“कुछ व्यक्तित्व समय की सीमा में बंधे नहीं होते। उनका जीवन एक विचार बन जाता है, उनका आचरण एक आदर्श और उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत। स्वर्गीय श्री नन्दकिशोर गोयंका जी ऐसे ही विरल व्यक्तित्व थे।”
नन्दकिशोर गोयंका जी का पार्थिव शरीर तो पंचतत्व में विलीन हो गया, परंतु उनका जीवन-दर्शन, उनकी कर्मनिष्ठा, उनका सेवा-भाव और उनके द्वारा स्थापित आदर्श सदैव समाज का पथ आलोकित करते रहेंगे। वे उन लोगों में थे जिन्होंने कभी स्वयं को केंद्र में नहीं रखा, बल्कि समाज, राष्ट्र और संस्कृति को अपने जीवन का केंद्र बनाया। उनका व्यक्तित्व जितना विशाल था, उतना ही विनम्र भी। जितना प्रभावशाली था, उतना ही आत्मसंयमी। वे वास्तव में कर्मयोगी थे।

28 सितम्बर 1930 को हरियाणा के हिसार की पावन भूमि पर जन्मे नन्दकिशोर गोयंका जी ने अपने जीवन का निर्माण भारतीय संस्कारों, कठोर परिश्रम और नैतिक मूल्यों के आधार पर किया। जीवन के प्रारंभिक संघर्षों ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारों ने उन्हें राष्ट्रजीवन का सजग साधक बना दिया। उन्होंने कभी प्रसिद्धि की आकांक्षा नहीं की, बल्कि अपने प्रत्येक कार्य को ईश्वरार्पण और राष्ट्रसेवा का माध्यम माना।
सामान्य रूप से देश उन्हें प्रख्यात उद्योगपति, एस्सेल समूह के संस्थापक एवं मीडिया जगत के अग्रणी व्यक्तित्व डॉ. सुभाष चंद्रा जी के पूज्य पिता के रूप में जानता है, किंतु जिन्होंने उन्हें निकट से देखा, वे जानते हैं कि उनकी अपनी पहचान कहीं अधिक व्यापक थी। वे समाज के मार्गदर्शक, संगठन के विश्वसनीय कार्यकर्ता, गौसेवा के तपस्वी, अग्रवाल समाज के प्रेरक और राष्ट्रजीवन के सजग प्रहरी थे।
संघ संस्कारों से निर्मित जीवन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उनके जीवन का केवल एक संगठन नहीं था, बल्कि जीवन-दृष्टि था। वे संघ के एक कर्मठ, अनुशासित और निष्ठावान स्वयंसेवक रहे। उन्होंने संघ के उस मूल मंत्र— “राष्ट्र प्रथम” को अपने जीवन में पूरी निष्ठा से उतारा। उनके लिए राष्ट्रभक्ति भाषण का विषय नहीं, बल्कि जीवन की दिनचर्या थी। अनुशासन, समयपालन, विनम्रता, आत्मसंयम और संगठन-भाव उनके स्वभाव में स्वाभाविक रूप से समाहित थे।
विश्व हिंदू परिषद और धर्मरक्षा का संकल्प
विश्व हिंदू परिषद के हरियाणा प्रांत के उपाध्यक्ष के रूप में तथा गौरक्षा की केंद्रीय टोली के सदस्य के रूप में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। वे मानते थे कि हिंदू समाज का संगठन केवल किसी संस्था का कार्य नहीं, बल्कि प्रत्येक जागरूक नागरिक का दायित्व है। परिषद के सेवा, संस्कार, समरसता और धर्मजागरण के कार्यों में उन्होंने तन, मन और संसाधनों से सहयोग दिया।
गौरक्षा उनके लिए केवल आंदोलन नहीं थी; वह भारतीय संस्कृति, कृषि, ग्राम्य जीवन और करुणा की रक्षा का अभियान था। वे गौमाता को भारतीय जीवन का आधार मानते थे। अनेक गौशालाओं और गौरक्षा अभियानों के साथ उनका सक्रिय जुड़ाव इसी जीवन-दृष्टि का प्रमाण था।
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विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा— “नन्दकिशोर गोयंका जी का पार्थिव शरीर तो आज पंचतत्व में विलीन हो गया, परंतु उनके गु ण, कर्म, स्वभाव और महानता सदैव अमिट रहेंगे। संघ के एक कर्मठ स्वयंसेवक के रूप में उन्होंने आजीवन निस्वार्थ सेवा दी। महाराजा अग्रसेन के सच्चे वंशज के रूप में उन्होंने अग्रोहा धाम को वैश्य समाज के एक तीर्थ के रूप में विकसित किया। विश्व हिंदू परिषद के हरियाणा प्रांत उपाध्यक्ष एवं गौरक्षा की केंद्रीय टोली के सदस्य के रूप में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। गौमाता के वे सच्चे सेवक थे और भारत माता के लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।” यह श्रद्धांजलि वस्तुतः उनके संपूर्ण जीवन का सार है।
अग्रोहा धाम : एक स्वप्न, एक साधना
