वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कूटनीति के मायने तेजी से बदल रहे हैं। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे लंबे संघर्ष ने पूरी दुनिया को एक अभूतपूर्व संकट में डाल दिया है। इस युद्ध की शुरुआत में भारत ने एक तटस्थ दृष्टिकोण अपनाया था और सभी पक्षों से बातचीत के माध्यम से शांति स्थापित करने की अपील की थी। लेकिन जैसे जैसे यह युद्ध खिंचता गया भारत की कूटनीतिक रणनीति में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। आज भारत केवल युद्धविराम की औपचारिक अपील तक सीमित नहीं है बल्कि वह इस संघर्ष से उपजी ठोस और व्यावहारिक समस्याओं के समाधान के लिए एक सक्रिय मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। यह बदलाव विश्व पटल पर भारत की उस छवि को मजबूत कर रहा है जो उसे एक जिम्मेदार और प्रभावी वैश्विक शांति निर्माता के रूप में स्थापित करती है।
वर्ष 1947 में अपनी स्वतंत्रता के बाद से ही भारत ने अंतरराष्ट्रीय विवादों से खुद को दूर रखने की नीति का पालन किया था ताकि वह अपने आंतरिक विकास पर ध्यान दे सके। लेकिन 21वीं सदी का भारत एक अत्यंत शक्तिशाली और आत्मविश्वास से भरा राष्ट्र है। आज की बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में कोई भी बड़ी घटना भारत को अछूता नहीं छोड़ सकती है। इसलिए भारत ने अपनी पुरानी संकोचशील नीति को त्याग कर एक सक्रिय और मुखर विदेश नीति अपनाई है। रूस और यूक्रेन के संदर्भ में यह मुखरता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। विश्व अब यह मान चुका है कि भारत केवल मूक दर्शक बनकर नहीं बैठ सकता है।
किसी भी युद्ध में केवल हथियार डाल देने की अपील करना सबसे आसान काम होता है लेकिन जमीन पर मौजूद जटिलताओं को सुलझाना असली कूटनीति है। भारत ने यह गहराई से समझ लिया है कि रातों रात कोई स्थायी शांति समझौता नहीं हो सकता है। इसलिए उसने अपना ध्यान उन मुद्दों पर केंद्रित किया है जिनका सीधा असर पूरी मानवता और विशेषकर गरीब देशों पर पड़ रहा है। इस युद्ध ने दुनिया भर में खाद्यान्न संकट और ऊर्जा की कमी को जन्म दिया है। ऐसे में भारत ने अपनी कूटनीतिक ऊर्जा को उन क्षेत्रों में लगाया है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को पतन से बचा सकते हैं।
इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम काला सागर में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने का प्रयास है। काला सागर दुनिया भर में गेहूं, सूरजमुखी के तेल और उर्वरकों की आपूर्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। युद्ध के कारण इस मार्ग से होने वाला व्यापार बुरी तरह बाधित हुआ है जिससे कई देशों में भुखमरी और महंगाई का संकट खड़ा हो गया। भारत ने रूस और यूक्रेन दोनों के साथ अपनी बातचीत में इस बात पर विशेष जोर दिया है कि खाद्यान्न और उर्वरक ले जाने वाले जहाजों को युद्ध का निशाना ना बनाया जाए। भारत का यह हस्तक्षेप किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर इस बात पर जोर दिया है कि अनाज की आपूर्ति को राजनीति या युद्ध का हथियार नहीं बनाया जा सकता है। जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए बनाए गए समुद्री मार्गों के समर्थन में भारत की आवाज ने एक बड़ा कूटनीतिक दबाव बनाया है।

खाद्य सुरक्षा के साथ ही ऊर्जा कूटनीति इस संघर्ष का एक अन्य अत्यंत संवेदनशील पहलू है। युद्ध क्षेत्रों में स्थित परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की सुरक्षा को लेकर पूरी दुनिया में गहरी चिंता व्याप्त है। किसी भी दुर्घटना की स्थिति में इसका परिणाम आने वाली कई पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा नियमों का हवाला देते हुए दोनों देशों के नेतृत्व को इन संयंत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राजी करने का निरंतर प्रयास किया है। इसके अतिरिक्त ऊर्जा संसाधनों के निर्बाध प्रवाह को बनाए रखने के लिए भी भारत की बातचीत बेहद महत्वपूर्ण रही है। यह सुनिश्चित करना कि युद्ध के कारण दुनिया के अन्य देश अंधकार या भीषण सर्दी का शिकार ना हों यह भारत की परिपक्व कूटनीति का बेहतरीन प्रमाण है।
