देश के महानगरों में गहराता जल संकट हमें पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करता है कि जिस शहर में पानी की कमी हो जाती है, वहां केवल नल नहीं सूखते, वहां विकास के दावे, प्रशासन की प्राथमिकताएं और भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारियां भी सवालों के घेरे में आ जाती हैं।
भारत वह देश है, जहां प्राणदायिनी नदियों को माना जाता है, जहां जल को देवतुल्य मानकर उसकी पूजा की गई, जहां कुएं, बावड़ियां, तालाब और सरोवर कभी सामुदायिक जीवन के केंद्र हुआ करते थे, उसी देश के महानगरों में आज लोग बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह केवल प्रकृति की विडम्बना नहीं, बल्कि हमारी विकास सम्बंधी सोच, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और सामूहिक जिम्मेदारी पर उठता एक गम्भीर प्रश्न है। आज गगनचुम्बी भवनों से सने हुए शहरों में पानी के लिए संघर्ष सरेआम देखा जा सकता है, लोगों की हत्याओं का नग्न नाच शहरों में पानी के कारण हो रहा है।
आज भारत के महानगरों की पहचान ऊंचे भवनों, चौड़ी सड़कों, चमचमाते बाजारों, मेट्रो रेल और आधुनिक जीवनशैली से की जाती है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक ऐसा यथार्थ भी है, जिसे विकास के विज्ञापनों में जगह नहीं मिलती। वह यथार्थ है पानी के लिए भटकता नागरिक, टैंकर की प्रतीक्षा करती बस्तियां, सूखते भूजल स्रोत और गर्मियों में खाली होती जल टंकियां। सवाल यह है कि क्या हमने विकास के भवनोें को खड़े करते समय उस पानी की चिंता की, जिसके बिना उन भवनों में जीवन सम्भव ही नहीं है?
शहर अपने आयतन का विस्तार कर रहे हैं, हर दिशा में फैल रहे हैं, लेकिन क्या उनके संसाधनों को भी उसी अनुपात में बढ़ाया जा रहा है? हमने नई कॉलोनियां बसाईं, लेकिन क्या वहां रहने वाले लोगों के लिए पर्याप्त जलापूर्ति सुनिश्चित की? हमने सीमेंट-कंक्रीट के जंगल खड़े किए, लेकिन क्या वर्षा के पानी को जमीन के भीतर पहुंचने के रास्ते खुले रखे? हमने प्राकृतिक तालाबों और जलधाराओं के आसपास निर्माण को विकास समझ लिया, लेकिन क्या कभी यह सोचा कि इन जलस्रोतों के नष्ट होने की क़ीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी?
ये प्रश्न किसी एक सरकार, शहर या विभाग तक सीमित नहीं हैं। ये उस सोच से जुड़े हैं, जिसमें निर्माण को विकास और उपभोग को समृद्धि मान लिया गया है, जबकि संरक्षण को अक्सर बाद की प्राथमिकता समझा जाता है।
किसी महानगर की प्रगति का आंकलन उसकी गगनचुम्बी भवनों से नहीं, बल्कि वहां रहने वाले सामान्य नागरिक के जीवन की सहजता से होना चाहिए। यदि किसी शहर में विश्वस्तरीय कार्यालय हैं, लेकिन उसके नागरिकों को पीने का पानी खरीदना पड़ता है, यदि वहां आलीशान आवासीय परिसर हैं, लेकिन
आसपास की बस्तियों में सार्वजनिक नलों पर भीड़ लगी रहती है, तो यह विकास की सफलता नहीं, उसकी असमानता का प्रमाण है।
