देशभर में गहराता जल संकट हमें चेतावनी दे रहा है कि पानी को असीमित संसाधन मानने की भूल अब भारी पड़ सकती है। आज खेतों में खड़ी फसल, किसान की मेहनत, ग्रामीण परिवार की आजीविका और राज्य की आर्थिक स्थिरता एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
भारत की सभ्यता और संस्कृति में जल को जीवन का आधार माना गया है। नदियों, तालाबों, कुओं और झरनों के किनारे विकसित हुई हमारी सभ्यता ने सदियों तक प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीने की कला सिखाई। लेकिन आज विकास की अंधी दौड़, प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन और बदलते मौसम के बीच वही जल हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। महाराष्ट्र सहित देश के अनेक राज्यों में वर्षा की अनियमितता और कम बारिश ने जल संकट को गम्भीर रूप दे दिया है। महाराष्ट्र की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, जहां खेती, पशुपालन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और शहरी जलापूर्ति पर इस संकट का सीधा प्रभाव दिखाई देने लगा है।
वर्ष 2026 का मानसून इस संकट की गम्भीरता को सामने लाया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, महाराष्ट्र में मानसूनी वर्षा सामान्य से लगभग 18 प्रतिशत कम रही। मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में स्थिति अधिक चिंताजनक रही है। अक्टूबर 2026 में राज्य के 305 तालुकाओं में सूखे की स्थिति घोषित किए जाने का समाचार सामने आया है। यह आंकड़ा केवल मौसम की प्रतिकूलता नहीं दर्शाता, बल्कि उस कृषि व्यवस्था की कमजोरी भी उजागर करता है, जो आज भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर है।
मानसून की अनिश्चितता और संकट के कारण
भारत में मानसून केवल वर्षा का मौसम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। किसान कब बुवाई करेगा, कौन-सी फसल लेगा और कितनी पैदावार होगी, इसका बड़ा हिस्सा वर्षा की मात्रा, समय और वितरण पर निर्भर करता है। समस्या केवल कम बारिश की नहीं है। कई क्षेत्रों में बारिश कुछ दिनों में अत्यधिक होती है, जबकि उसके बाद लम्बे समय तक सूखा पड़ जाता है। कहीं बाढ़ आती है, तो कहीं खेतों की मिट्टी में पर्याप्त नमी तक नहीं बचती।
जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि, वाष्पीकरण में तेजी और वर्षा के स्वरूप में बदलाव जैसी चुनौतियां बढ़ रही हैं। अल नीनो जैसी वैश्विक समुद्री-जलवायु परिस्थितियां भी मानसून को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि हर वर्ष कम बारिश के लिए केवल जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियां, पहाड़ों पर उत्खनन, वनों की कटाई, मिट्टी का क्षरण, जलग्रहण क्षेत्रों का विनाश और जल प्रबंधन की कमियां तथा पहाड़ों को काटकर बड़े पैमाने पर किए जा रहे बिल्डिंगों का निर्माण भी संकट को गहरा करती हैं।
इसके साथ ही भूजल का अनियंत्रित दोहन, पारम्परिक जलस्रोतों की उपेक्षा और पानी की अधिक खपत वाली फसलों का उन क्षेत्रों में विस्तार, जहां जल उपलब्धता सीमित है, समस्या को और गम्भीर बनाते हैं। महाराष्ट्र में गन्ने जैसी अधिक पानी की आवश्यकता वाली फसल का उत्पादन और सिंचाई के लिए भूजल पर बढ़ती निर्भरता जल नियोजन पर नए सिरे से विचार करने की मांग करती है।
खेती पर पड़ेगा सीधा और व्यापक प्रभाव
जल संकट का सबसे पहला और गम्भीर प्रहार कृषि क्षेत्र पर पड़ता है। पर्याप्त नमी न मिलने से बीजों का अंकुरण प्रभावित होता है। पौधों की वृद्धि रुकती है, फूल और फलियां कम बनती हैं तथा अनाज और तिलहन की पैदावार घट जाती है। सोयाबीन, कपास, अरहर, ज्वार और अन्य फसलों की उत्पादकता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ सहित देश के कई ऐसे भाग हैं जहां वर्षा-निर्भर क्षेत्रों में किसानों के सामने खरीफ की फसल बचाने के साथ-साथ रबी की बुवाई का भी संकट है। खेतों में नमी कम होने और जलाशयों का भंडार घटने से चना, ज्वार और अन्य रबी फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। यदि किसान समय पर बुवाई नहीं कर पाता, तो उत्पादन में गिरावट के साथ फसल की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।
बागवानी और नकदी फसलों के लिए संकट और भी महंगा साबित हो सकता है। फलदार पेड़ों को लम्बे समय तक पर्याप्त पानी नहीं मिलने से फल छोटे रह सकते हैं, उत्पादन घट सकता है और अगले मौसम की पैदावार पर भी असर पड़ सकता है। सब्जियों का उत्पादन कम होने से बाजार में आवक घटेगी और कीमतें बढ़ने की आशंका रहेगी। इस प्रकार जल संकट खेत से निकलकर आम उपभोक्ता की रसोई तक पहुंच सकता है।
किसान पर दोहरी मार: लागत बढ़ेगी, आमदनी घटेगी
किसान के लिए सूखा केवल फसल का नुकसान नहीं है, बल्कि आर्थिक असुरक्षा का एक लम्बा दौर है। बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और कृषउपकरणों पर खर्च करने के बाद यदि बारिश साथ नहीं देती, तो किसान की पूरी पूंजी संकट में पड़ जाती है। सिंचाई के लिए उसे अधिक गहराई तक बोरवेल खुदवाना पड़ सकता है, बिजली और डीजल पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है तथा पानी खरीदने के लिए भी मजबूर होना पड़ सकता है।
दूसरी ओर, उत्पादन घटने पर उसकी आय कम हो जाती है। कर्ज की किस्तें, बच्चों की शिक्षा, परिवार का भरण-पोषण और अगली फसल की तैयारी जैसे खर्च सामने खड़े रहते हैं। ऐसी स्थिति में किसान को साहूकारों या अन्य स्रोतों से कर्ज लेना पड़ सकता है। कर्ज का बढ़ता बोझ ग्रामीण परिवारों की आर्थिक और मानसिक परेशानियों को बढ़ाता है।
राज्य की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर
फसल कम होने से कृषि आधारित उद्योगों को कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ सकता है। ग्रामीण परिवारों की क्रयशक्ति घटने से बाजार में मांग कमजोर हो सकती है। इससे छोटे दुकानदारों, स्थानीय कारोबारियों और सेवा क्षेत्र की आय प्रभावित होती है।
दूसरी ओर, सरकार पर राहत और पुनर्वास का आर्थिक बोझ बढ़ता है। प्रभावित किसानों को मुआवजा, पेयजल के लिए टैंकर, पशुओं के लिए चारा, रोजगार के अवसर और अन्य सहायता उपलब्ध कराने के लिए अतिरिक्त धन की आवश्यकता होती है। जलाशयों में पानी कम होने पर शहरी जलापूर्ति, उद्योगों और बिजली उत्पादन की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना भी कठिन हो सकता है। पुणे जैसे शहरों में जलापूर्ति में कटौती की नौबत इस चुनौती की व्यापकता को दर्शाती है।
लवकुश तिवारी

