वैश्विक स्तर पर मची खलबली और ऊहापोह की स्थिति में भी विश्व खेल जगत अपनी तय राह और दिशा पर नित अग्रसर है। खेल जगत ने दिखाया है – निरंतर चलते रहने, न रुकने या थकने और न हारने का नाम है खेल। भारतीय खेल जगत भी इसी राह पर चल रहा है। …बल्कि गौर करें तो भारतीय खेल जगत संभवत: कुछ तेज गति से आगे बढ़ रहा है। उदाहरण के तौर पर, बदलते भारत में भारतीय खेल जगत नए जोश व उत्साह के साथ आगे बढ़ने को दृढ़ संकल्प नजर आ रहा है। दूसरा, पिछले दिनों ग्लासगो राष्ट्रकुल खेलों में शानदार प्रदर्शन कर लौटे भारतीय दल के सामने अहमदाबाद में होने वाले अगले 2030 राष्ट्रकुल खेलों में देश का नाम रोशन करने का कठिन लक्ष्य है।
तमाम खेल हैं लुभाने को
इस क्रम में भारतीय क्रिकेट देश का नाम रोशन करने में सबसे आगे रहा है। वैभव सूर्यवंशी, अभिषेक शर्मा, देवदत्त पड्डीकल और मानव सुथार जैसे कई नाम हैं जो विश्व क्रिकेट जगत में धूम मचा रहे हैं। देश में खेल संस्कृति को विकसित करने में क्रिकेट की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और खेलप्रेमियों के बीच सबसे प्रचलित खेल के रूप में क्रिकेट का ही नाम लिया जाता रहा है। लेकिन इस बीच, एथलेटिक्स, बैडमिंटन, निशानेबाजी, मुक्केबाजी, भारोत्तोलन, तीरंदाजी, जूडो और अपनी समृद्ध परंपरा को कायम करने की ओर अग्रसर हॉकी में भारत जिस गति से प्रगति कर रहा है, वह एक संतोषजनक, एक सकारात्मक परिणाम के तौर पर देखा जा सकता है।

उदाहरण के लिए पिछले दिनों 2026 ग्लासगो राष्ट्रकुल खेलों में शानदार प्रदर्शन, विश्व कप हॉकी में महिला व पुरुष दोनों टीमों का विश्वास के साथ आगे बढ़ना और देश की राजधानी दिल्ली में चल रहे बीडब्ल्यूएफ बैडमिंटन विश्व कप में युवा खिलाड़ियों के हैरतअंगेज प्रदर्शन विश्व खेल जगत में भारत के बढ़ते कद को बखूबी दर्शाता है। बैडमिंटन की सुपर पावर चीन, मलेशिया, इंडोनेशिया या यूरोपीय देशों के खिलाड़ी भारत के लक्ष्य सेन, सात्विक व चिराग शेट्टी की जोड़ी, किदाम्बी श्रीकांत, पीवी सिंधू और आयुष शेट्टी जैसे खिलाड़ियों के सामने अब सहमे-सहमे से कोर्ट पर उतरते हैं। एक समय था जब विपक्षी खिलाड़ी बैडमिंटन कोर्ट पर भारतीय खिलाड़ियों को देखते ही मान लेते थे कि उन्हें आसानी से जीत मिल जाएगी। लेकिन अब कहानी पूरी तरह से बदल गयी है।
पौराणिक खेलों में भी अव्वल
यही नहीं, भारत के पौराणिक खेल जैसे तीरंदाजी, कुश्ती और कबड्डी में भी भारतीय खिलाड़ी पूरा दमखम दिखाते हैं। भारतीय खेल की बदलती दशा व दिशा का ही नतीजा है कि अब खेलप्रेमी मानने लगे हैं कि देश एक खेल संस्कृतियुक्त राष्ट्र बन रहा है। यही नहीं, पहले जहां फुटबॉल, हॉकी और क्रिकेट मैचों के दौरान स्टेडियमों या टीवी चैनलों पर दर्शकों की भरमार लगी रहती थी, अब अन्य खेलों के प्रति भी दर्शकों का रुझान उतना ही गहरा है। अब बैडमिंटन, कबड्डी, कुश्ती और भारोत्तोलन जैसे खेलों में भी देश को स्टार खिलाड़ी मिलने लगे हैं। इसे अतिशयोक्ति न मानें तो कई बार ऐसा भी मौका आया है जब एक ओर क्रिकेट का मैच चल रहा है और दूसरी ओर, नीरज चोपड़ा ओलंपिक या डायमंड लीग जैसे महामंच पर जेवलिन थ्रो कर रहे हैं, तो ज्यादातर खेलप्रेमी एथलेटिक्स के मुकाबले देखने के लिए टीवी से चिपके नजर आते हैं।

राष्ट्रकुल खेलों से बढ़ा जलवा
