हाल ही में न्यूयॉर्क की प्रसिद्ध टैटू आर्टिस्ट ‘जेमा फेरर’ भारत यात्रा के दौरान राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी जयपुर पहुँचीं। यहाँ उन्होंने वास्तुकला, कला, इतिहास और जनजीवन को करीब से देखा। इस अनुभव ने उनके भारत संबंधी दृष्टिकोण को बदल दिया और सोशल मीडिया पर एक नई बहस को जन्म दिया। उनके विचारों ने पश्चिमी दुनिया के उस पुराने विमर्श पर भी सवाल खड़ा किया, जिसमें भारत को लंबे समय तक गरीबी, पिछड़ेपन, भीड़ और अव्यवस्था की छवियों से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता रहा है।
जेमा फेरर ने दो टूक शब्दों में कहा, “भारत कभी गरीब नहीं था, बल्कि उसे जानबूझकर गरीब बनाया गया।” उनके अनुसार, पश्चिमी फिल्मों और लोकप्रिय संस्कृति में भारत की जो तस्वीर दिखाई जाती रही है, वह उसकी पूरी वास्तविकता नहीं है। हजारों वर्ष पुरानी भारतीय सभ्यता, ज्ञान परंपरा, कला, वस्त्र और जीवन-दर्शन को दुनिया के सामने उस व्यापकता के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके वे अधिकारी हैं।
उनका मानना है कि भारत को समझने के लिए उसकी वर्तमान परिस्थितियों के बजाय उसकी पूरी ऐतिहासिक यात्रा को सामने रखना आवश्यक है। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के ऐतिहासिक स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में मजबूत पारंपरिक उद्योग, हस्तशिल्प और व्यापारिक परंपराएं मौजूद थीं। विशेष रूप से भारतीय कपड़ा उद्योग का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि एक समय भारत के सूती कपड़े, मलमल और रेशमी वस्त्रों की दुनिया भर में मांग थी तथा टेक्सटाइल भारत की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में शामिल था।
जेमा के अनुसार, ब्रिटिश शासन के दौरान लागू की गई औपनिवेशिक व्यापार नीतियों ने इन उद्योगों को गहरा नुकसान पहुंचाया। उनका कहना है कि ब्रिटिश आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने वाली नीतियों का सीधा असर भारतीय बुनकरों और कारीगरों पर पड़ा और बड़ी संख्या में लोग आर्थिक संकट में पहुंच गए। उनके दृष्टिकोण में भारत की पारंपरिक औद्योगिक शक्ति को कमजोर करना औपनिवेशिक आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
भारत और पश्चिम के सांस्कृतिक संबंधों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने योग, आयुर्वेद और मेडिटेशन का उल्लेख किया। उनका कहना है कि पश्चिमी समाज ने इन भारतीय परंपराओं को अपनाया और इनके इर्द-गिर्द बड़े वैश्विक बाजार विकसित हुए, मगर इन परंपराओं के मूल स्रोत और उन्हें विकसित करने वाले भारतीय समाज को अपेक्षित श्रेय नहीं मिला। उनके लिए यह प्रश्न महज सांस्कृतिक आदान-प्रदान का नहीं, बल्कि पहचान, स्वामित्व और सम्मान का भी है।
भारतीय वस्त्रों की वैश्विक पहचान को भी उन्होंने इसी संदर्भ से जोड़ा। उनके अनुसार, जिस भारतीय टेक्सटाइल परंपरा की कभी दुनिया भर में प्रतिष्ठा थी, उससे जुड़े ऐतिहासिक योगदान को भी व्यापक संदर्भ में समझे जाने की आवश्यकता है। उनका सवाल यही है कि भारतीय विरासत से लाभ लेने वाली दुनिया उस विरासत के मूल देश और समाज को उसका उचित सम्मान और श्रेय क्यों न दे।
जेमा ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और महात्मा गांधी की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि लंबे समय तक चले शोषण के बावजूद भारत ने अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई में व्यापक हिंसा को आधार नहीं बनाया। महात्मा गांधी जैसे नेताओं के नेतृत्व में अहिंसा को आंदोलन की शक्ति बनाया गया। उनके अनुसार, भारत ने दुनिया के सामने यह उदाहरण रखा कि बिना हथियार उठाए और व्यापक रक्तपात के भी एक बड़ी औपनिवेशिक ताकत को चुनौती दी जा सकती है। उनके लिए यह भारत की सभ्यतागत शक्ति का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