महानगरों में पानी की कमी के अनेक कारण हैं। बढ़ती जनसंख्या, अनियोजित शहरीकरण, भूजल का अत्यधिक दोहन, जलस्रोतों का अतिक्रमण, प्रदूषण, पुरानी पाइपलाइनें और वितरण व्यवस्था की कमजोरियां इनमें प्रमुख हैं। जलवायु परिवर्तन तथा वर्षा के बदलते स्वरूप ने कई क्षेत्रों की चुनौतियों को और जटिल बनाया है। वर्षा का कम होना हमारे नियंत्रण में नहीं है, लेकिन वर्षा के पानी को सहेजना तो हमारे हाथ में है। भूजल का प्राकृतिक पुनर्भरण एक प्रक्रिया है, लेकिन उसके मुकाबले अधिक पानी निकालने से बचना तो हमारे निर्णय पर निर्भर है। नदी का प्रवाह प्राकृतिक परिस्थितियों से प्रभावित हो सकता है, लेकिन उसमें सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट छोड़ना तो हमारी व्यवस्था की विफलता है। इसलिए जल संकट का सबसे असहज सच यह है कि कई बार पानी की कमी से पहले हमारी दूरदर्शिता की कमी सामने आती है।
जिस शहर में मानसून के दौरान जलभराव होता है, वहां कुछ महीनों बाद पानी की किल्लत क्यों दिखाई देती है? जिस महानगर में हर दिन हजारों लीटर पानी पाइपलाइनों के रिसाव से नष्ट होता है, वहां नागरिकों को बचत का उपदेश देने से पहले व्यवस्था में सुधार क्यों नहीं किया जाता? जिस शहर के आसपास तालाब और झीलें मौजूद हैं, वहां उनके संरक्षण को शहरी नियोजन का अनिवार्य हिस्सा क्यों नहीं बनाया जाता? इन सवालों के उत्तर केवल तकनीकी रिपोर्टों में नहीं, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और राजनीतिक इच्छाशक्ति में भी खोजने होंगे।
महानगरों की बढ़ती जनसंख्या को अधिकतर जल संकट का प्रमुख कारण बताया जाता है। निस्संदेह, जनसंख्या बढ़ने से पानी की मांग बढ़ती है, लेकिन जनसंख्या वृद्धि अपने आप में पूरी समस्या नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या शहर अपनी सम्भावित जनसंख्या और संसाधनों की आवश्यकता का आंकलन करके विकसित हो रहे हैं? यदि किसी क्षेत्र में हजारों नए मकान बनाए जाते हैं, तो उनके लिए सड़क, बिजली और परिवहन की व्यवस्था के साथ पानी की उपलब्धता भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
यदि किसी शहर में उद्योग स्थापित किए जाते हैं, तो यह भी तय होना चाहिए कि उनकी जल आवश्यकता किस स्रोत से पूरी होगी और स्थानीय नागरिकों के हिस्से का पानी सुरक्षित कैसे रहेगा। जब शहर का विस्तार नियोजन से आगे निकल जाता है, तब संकट जन्म लेता है। पहले पानी की आपूर्ति अनियमित होती है, फिर निजी बोरवेल बढ़ते हैं, भूजल नीचे जाता है, टैंकरों की मांग बढ़ती है और अंततः पानी एक सामान्य नागरिक सुविधा के बजाय महंगी वस्तु बन जाता है। आज के महानगर इन्हीं सब समस्याओं से दो-चार हो रहे हैं किंतु शहरों की सरकारों के खराब मैनेजमेंट और दूरदृष्टि के अभाव में शहर के रहवासी जल विहीन शहर में रह रहे हैं।
भारत की पारम्परिक जल व्यवस्था कभी केवल प्रकृति पर निर्भर नहीं थी। हमारे पूर्वजों ने स्थानीय भूगोल, वर्षा और जल प्रवाह को समझकर तालाब, कुएं, बावड़ियां तथा छोटे जलाशय बनाए। इनका उद्देश्य केवल पानी जमा करना नहीं, बल्कि समुदाय की आवश्यकताओं को लम्बे समय तक सुरक्षित रखना भी था। आज आधुनिक तकनीक और इंजीनियरिंग के युग में हमारे पास जल प्रबंधन के पहले से अधिक साधन हैं। फिर भी अनेक शहर अपने पारम्परिक जलस्रोतों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। तालाबों के आसपास अतिक्रमण, झीलों में प्रदूषण, प्राकृतिक नालों का अवरोध और वर्षाजल के जमीन में समाने वाले क्षेत्रों पर निर्माण हमारी जल सुरक्षा को कमजोर करते हैं।
डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
