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ताईवान ने अभी अभी सुरक्षा के कारणोंवरा चीनी कंपनी हुवावे एवं झेड टी ई के नेटवर्क, मोबाईल एवं अन्य उत्पादनों पर प्रतिबंध लगाया है। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, न्यूझीलेंड और ऑस्ट्रेलिया में इन कंपनियों के खिलाफ पहले ही प्रतिबंध लगाये हैं। 170 देशों में काम करनेवाली हुवावे को यह एक बड़ा झटका है। हुवावे के चीफ फाईनान्शियल ऑफिसर मेंग वानझोऊ को कुछ हफ्ते पूर्व ही अमेरिका ने केनेड़ा में हथकड़ी पहनाई है। विश्व के कई देशों ने हुवावे के खिलाफ कार्रवाई की है यह कहते हुए ताईवान की सरकार ने अपने निर्णय को उचित ठहराया है। ताईवान एवं चीन के बीच विवाद कोई नया नही है। चीन के अनुसार ताईवान यह चीन का ही भाग है। ताईवान पर नियन्त्रण हेतु सैनिक कार्रवाई करने की धमकी चीन कई बार दे चुका है।

हुवावे के माध्यम से जासूसी का आरोप –

ताईवान सहित अन्य देशों द्वारा चीनी कंपनीयों पर लगाये गये प्रतिबंधों के अनेक कारण हैं। अपने उपकरणों एवं यंत्रो के माध्यम से चीन जासूसी करता है ऐसा आरोप अनेक देशों ने लगाया है। वर्तमान युग जानकारी एवं इंटरनेट के उपयोग का है। चीनी उत्पादनों के कारण सायबर सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है एवं सायबर हमलों में भी बढ़ोत्तरी हुई है ऐसा आरोप भी अनेक देशों ने किया है। हुवावे एवं झेडटीई कंपनी पर चीन सरकार का नियंत्रण है। अपने देश की गोपनीय सूचनायें चीन तक न पहुंचे ऐसा इन देशों का सोचना है। इसीलिये हुवावे पर प्रतिबंध लगाया गया है। न्यूझीलेंड एवं ऑस्ट्रेलिया ने अपने अपने देश में 5-जी नेटवर्क खड़ा करने हेतु हुवावे तथा झेड़टीई की भागीदारी पर प्रतिबंध लगाया है। अमेरिका की सॉफ्टवेयर वायरलेस कंपनी स्प्रिंट कॉर्फने इसके पहले ही हुवावे तथा झेडटीई को बाजु कर दिया है। ब्रिटेन के बीटी गु्रप ने 3-जी एवं 4-जी नेटवर्क से हुवावे के उपकरण हटा दिये हैं। साथ ही 5-जी नेटवर्क के विकास में हुवावे का उपयोग नही किया जायेगा ऐसा इंतजाम किया है। अब चीनी कंपनीयों पर विश्व के अनेक देश शंका करने लगे हैं।

सायबर हमले के डर से अमेरिका में राष्ट्रीय आपातकाल –

सायबर हमले के डर से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका मे राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया है। अमेरिका की सायबर सुरक्षा को धोखा (खतरा) पहुंचा सकती है ऐसी सभी कंपनीयों पर डोनाल्ड ट्रंप ने प्रतिबंध की कार्रवाई की है। दोनों देशों में व्यापारयुद्ध तेजी से कम्युनिकेशन सिस्टम को हॅक करने के लिये सायबर हमलावर सक्रिय है और इसिलिये अमेरिका ने चीन की दूरसंचार कंपनी हुवावे पर प्रतिबंध लगाया है। हुवावे विश्व की सबसे बडी दूरसंचार कंपनी है एवं 5-जी के तंत्रज्ञान में सबसे आगे है। अमेरिका को लगता है कि चीन हमारा तंत्रज्ञान चुराता है, उसके माध्यम से व्यापार में अधिक लाभ कमाता है एवं इसके अतिरिक्त अमेरिकी नागरिकों की जासूसी का भी काम करता है। अमेरिकन गुप्ताचार संस्थाओं का आरोप है कि हुवावे कंपनी ने ऐसे कुछ उपकरण लगाये हैं जो चीनी सेना को जासूसी मे मदद करते हैं। क्या यह सच है? आर्थिक एवं टेक्नालॉजी के क्षेत्र में चीन के वर्चस्व को कम करने का यह अमेरिकी प्रयास भी हो सकता है।
ट्रंप प्रशासन ने हुवावे का समावेश अपनी एंन्ट्री लिस्ट में किया है। अर्थात अमेरिकन सरकार की अनुमति के बिना अमेरिका की कोई कंपनी हुवावे के साथ कोई व्यवहार नही कर सकती।