भारत यात्रा के अपने अनुभव को लेकर जेमा ने कहा कि किसी देश को दूर बैठकर समझना और उसके बीच जाकर उसे महसूस करना दो बिल्कुल अलग अनुभव हैं। भारतीय सभ्यता, संस्कृति और इतिहास से प्रभावित होकर उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अफसोस है कि भारत को समझने में उन्हें इतनी देर लगी। अब वह अपनी कला के माध्यम से दुनिया को भारत की उन कहानियों से परिचित कराना चाहती हैं, जिन्हें वह स्वयं इस यात्रा के दौरान नए सिरे से समझ पाई हैं।
वस्तुत: जेमा फेरर के कथनों का व्यापक अर्थ यही है कि भारत की पहचान को उसकी गरीबी या पिछड़ेपन की सीमित छवियों में नहीं बांधा जा सकता। उसकी सभ्यता, ज्ञान, कला, उद्योग, वस्त्र परंपरा और जीवन-दर्शन उसकी वैश्विक पहचान के अभिन्न हिस्से हैं। उनके शब्दों में व्यक्त दृष्टिकोण आज भले ही एक विदेशी कलाकार के अनुभव के रूप में सामने आया हो, मगर इसके पीछे भारत के औपनिवेशिक अतीत और आर्थिक शोषण से जुड़ा एक लंबा ऐतिहासिक विमर्श मौजूद है।
इसीलिए जेमा फेरर का यह कथन, “भारत कभी गरीब नहीं था, बल्कि उसे जानबूझकर गरीब बनाया गया”, आज फिर एक बार भारत के उस इतिहास की ओर संकेत करता है, जिसमें एक समृद्ध पारंपरिक अर्थव्यवस्था, व्यापक हस्तशिल्प और वैश्विक व्यापारिक पहचान रखने वाले समाज ने औपनिवेशिक शासन के दौर में गहरे आर्थिक परिवर्तन और शोषण का सामना किया।
पश्चिमी दुष्प्रचार और ऐतिहासिक भ्रम का पर्दाफाश
लंबे समय तक पश्चिमी इतिहासकारों और औपनिवेशिक विचारकों ने यह विमर्श स्थापित करने का प्रयास किया कि ब्रिटिश राज भारत के लिए एक ‘वरदान’ की तरह था। उनका तर्क था कि अंग्रेजों ने भारत को रेलवे दी, आधुनिक न्याय प्रणाली दी, अंग्रेजी भाषा दी और एक असभ्य समाज को सभ्य बनाने का काम किया। इस विमर्श को ‘व्हाइट मैन्स बर्डन’ (श्वेत मानस का बोझ) के सिद्धांत के तहत सही ठहराया गया, किंतु जब जेमा फेरर जैसे आधुनिक विचारकों और वैश्विक इतिहासकारों ने जब भारत की कला, शिल्प और स्थापत्य का निष्पक्ष अध्ययन किया, तो उन्हें समझ आया कि जो देश इतनी सूक्ष्म और समृद्ध कलाओं को जन्म दे सकता है, वह वैचारिक या आर्थिक रूप से कभी दरिद्र नहीं हो सकता। वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत थी।
भारत के विशद् अध्ययन से यह भी ध्यान आता है कि भारत अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक विरासत के कारण हमेशा से आत्मनिर्भर और अत्यंत समृद्ध था। यहाँ की गरीबी कोई प्राकृतिक आपदा या भारतीयों की अकर्मण्यता का परिणाम नहीं थी, बल्कि यह ब्रिटिश साम्राज्य की सोची-समझी आर्थिक नीतियों और लूट का नतीजा थी।
वैश्विक जीडीपी में भारत का दबदबा
यदि हम जेमा फेरर के इस कथन को शोध की कसौटी पर कसें, तो हमें प्रसिद्ध आर्थिक इतिहासकार प्रोफेसर एंगस मैडिसन के आंकड़ों को देखना होगा। मैडिसन ने ‘ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट’ (ओईसीडी) के लिए किए गए अपने व्यापक शोध में साबित किया कि ईसा मसीह के जन्म (1 एडी) से लेकर साल 1700 तक, यानी लगभग सत्रह सदियों तक, दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था (वैश्विक जीडीपी) में अकेले भारत की हिस्सेदारी 25 फीसद से 33 प्रतिशत के बीच हुआ करती थी।
![]()
इसका सीधा मतलब यह है कि उस दौर में दुनिया का हर तीसरा या चौथा रुपया भारत में बनता था। भारत कृषि प्रधान देश होने के साथ ही विश्व का सबसे बड़ा औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र था। भारत के सूती वस्त्र, रेशम, मसाले, जहाज निर्माण उद्योग और हस्तशिल्प की मांग पूरे यूरोप, मध्य पूर्व और एशिया में थी। जब ब्रिटेन के लोग बुनियादी नागरिक जीवन शैली सीख रहे थे, तब भारत के ढाका, मलमल और सूरत के व्यापारी वैश्विक व्यापार को नियंत्रित करते थे।
