कवि यह सोचकर किसी काव्य की रचना नहीं करता कि वह लोक में प्रसिद्ध होगा। वह अपने भीतर उठे भाव, अनुभव और विचारों को शब्द देता है। कवि कुलभूषण तुलसीदास ने जब रामचरितमानस की रचना की होगी, तब उन्होंने भी शायद यह नहीं सोचा होगा कि उनकी रचना आने वाली सदियों में लोकजीवन का इतना गहरा हिस्सा बन जाएगी। उन्होंने अपनी विनम्रता व्यक्त करते हुए स्वयं कहा है—
“कबित बिबेक एक नहिं मोरें।
सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें॥”
लेकिन लोक ने रामचरितमानस को वह स्थान दिया, जो बहुत कम काव्य ग्रंथों को प्राप्त हुआ। वह धीरे-धीरे तुलसीदास का काव्य भर नहीं रहा। लोक ने उसे अपनाया, गाया, सुना, याद किया और अपने जीवन के प्रसंगों में उतार लिया। इस तरह मानस लोक में समरस हो गया।
भारत में रामकथा की यात्रा बहुत पुरानी है। महर्षि वाल्मीकि की रामायण से लेकर देश की अलग-अलग भाषाओं, लोकपरंपराओं और काव्यधाराओं तक राम अनेक रूपों में सामने आते रहे हैं। कहीं वे आदर्श राजा हैं, कहीं वनवासी राम, कहीं लोकदेवता और कहीं भक्त के हृदय में बसे आराध्य। इसी लंबी परंपरा में तुलसीदास की रामचरितमानस एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में दिखाई देती है।
तुलसीदास ने रामकथा को नया विषय नहीं दिया। उनके सामने महर्षि वाल्मीकि की रामायण सहित रामकथा की समृद्ध परंपरा मौजूद थी। उनका असाधारण योगदान यह था कि उन्होंने इस कथा को ऐसी भाषा और काव्य-भंगिमा में प्रस्तुत किया, जिसमें सामान्य जन अपने अनुभवों की आवाज सुन सके। अवधी में रचा गया रामचरितमानस मुख्यतः दोहा-चौपाई की संरचना में है। परंपरागत विवरणों के अनुसार तुलसीदास ने इसका आरंभ संवत् 1631 यानी 1574 ईस्वी में किया।
उस समय समाज का बहुत बड़ा हिस्सा संस्कृत का पाठक नहीं था। कथा सुनने वालों की संख्या पढ़ने वालों से कहीं अधिक रही होगी। तुलसीदास ने लोक की इसी स्थिति को समझा। उन्होंने रामकथा को अवधी में रखा। यह निर्णय केवल भाषा का चुनाव नहीं था, लोकजीवन से सीधा संवाद था।
मानस के आरंभ में तुलसीदास कहते हैं—
“संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी।
रामचरितमानस कबि तुलसी॥”
और आगे—
“करइ मनोहर मति अनुहारी।
सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी॥”
यहां “सुनि” शब्द पर ठहरना चाहिए। तुलसी के लिए काव्य केवल पढ़ने की वस्तु नहीं था। उसे सुना जाना था। चौपाल में, मंदिर में, कथा में, परिवार के बीच। यही कारण है कि मानस की रचना में श्रव्यता इतनी महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति पढ़ सकता था, दूसरा सुन सकता था और कोई तीसरा उसे गा सकता था। इस तरह लिखित काव्य धीरे-धीरे वाचिक परंपरा का हिस्सा बन गया।

रामचरितमानस का सबसे मार्मिक प्रसंग राम का वनगमन है। अयोध्या का राजकुमार वन की ओर जाता है, लेकिन तुलसीदास इसे केवल राजपरिवार के संकट के रूप में नहीं देखते। इसमें पिता के वचन, पुत्र के कर्तव्य और व्यक्ति की मर्यादा का प्रश्न जुड़ जाता है। दशरथ के मुख से निकलता है—
“रघुकुल रीति सदा चलि आई।
प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥”
दो पंक्तियों में एक पूरा नैतिक संसार खड़ा हो जाता है। प्राण चले जाएं, वचन न जाए। राम का वनवास इसलिए केवल कथा की घटना नहीं रह जाता, वह भारतीय लोकमानस में कर्तव्य और मर्यादा की कसौटी बन जाता है।
राम वन जाते हैं तो सीता और लक्ष्मण भी साथ चलते हैं। राजमहल पीछे छूट जाता है और वन सामने आता है। सीता के भावों को तुलसी जिस सहजता से व्यक्त करते हैं, वह मन को छूता है—
“सिय मनु राम चरन अनुरागा।
अवध सहस सम बनु प्रिय लागा॥”
राम के साथ होने के कारण वन भी सीता को अयोध्या से अधिक प्रिय लगने लगता है। यहां वन केवल भौगोलिक स्थान नहीं रह जाता, वह संबंधों और भावनाओं का संसार बन जाता है।