महाभारत के युद्ध के साक्षी महाराजा अग्रसेन केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि ‘एक ईंट व सवा रूपये’ जैसे समता, सहयोग और लोककल्याण की भारतीय परंपरा के प्रतीक हैं। नन्दकिशोर गोयंका जी ने इस विरासत को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लिया।
अग्रोहा धाम के विकास में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने इसे केवल मंदिर परिसर या स्मारक के रूप में नहीं, बल्कि वैश्य समाज की सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय पुनर्जागरण के तीर्थ केंद्र के रूप में विकसित करने का स्वप्न देखा। आज देशभर से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए अग्रोहा धाम श्रद्धा, प्रेरणा और संगठन का केंद्र है। इस उपलब्धि में उनका योगदान सदैव सम्मानपूर्वक स्मरण किया जाएगा।
समाजसेवा : प्रचार नहीं, जीवन-पद्धति
उनका विश्वास था कि सेवा का सबसे श्रेष्ठ रूप वही है जिसमें यश की अपेक्षा न हो। इसलिए उन्होंने कभी अपने कार्यों का प्रचार नहीं किया। शिक्षा, चिकित्सा, धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों तथा जरूरतमंद लोगों की सहायता में उनका सहयोग निरंतर बना रहा।
वे मानते थे कि समाज केवल आर्थिक उन्नति से महान नहीं बनता; उसे संस्कार, शिक्षा और सेवा की भी आवश्यकता होती है। इसी कारण उन्होंने अनेक सामाजिक एवं शैक्षिक प्रयासों को प्रोत्साहन दिया और समाज को जोड़ने का कार्य किया।
सादगी : उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान
आज के युग में जब प्रतिष्ठा का मापदंड बाहरी वैभव बनता जा रहा है, तब नन्दकिशोर गोयंका जी का जीवन सादगी का अनुपम उदाहरण था। अत्यंत प्रतिष्ठित परिवार से होने के बावजूद उनके जीवन में दिखावा नहीं था। वे सहज, सरल और आत्मीय थे। उनके द्वार पर आने वाला व्यक्ति कभी अपने को पराया अनुभव नहीं करता था।
उनकी वाणी में मधुरता, व्यवहार में आत्मीयता और निर्णयों में स्पष्टता थी। वे सुनने की क्षमता रखते थे, इसलिए समाज उन्हें सम्मान देता था।
परिवार को दिए अमूल्य संस्कार
हर महान परिवार के पीछे एक महान संस्कारदाता होता है। गोयंका परिवार के लिए वह भूमिका नन्दकिशोर गोयंका जी ने निभाई। उन्होंने अपने बच्चों को केवल सफलता का मार्ग नहीं दिखाया, बल्कि यह भी सिखाया कि सफलता का उद्देश्य समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाना है। डॉ. सुभाष चंद्रा, लक्ष्मी नारायण, जवाहर जी व अशोक गोयल जी के व्यक्तित्व में दिखाई देने वाली कर्मठता, साहस, नवाचार और भारतीयता के मूल में उनके पिता के संस्कार ही स्पष्ट दिखाई देते हैं।
अंतिम विदाई अमर प्रेरणा
96 वर्ष की आयु में उनकी जीवनयात्रा पूर्ण हुई। हिसार की पावन भूमि पर जब उनका अंतिम संस्कार हुआ, तब केवल एक परिवार नहीं, बल्कि समाज का एक युग उन्हें विदा कर रहा था। असंख्य स्वयंसेवक, संत, सामाजिक कार्यकर्ता, उद्योगपति, जनप्रतिनिधि और सामान्य नागरिक उन्हें अंतिम प्रणाम देने पहुँचे। यह सम्मान किसी पद का नहीं, बल्कि एक तपस्वी जीवन का था।
नन्दकिशोर गोयंका जी ने अपने जीवन से सिद्ध किया कि राष्ट्रसेवा और समाजसेवा के लिए किसी पद की आवश्यकता नहीं होती; आवश्यकता होती है निष्काम भाव, दृढ़ संकल्प और सतत कर्म की। उन्होंने जीवनभर संघ के स्वयंसेवक की निष्ठा, विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता का समर्पण, गौभक्त की करुणा, अग्रवंशी की सामाजिक चेतना और एक भारतीय गृहस्थ की मर्यादा को एक साथ जीकर दिखाया।
उनका जीवन भारतीय संस्कृति के उस आदर्श का मूर्त रूप था जिसमें धर्म, सेवा, संगठन, करुणा, विनम्रता और राष्ट्रभक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं।
आज वे सशरीर भले हमारे बीच नहीं हैं, परंतु उनके द्वारा रोपे गए संस्कारों के वृक्ष आने वाली पीढ़ियों को छाया देते रहेंगे। उनके आदर्श समाज को दिशा देते रहेंगे। उनकी तपस्या राष्ट्रजीवन को प्रेरित करती रहेगी।
ऐसे राष्ट्रऋषि, कर्मयोगी, गौभक्त, समाजनायक और प्रेरणापुरुष स्वर्गीय श्री नन्दकिशोर गोयंका जी को कोटिशः नमन।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
– विनोद बंसल