ईस्ट इंडिया कंपनी: सभ्यता का प्रसारक नहीं, एक लुटेरा कॉर्पोरेशन
ब्रिटिश इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल ने अपनी पुस्तक ‘द अनार्की’ में बहुत स्पष्ट रूप से लिखा है कि ईस्ट इंडिया कंपनी कोई ऐसी संस्था नहीं थी जो भारत में सभ्यता या लोकतंत्र का प्रसार करने आई थी। यह दुनिया के इतिहास का सबसे क्रूर और लालची कॉर्पोरेट घराना था, जिसका एकमात्र उद्देश्य था, मुनाफा कमाना और संसाधनों को सोखना। 1757 में प्लासी के युद्ध और 1764 में बक्सर के युद्ध के बाद जब अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और ओडिशा की ‘दीवानी’ (टैक्स वसूलने का अधिकार) मिली, तो उन्होंने भारत के आर्थिक शोषण का एक नया अध्याय शुरू किया। अंग्रेजों ने भारत के पारंपरिक व्यापारियों और कारीगरों को पूरी तरह से तबाह कर दिया। बंगाल, जोकि कभी दुनिया का सबसे अमीर प्रांत माना जाता था, उसे चंद दशकों के भीतर ही ईस्ट इंडिया कंपनी ने कंगाल बना दिया।
धन का निष्कासन सिद्धांत (ड्रेन ऑफ वेल्थ): कैसे खोखली हुई सोने की चिड़िया
भारत को गरीब बनाने की इस प्रक्रिया को सबसे पहले भारत के ‘ग्रैंड ओल्ड मैन’ दादाभाई नौरोजी ने 1901 में अपनी पुस्तक ‘पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ में ‘ड्रेन ऑफ वेल्थ’ (धन के निष्कासन का सिद्धांत) के नाम से दुनिया के सामने रखा था। नौरोजी ने गणितीय आंकड़ों से यह दिखाया कि कैसे भारत का पैसा एकतरफा बहकर ब्रिटेन जा रहा था, जिसके बदले में भारत को कुछ भी हासिल नहीं हो रहा था।
इस धन के निष्कासन के कई माध्यम थे। भारतीय करदाताओं के पैसे से ब्रिटिश अधिकारियों को भारी-भरकम वेतन और पेंशन दी जाती थी। ब्रिटेन द्वारा दुनिया भर में लड़े जाने वाले युद्धों का खर्च भी भारतीय राजस्व से ही निकाला जाता था। यहाँ तक कि भारत से कच्चा माल औने-पौने दामों पर खरीदा जाता था और उसे ब्रिटेन भेजकर वहाँ के कारखानों में तैयार माल वापस भारत में ऊंचे दामों पर बेचा जाता था। इस तरह भारत को एक विनिर्माता देश (मैन्युफैक्चरिंग हब) से बदलकर महज एक उपभोक्ता और कच्चे माल का सप्लायर बना दिया गया।
45 ट्रिलियन डॉलर की ऐतिहासिक लूट
जेमा फेरर ने जिस सच की ओर इशारा किया है, उसकी पुष्टि आधुनिक काल में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर उत्सा पटनायक के शोध से होती है। पटनायक ने लगभग दो सदियों के टैक्स और व्यापारिक आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि 1765 से लेकर 1938 के बीच ब्रिटेन ने भारत से लगभग 45 ट्रिलियन डॉलर (आज के हिसाब से लगभग 3,000 लाख करोड़ रुपये से अधिक) की संपत्ति लूटी। यह राशि इतनी बड़ी है कि आज के यूनाइटेड किंगडम (यूके) की कुल सालाना अर्थव्यवस्था से भी कई गुना अधिक है।
वस्तुत: इस शोध का समर्थन करने वाले ब्रिटिश-आर्थिक मानवविज्ञानी जेसन हिकेल ने साफ लिखा है कि पश्चिमी देशों में जो औद्योगिक क्रांति हुई और आज यूरोप में जो भव्य इमारतें, बैंक और आधुनिक बुनियादी ढांचा दिखाई देता है, उसकी नींव भारत जैसी औपनिवेशिक अर्थव्यवस्थाओं के खून और पसीने से सींची गई थी। ब्रिटेन अमीर इसलिए बना है, क्योंकि वह तकनीक से अधिक भारत को बेरहमी लूटने में आगे रहा।
भारतीय उद्योगों का व्यवस्थित विनाश (डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन)
आर.सी. दत्त ने अपनी पुस्तक ‘द इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में विस्तार से बताया है कि अंग्रेजों ने किस प्रकार भारतीय वस्त्र उद्योग को नष्ट किया। एक समय था जब भारतीय सूती कपड़ा पूरी दुनिया पर राज करता था। ब्रिटेन के कारखानों को बढ़ावा देने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारतीय कपड़ों पर 70 से 80 प्रतिशत तक का आयात शुल्क (इम्पोर्ट ड्यूटी) लगा दिया, जबकि ब्रिटेन से भारत आने वाले कपड़ों पर टैक्स लगभग शून्य कर दिया गया।