विश्व में तंत्रज्ञान (टेक्नीकल नॉलेज)के वर्चस्व की लड़ाई –

चीनी उत्पादन सस्ते होने के कारण चीनी का हर जगह वर्चस्व है। इंटरनेट के लिये मोडेम, कम्प्यूटर के अनेक पार्ट्स, कम्प्यूटर हेतु डिजीटल कॅमरे, ऐसी अनेक वस्तुएं चीन द्वारा सस्ते में सप्लाई की जाती है। इसलिये अन्य किसी देशों की वस्तुओं की अपेक्षा चीन की वस्तुओं की मांग भारत व विश्व के अन्य देशों में अधिक है। अमेरिका द्वारा लगाये गये प्रतिबंध के बाद अमेरिका स्थित गूगल ने भी हुवावे को अ‍ॅन्ड्राईड ऑपरेटिंग सिस्टम की कुछ वस्तुओं का उपयोग करने हेतु प्रतिबंधित किया है। इसके कारण हुवावे के स्मार्ट फोन से गुगल संबधित युट्यूब और गुगल मॅप्स सरिखे एप गायब होने वाले हैं। इसके अतिरिक्त हुवावे को गुगल से किसी भी प्रकार की तांत्रिक सहायता न देदे का भी गुगल ने ऐलान किया है। ट्रम्प प्रशासन का आग्रह है कि चीन द्वारा टेक्नीकल नॉलेज की चोरी बंद की जानी चाहिये। ब्यूरो ऑफ इन्डस्ट्री एन्ड सिक्योरिटी की अनुमति के बिना केवल हुवावे ही नही बल्कि कोई भी विदेशी टेलाकॉम कंपनी अब अमेरिका में तंत्रज्ञान की बिक्रि अथवा हस्तातरण नही कर सकती। भविष्य में कुछ अन्य यूरोपीय देशों में भी हुवावे का मार्ग सरू नही है। हुवावे पर डेटाचोरी के अलावा बेंको में जमा रकम में भी बडे प्रमाण पर हमला करने का आरोप है। परंतु हुवावे को ने इन सब आरोपों को नकारते हुए कहा है कि उनकी कंपनी का स्वतंत्र अस्तित्व है और वह चीन सरकार से स्वतंत्र है। परंतु अमेरिका द्वारा आपातकाल लगाने के बाद हुवावे के इस स्पष्टीकरण पर कोई भी सहजता से विश्वास नही कर रहा है।

भारत द्वारा क्या करना चाहिये –

आज विश्व जनसंख्या का 56.1% इंटरनेट से जुड़ा है। सभी क्षेत्रों में इंटरनेट का सहभाग दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। परंतु इसी इंटरनेट के माध्यम से सायबर हमले की दहशत भी पैदा की है। सन् 2018 में ही पांच करोड सायबर हमले विश्वभर में सूचित किये गये। प्रायवेट एवं सरकारी संकेत स्थलों पर सायबर हमलों के कारण विश्व के देशों को झटका लगा। अमेरिका जैसी महासत्ता इसका अपवाद नही है। 2016 के ट्रम्प के राष्ट्रपति चुनाव में कथित रशियन हस्तक्षेप, केम्ब्रिज एनालिटिका के डाटा की चोरी, घुसपैठ और हमलों की घटनायें विश्वचर्चा का विषय रही। इसी से सीख लेकर भारत को भी इस सूचना चोरी की ओर गंभीरता से देखने की आवश्यकता है।

