उत्तरदायित्व की समीक्षा आवश्यक है।

यह विवाद किसी राजनीतिक दल की विजय या पराजय का विषय नहीं होना चाहिए। यह करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा का विषय हैं। दोषियों को कठोर दंड मिले, मंदिर प्रबंधन पारदर्शी बने, प्रशासन अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो- यही इस पूरे प्रकरण का सबसे उचित पटाक्षेप होगा। श्रीराम भारत की आत्मा हैं, उन्हें राजनीति की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। श्रीराम का नाम सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं बल्कि सत्य, मर्यादा, न्याय और लोककल्याण का प्रेरणास्रोत हैं।

यदि हम वास्तव में श्रीराम के प्रति श्रद्धा रखते हैं तो उनकी सबसे बड़ी पूजा यही होगी कि उनके मंदिर, उनके नाम और उनके आदर्शों को पूर्ण निष्ठा, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के साथ सुरक्षित रखें। यही इस घटना का सबसे बड़ा संदेश भी है और भारत की सांस्कृतिक चेतना के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी भी अब बढ़ रही है।

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