ऐसे में स्वभाविक है इसके कारण भारत के लाखों बुनकर, कतकार और कारीगर बेरोजगार हो गए। जो शहर कभी व्यापार के केंद्र हुआ करते थे, वे वीरान हो गए। भारत की आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया गया। लोगों के पास खेती के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा, जिससे जमीन पर दबाव बढ़ा और देश में बड़े पैमाने पर गरीबी फैल गई।

मानव-निर्मित अकाल और क्रूर नीतियां
भारत को गरीब बनाने की प्रक्रिया आर्थिक नुकसान के साथ ही उन लाखों भारतीयों की जान की कीमत पर की गई थी, जिन्हें बिना कारण के अपनी जान गंवाना पड़ी, तत्कालीन समय में लाखों परिवार अस्त-व्यस्त हुए। अमेरिकी इतिहासकार माइक डेविस ने अपनी पुस्तक ‘लेट विक्टोरियन होलोकॉस्ट्स’ में उन अकालों का वर्णन किया है जोकि ब्रिटिश काल में भारत में पड़े थे। 1770 के बंगाल के अकाल से लेकर 1943 के कुख्यात बंगाल अकाल तक, करोड़ों भारतीय भूख से तड़प-तड़प कर मर गए।
जनम मुखर्जी ने अपनी पुस्तक ‘हंग्री बंगाल’ में प्रमाणित किया है कि 1943 का अकाल कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की सोची-समझी क्रूर नीति का परिणाम थी। जब बंगाल में लोग भूख से दम तोड़ रहे थे, तब भारत के अनाज भंडार को यूरोप में लड़ रहे ब्रिटिश सैनिकों के लिए आरक्षित कर दिया गया था और गोदामों में अनाज सड़ रहा था। जब चर्चिल को इस स्थिति के बारे में बताया गया, तो उनका क्रूर जवाब था, “यदि अनाज की कमी है, तो महात्मा गांधी अभी तक मरे क्यों नहीं?” यह क्रूरता दर्शाती है कि औपनिवेशिक शासकों के लिए भारतीय जीवन का कोई मूल्य नहीं था, उनका एकमात्र लक्ष्य भारत का आर्थिक दोहन था।
इसी प्रकार कुछ विद्वानों का निष्कर्ष है कि जब अंग्रेज भारत आए थे, तब दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत का हिस्सा 23 फीसद से अधिक था, लेकिन जब 1947 में वे भारत छोड़कर गए, तो उन्होंने भारत को सिर्फ 3 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ एक अत्यंत गरीब और अशिक्षित राष्ट्र बनाकर छोड़ दिया। अंग्रेजों ने भारत के शिक्षा तंत्र को भी नष्ट किया। औपनिवेशिक काल से पहले भारत में स्वदेशी पाठशालाओं का एक मजबूत जाल था, लेकिन अंग्रेजों के जाने तक भारत की साक्षरता दर गिरकर महज 16 फीसद रह गई थी।
जेमा फेरर के बयान का वैश्विक निहितार्थ
कुल मिलाकर यदि न्यूयॉर्क की कलाकार जेमा फेरर के विचारों को निष्कर्ष के रूप में कहना पड़े तो इस संदर्भ में यही कहा जाएगा कि ज्यादातर इतिहास की किताबों में पश्चिमी इतिहासकारों ने भले ही अपनी लूट को ‘सभ्यता के विकास’ के आवरण में लपेट कर पेश किया हो, किंतु सच को लम्बे समय तक दबाया नहीं जा सकता और न ही छुपाया जा सकता है। आज की जागरूक और स्वतंत्र दुनिया इस सच को पहचान रही है। भारत कभी स्वाभाविक रूप से गरीब नहीं था, उसकी गरीबी औपनिवेशिक शोषण, क्रूर कर नीतियों, उद्योगों के विनाश और संसाधनों की खुली लूट का परिणाम थी।
अच्छा है, आज जब भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और तेजी से तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, तब जेमा फेरर जैसे विदेशी नागरिकों के मुंह से यह सच निकलना इस बात का प्रतीक है कि दुनिया अब भारत के वास्तविक इतिहास और उसकी सामर्थ्य को स्वीकार कर रही है। वस्तुत: सच यही है कि भारत का अतीत स्वर्णिम था, उसका वर्तमान संघर्षपूर्ण रहा, किंतु उसका भविष्य एक बार फिर अपनी उसी खोई हुई समृद्धि को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आज का भारत वैश्विक पटल पर पुनः अपनी पहचान स्थापित कर रहा है।
– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