भारत की इस सक्रिय भूमिका का एक बड़ा कारण विकासशील और गरीब देशों के हितों की रक्षा करना भी है। इस युद्ध का सबसे विनाशकारी आर्थिक परिणाम पश्चिमी देशों ने नहीं बल्कि एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका के उन देशों ने उठाया है जो पहले से ही बड़ी आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे थे। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से यह बात रखी है कि यूरोप की समस्या को पूरी दुनिया की समस्या नहीं माना जाना चाहिए लेकिन इस युद्ध के आर्थिक परिणामों से कोई भी देश अछूता नहीं रह सकता है। विकासशील देशों की आवाज बनकर भारत ने खुद को एक स्वाभाविक वैश्विक नेता के रूप में स्थापित किया है। जब भारत काला सागर की सुरक्षा या उर्वरकों की आपूर्ति की बात करता है तो वह केवल अपने लिए नहीं बल्कि उन तमाम देशों के लिए बोल रहा होता है जिनकी आवाज वैश्विक मंचों पर अक्सर अनसुनी कर दी जाती है।
हाल के महीनों में भारतीय नेतृत्व द्वारा किए गए उच्च स्तरीय संवाद इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि भारत शांति की प्रक्रिया में कितना गहराई से निवेश कर रहा है। दोनों देशों के उच्च नेतृत्व के साथ सीधे संपर्क में रहकर भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न ना हो। जब युद्ध के मैदान में हथियार चल रहे होते हैं तब कूटनीतिक वार्ता के दरवाजे खुले रखना एक अत्यंत कठिन कार्य होता है। भारत ने अपनी कूटनीतिक कुशलता से इस दरवाजे को बंद नहीं होने दिया है। यह इस बात को भी दर्शाता है कि भारत की विदेश नीति कितनी स्वतंत्र और लचीली है।
भारत की इस मध्यस्थता की सफलता का सबसे बड़ा कारण उसका दोनों पक्षों के बीच समान रूप से विश्वसनीय होना है। वर्तमान में बहुत कम देश ऐसे हैं जो रूस और यूक्रेन दोनों के साथ बिना किसी पूर्वाग्रह के बातचीत कर सकते हैं। रूस के साथ भारत के ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध बहुत गहरे हैं इसलिए रूसी नेतृत्व भारत की चिंताओं को बहुत गंभीरता से लेता है। दूसरी ओर भारत ने क्षेत्रीय अखंडता और देशों की संप्रभुता के सम्मान पर निरंतर जोर देकर यूक्रेन तथा अन्य पश्चिमी देशों का भी पूरा विश्वास हासिल किया है। भारत की यह निष्पक्षता उसे अन्य देशों के उन प्रयासों से अलग करती है जिन्हें अक्सर संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
भारत की यह यात्रा उसकी विदेश नीति के एक नए युग का प्रतीक है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत किसी सैन्य गुट का हिस्सा बन रहा है बल्कि इसका अर्थ यह है कि भारत हर उस देश के साथ खड़ा है जो शांति, विकास और मानवता के पक्ष में है। भारतीय संस्कृति का मूल विचार जो पूरी पृथ्वी को एक परिवार मानता है उसने इस कूटनीति को एक गहरा दार्शनिक आधार प्रदान किया है।
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अंततः यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे इस टकराव में भारत की भूमिका एक मूक दर्शक या केवल उपदेश देने वाले देश की बिल्कुल नहीं रह गई है। ठोस आर्थिक और मानवीय मुद्दों पर बातचीत करके, सुरक्षित व्यापारिक मार्ग सुनिश्चित करवाकर और परमाणु सुरक्षा जैसे अत्यंत गंभीर विषयों पर हस्तक्षेप करके भारत ने विश्व को यह दिखा दिया है कि वह सबसे जटिल भू राजनीतिक समस्याओं का भी व्यावहारिक समाधान देने की असीम क्षमता रखता है। यही वह अद्वितीय कूटनीतिक कौशल है जो आने वाले समय में वैश्विक व्यवस्था में भारत के कद को और अधिक ऊंचा करेगा और उसे सही मायनों में विश्व में शांति स्थापित करने वाले एक प्रमुख और जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में हमेशा के लिए मान्यता दिलाएगा।
– महेन्द्र तिवारी