चित्रकूट पहुंचने पर रामकथा का एक और रूप सामने आता है। यहां राजमहल नहीं है। कोल-किरात हैं, वनवासी हैं, मुनि हैं, नदी-पर्वत और वन्य जीवन है। राम के आने की खबर पाकर वनवासी जिस उत्साह से उनकी ओर आते हैं, तुलसी लिखते हैं—
“यह सुधि कोल किरातन्ह पाई।
हरषे जनु नव निधि घर आई॥
कंद मूल फल भरि भरि दोना।
चले रंक जनु लूटन सोना॥”
जिनके पास राजकीय वैभव नहीं, वे कंद-मूल और फल लेकर आते हैं। उनके पास देने के लिए यही है और उनके लिए यही सबसे बड़ा उपहार है। राम भी उनके प्रेम को स्वीकार करते हैं—
“राम सनेह मगन सब जाने।
कहि प्रिय बचन सकल सनमाने॥”
यहीं रामकथा राजसत्ता के केंद्र से निकलकर लोक के बीच आती है। व्यक्ति की सामाजिक स्थिति से अधिक उसके प्रेम और भाव का महत्व दिखाई देता है।
तुलसीदास के राम को समझने के लिए शायद यह एक पंक्ति पर्याप्त है—
“रामहि केवल प्रेमु पिआरा।
जानि लेउ जो जाननिहारा॥”
निषादराज, केवट, शबरी और वनवासी पात्रों के प्रसंगों में यही आत्मीयता दिखाई देती है। राम के साथ उनका संबंध कथा को लोकजीवन से जोड़ता है। केवट के प्रसंग में गंगा के किनारे नाव चलाने वाला एक सामान्य व्यक्ति राम के सामने खड़ा है। उसके पास न राजकीय शक्ति है, न शास्त्रीय ज्ञान का प्रदर्शन। उसके पास सहज बुद्धि, अपनापन और भक्ति है। यही भाव मानस को दूर के देवता की कथा से उठाकर मनुष्य के अपने अनुभवों के करीब ले आता है।
भरत का चरित्र भी इसी मानवीय संसार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। राम वन चले जाते हैं और अयोध्या का राजपाट भरत के सामने है। सत्ता उन्हें मिल सकती है, लेकिन उनका मन उसे स्वीकार नहीं करता। भरत का त्याग भाई के प्रति प्रेम के साथ सत्ता के प्रति वैराग्य का भी उदाहरण बनता है। तुलसीदास के लिए यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि अधिकार मिलने के बाद मनुष्य उसका व्यवहार कैसे करता है। भरत इसका उत्तर अपने आचरण से देते हैं।
यहीं से रामचरितमानस की दूसरी बड़ी यात्रा शुरू होती है। चौपाई और दोहा केवल पढ़े नहीं गए, गाए गए। मानस मंडलियां बनीं। कथा कही गई। रामलीला के मंच पर पात्रों ने तुलसी की पंक्तियों को संवाद बनाया। गांवों में लोग मानस का पाठ सुनने लगे। जिसने स्वयं ग्रंथ नहीं पढ़ा, वह भी किसी पाठ या कथा के माध्यम से उससे जुड़ गया।
किसी साहित्यिक रचना के लिए इससे बड़ी सामाजिक उपलब्धि क्या होगी कि उसकी पंक्तियां लोगों को याद रहें और उसके पात्र लोकनाट्य के पात्र बन जाएं?
आज भी किसी गांव में मानस का पाठ शुरू होता है तो लोग केवल पुस्तक लेकर नहीं बैठते। कोई चौपाई पढ़ता है, कोई उसकी टीका कहता है, कोई प्रसंग सुनाता है और श्रोता अपनी स्मृतियों से उसमें कुछ जोड़ देते हैं। यही वह प्रक्रिया है जिसमें साहित्य लोक का हिस्सा बनता है।
तुलसीदास ने लोकभाषा को गंभीर आध्यात्मिक, दार्शनिक और नैतिक विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। उनकी भाषा सहज दिखाई देती है, लेकिन उसके भीतर भक्ति, दर्शन, नीति और मानवीय मनोविज्ञान की कई परतें हैं। इसी कारण रामचरितमानस को केवल धार्मिक ग्रंथ मानकर देखना उसके व्यापक साहित्यिक और सामाजिक प्रभाव को सीमित कर देना होगा।
रामकथा तुलसीदास से बहुत पहले से भारत में थी। लेकिन तुलसीदास ने उसे ऐसी भाषा दी, जिसे लोक सुन सकता था; ऐसी लय दी, जिसे लोक गा सकता था और ऐसे पात्र दिए, जिनमें लोक अपने जीवन को पहचान सकता था।
इसलिए रामचरितमानस अंततः केवल तुलसीदास की रचना नहीं रही। लोक ने उसे अपने कंठ में रखा, अपनी स्मृति में बसाया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे पहुंचाया। कवि ने कागद पर लिखा था, लेकिन लोक ने उसे अपने हृदय पर अंकित कर लिया।
आचार्य ललित मुनि