2026 ग्लासगो राष्ट्रकुल खेलों में भारतीय दल का यादगार प्रदर्शन रहा। इस दौरान विश्व मुक्केबाजी में अब भारत एक महाशक्ति नहीं, बल्कि सम्मान के साथ लिया जाने वाला नाम बन गया है। ग्लासगो में भारतीय मुक्केबाजों ने 7 स्वर्ण व 3 रजत सहित कुल 10 पदक जीते, जो राष्ट्रकुल खेलों के 94 वर्षों के इतिहास में किसी एक संस्करण में किसी भी देश द्वारा जीते गए सर्वाधिक पदकों का रिकॉर्ड है। भारत के 10 मुक्केबाजों ने फाइनल में जगह बनायी और उनमें से 7 को स्वर्णिम पंच जड़ते देख भारतीय खेलप्रेमियों का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। और, भारतीय नारी शक्ति की प्रहार क्षमता देखते ही बन रही थी जब जैसमिन लंबोरिया व साक्षी चौधरी 5 महिला मुक्केबाजों ने स्वर्ण पदक जीते। दमदार पंच के दम पर भारतीय महिला मुक्केबाजी टीम विश्व की नंबर एक टीम बन गयी है जो एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।
एथलीटों की लंबी छलांग
कमोबेश इसी तरह भारतीय एथलीटों ने भी ग्लासगो में शानदार प्रदर्शन करते हुए देश का नाम रोशन किया। स्टार खिलाड़ी नीरज चोपड़ा पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धमक साबित कर चुके हैं, लेकिन जेवलिन थ्रो में ही नीरज के साथ यशवीर सिंह का विजेता मंच पर खड़ा होना देश का मान काफी बढ़ा गया। शारीरिक दमखम के दम पर पारंपरिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों का कद निरंतर बढ़ता जा रहा है। इसका उदाहरण कुश्ती, कबड्डी और मुक्केबाजी में खूब देखने को मिला, अब भाला फेंक, गोला फेंक, या तारगोला फेंक स्पर्धाओं में भी भारतीय खिलाड़ी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगे हैं। एथलेटिक्स की लंबी दूरी की दौड़ या डेकाथलॉन में भी भारतीय धावकों ने धमाकेदार प्रदर्शन किया।
गुलवीर सिंह ने ग्लास्गो में वह कर दिखाया जो आज तक कोई भारतीय ट्रैक एथलीट नहीं कर पाया था। वह एक ही राष्ट्रमंडल खेलों के संस्करण में दो व्यक्तिगत मेडल जीतने वाले भारत के पहले ट्रैक एंड फील्ड एथलीट बने। पुरुषों की 10 हजार मीटर दौड़ में उन्होंने रजत और 5 हजार मीटर दौड़ में असाधारण स्टैमिना दिखाते हुए कांस्य पदक अपने नाम किया। इसी तरह, तेजस्विन शंकर डेकाथलॉन (10 स्पर्धाएं) में पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने। उन्होंने दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर कांस्य पदक जीत एशियाई देशों के बीच अपनी पहचान कायम की।
भारोत्तोलन का बढ़ता ग्राफ
इसी तरह, भारतीय भारोत्तोलकों ने विश्व स्तर पर कई बार देश का नाम रोशन किया है। वर्ष 2000 सिडनी ओलंपिक में कांस्य पदक जीत इतिहास रचने वाली कर्णम मल्लेश्वरी और कुंजारानी देवी ने भारत में दो-तीन दशक पहले भारोत्तोलन को एक नयी पहचान दिलायी थी जिसे 2020 टोक्यो ओलंपिक की रजत पदक विजेता मीराबाई चानू ने अब तक कायम रखा है। ग्लासगो सहित राष्ट्रकुल खेलों में लगातार तीन बार स्वर्ण पदक जीत इतिहास रचने वाली मीराबाई चानू ने एक बातचीत के दौरान बताया कि भारतीय भारोत्तोलकों को अब वैज्ञानिक तौर-तरीके से प्रशिक्षण दिलाया जाता है और बेहतर सुविधाओं के बीच उन्हें अभ्यास कराया जाता है जिसका फायदा साफ तौर पर दिख रहा है। ग्लासगो में भारोत्तोलन में मीराबाई के एक स्वर्ण सहित 6 रजत और एक कांस्य पदक जीतना भारत में खेल की बदलती बयार का उदाहरण है।
प्रवीण सिन्हा