हुवावे यह चीन कंपनी भारत में 5-जी तंत्रज्ञान में सहयोग करने की इच्छुक है। परंतु, इस कंपनी की आड में चीन को भारत के डेटा पर अपना वर्चस्व बनाने की संधि बैठे-ठाले मिल सकती है। वैसे ही इस कंपनी के माध्यम से चीन भारत से डेटाचोरी कर सकता है, महत्वपूर्ण दस्ताऐवज चुरा कर उन्हे नष्ट कर सकता है और इस प्रकार भारत का सारा सायबर विश्व चीन द्वारा जकड़ा जा सकता है। इसी कारण विश्व के अनेक देशों द्वारा हुवावे को बाहर का रास्ता दिखाया गया है। रूस के राष्ट्रपतिब्लादि मीर पुतीन कहते हैं, ‘डेटा यही इस युग का पेट्रोल है’। अर्थात इस पेट्रोल से या तो आग भडक सकती है या अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इसलिये अपने देश के बहुमूल्य डेटा को चीन जैसे शत्रु राष्ट्र के हाथों में जाने देना कोई बुद्धिमत्ता नही है। हुवावे को भगाने से चीन को अरबों का नुकसान होगा और इसके कारण चीन की आर्थिक प्रगति धीमी होगी।

‘डेटा’ का रिमोट कंट्रोल भारतीय कंपनी के पास ही होना चाहिये-

परंतु हुवावे को देशनिकाला देने से भारत के तंत्रज्ञान बाजार पर उसका विपरित परिणाम दिखाई पड़ सकता है। इसके लिये हमे हुवावे के बदले अन्य सेवाप्रदाता कंपनियों को खोजना होगा। यह तुलनात्मक रूप से कम दर्जे का एवं महंगा सौदा भी हो सकता है। इसके कारण 5-जी की विकास प्रक्रिया में बाधा निर्माण हो सकती है। वैसे ही हुवावे पर निर्भर कुछ छोटी-बडी भारतीय कंपनीयों एवं ग्राहकों का भी नुकसान हो सकता है। परंतु इंटरनेट का उपयोग करने वाले विश्व के क्रमांक दो का भारत को देश की सुरक्षा से खिलवाड़ नही कर सकता। हुवावे 5-जी प्रणाली भारत में लाने के लिये इच्छुक है। 2020 तक जियो (या अन्य भारतीय कंपनी) भारत में 5-जी तंत्रज्ञान का जाल फैला देंगी ऐसा एक अंदाज टेलीकॉम क्षेत्र मे किया जा रहा है। आज की तारीख में ‘डेटा’ ही सर्वोच्च शक्ति है। इसके कारण डेटा का रिमोट कंट्रोल विदेशी कंपनी के हाथों में न जाने देने हेतु सायबर सुरक्षा एवं सतर्कता को सरकार को प्रधानता देनी ही होगी।
वर्तमान में चीन की आर्थिक मंदी का उपयोग कर अगले पांच सालों में भारत को अपनी अर्थव्यवस्था की गति बढ़ानी पडेगी और 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की बडी अर्थव्यवस्था बनने का प्रयत्न करना होगा। इसके कारण भारत और चीन की अर्थव्यवस्था के अंतर को पाटने मे हमें सहायता मिलेगी और इसके कारण हमारे रक्षा बजट में भी बढ़ोत्तरी हो सकती है। इसके कारण देश को और अधिक सुरक्षित करने में हम सक्षम होगें।

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