कभी किसी लंबी बैठक में, कभी किताब पढ़ते हुए और कभी सुबह उठते ही हमारा मुँह अनायास खुल जाता है, एक गहरी साँस भीतर जाती है और फिर धीरे-धीरे बाहर निकलती है। हमारे शरीर की एक परिचित लेकिन अब भी पूरी तरह न समझी गई क्रिया जम्हाई ही है। यह नींद, थकान और ऊब के साथ अक्सर दिखाई देती है, पर यह केवल नींद आने की सूचना नहीं है। वैज्ञानिक इसके कई संभावित कार्यों पर शोध कर रहे हैं किंतु अभी कोई भी व्याख्या सर्वमान्य नहीं है।
गर्भ में विकसित होते शिशु में भी जम्हाई जैसी विशिष्ट गतिविधि देखी गई है। यानी यह केवल जन्म के बाद दूसरों को देखकर सीखी गई आदत नहीं है। वैज्ञानिक स्वतः आने वाली जम्हाई और दूसरे की जम्हाई से प्रेरित प्रतिक्रिया को अलग-अलग समझने की कोशिश करते हैं।
जम्हाई एक अनैच्छिक क्रिया है अर्थात यह सामान्यतः हमारी इच्छा के बिना शुरू होती है। इसमें मुँह चौड़ा खुलता है, जबड़े और चेहरे की मांसपेशियाँ खिंचती हैं तथा लंबी, गहरी साँस ली जाती है। कभी इसके साथ आँखों में पानी भी आ जाता है। इसका संबंध केवल साँस लेने से नहीं, बल्कि शरीर की सक्रियता और आराम की बदलती अवस्थाओं से भी जोड़ा जाता है। इसलिए सोने से पहले ही नहीं, जागने के बाद भी जम्हाई आ सकती है।
लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि जब रक्त में ऑक्सीजन कम और कार्बन डाइऑक्साइड अधिक हो जाती है, तब शरीर इस असंतुलन को जम्हाई लेकर दूर करता है। यह विचार सहज लगता है, क्योंकि जम्हाई में हम गहरी साँस लेते हैं। लेकिन प्रयोगों ने इसे पर्याप्त समर्थन नहीं दिया। नियंत्रित परिस्थितियों में ऑक्सीजन की उपलब्धता घटाने से जम्हाइयाँ अपेक्षित रूप से नहीं बढ़ीं। इसलिए हर जम्हाई को ऑक्सीजन की कमी का संकेत मानना सही नहीं है। गहरी साँस और जम्हाई देखने में मिलती-जुलती जरूर हैं, लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही हो, यह आवश्यक नहीं।
एक चर्चित परिकल्पना के अनुसार जम्हाई मस्तिष्क के तापमान को नियंत्रित करने में सहायता कर सकती है। इसके पक्षधर मानते हैं कि जबड़े की गति, चेहरे के रक्तप्रवाह में बदलाव और भीतर ली गई हवा मिलकर ऊष्मा के आदान-प्रदान को प्रभावित करते हैं। कुछ मानव और पशु अध्ययनों में तापमान तथा जम्हाई के बीच संबंध मिला है। हालांकि इसे सिद्ध तथ्य की तरह प्रस्तुत करना जल्दबाजी होगी। यह एक शोध-समर्थित संभावना है, जम्हाई की हर परिस्थिति को समझा देने वाला अंतिम उत्तर नहीं।
एक दूसरी व्याख्या इसे सतर्कता में बदलाव से जोड़ती है। ऊब या नींद में शरीर अपेक्षाकृत कम सक्रिय होता है; ऐसे में जम्हाई जागरूकता बढ़ाने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है। तनाव के समय भी जम्हाई आ सकती है। इससे स्पष्ट होता है कि सामने वाला जम्हाई ले रहा हो, तो उसे तुरंत आलसी या बातचीत से ऊबा हुआ मान लेना उचित नहीं।
जम्हाई का सबसे रोचक पक्ष उसका ‘फैलना’ है। किसी को जम्हाई लेते देखना, उसकी आवाज सुनना, यहां तक कि उसके बारे में पढ़ना या सोचना भी अपनी जम्हाई शुरू कर सकता है। इसे संक्रामक जम्हाई कहते हैं, लेकिन इसका किसी संक्रमण से संबंध नहीं है। जम्हाई ‘संक्रामक’ इसलिए कही जाती है क्योंकि किसी को जम्हाई लेते देखकर हमारे मस्तिष्क में भी वही क्रिया करने की अनायास प्रवृत्ति पैदा हो सकती है। यह किसी जीवाणु या वायरस का संक्रमण नहीं, बल्कि संभवतः अनुकरण की एक स्वचालित प्रतिक्रिया है। हालाँकि इसकी पूरी तंत्रिका प्रक्रिया अभी स्पष्ट नहीं है।
इसे सामाजिक अनुकरण यानी अनजाने में दूसरे की क्रिया दोहराने और समूह के सदस्यों की अवस्थाओं में तालमेल से जोड़कर देखा जाता है। सहानुभूति की भूमिका भी प्रस्तावित है, लेकिन किसी व्यक्ति के जम्हाई न लेने से उसकी संवेदनशीलता का फैसला नहीं किया जा सकता।
कभी- कभार जम्हाई आना सामान्य है लेकिन सामान्य से बहुत अधिक जम्हाइयां, खासकर पर्याप्त आराम के बावजूद, ध्यान देने योग्य हैं। इनके पीछे नींद की कमी, नींद संबंधी विकार या कुछ दवाओं का प्रभाव हो सकता है। लगातार परेशानी होने पर चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है। जम्हाई अपने आप में किसी बीमारी का निदान नहीं; उसकी आवृत्ति, परिस्थितियां और साथ के लक्षण अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। बहरहाल, इस छोटी सी क्रिया की वैज्ञानिक कहानी अभी अधूरी है।
– सुभाष चंद्र लखेड़ा

