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जम्मू-कश्मीर के विधायक इंजीनियर रशीद ने एक अत्यंतविवादास्पद मुद्दा पेश किया है। उनका कहना है कि कश्मीरी पंडितों को घाटी में लौटने के पूर्व वहां रहने वाले बहुसंख्यक मुसलमानों की माफी मांगनी चाहिए। क्योंकि, मुसलमानों को आतंकवादियों की बंदूकों की छाया में छोड़कर हिंदुओं ने पलायन किया है। रशीद के इस बयान का अर्थ है दो दशक पूर्व हुई घटनाओं का विस्मरण करना। वस्तुतः, रशीद का यह वक्तव्य इतिहास आदि का विस्मरण नहीं है; अपितु ‘मगरमच्छ के आंसू’ से भी बढ़कर हैं।
रशीद का यह बयान पढ़कर क्या किसी का खून खौल उठा? क्या किसी के चेहरे पर नाराजी दिखाई दी? आक्रोश का कोई संकेत दिखाई दिया? एक अरब हिंदुओं ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की? क्या तथाकथित बुद्धिजीवियों की कलम चली? बड़बोले सेक्युलरिस्टों के मुंह से क्या कोई शब्द निकला है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर ‘नहीं’ हैं। यही एक विडम्बना है। पिछले २४ वर्षों से कश्मीरी हिंदू अपने घरबार से दूर शरणार्थी का जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। तत्कालीन केंद्र व राज्य सरकार की भेदभावपूर्ण नीतियों के कारण १९ जनवरी १९९० को कश्मीरी हिंदुओं को अपने ही घर से बेदखल होना पड़ा। कश्मीर के हिंदुओं की सभ्यता व संस्कृति लगभग ५ हजार वर्ष पुरानी है। १९८९ से ही पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों व अलगाववादियों ने कश्मीरी हिंदुओं को आतंकित करने के प्रयास जारी रखे। कश्मीर से हिंदुओं को भगा देने के एकमात्र मुद्दे को लेकर आतंकवादियों व अलगाववादियों ने उन्हें आतंकित करने के प्रयास जारी रखे। कश्मीरी हिंदू इन अलगाववादियों के मार्ग में एक रोड़ा थे। इसीलिए शांतिप्रिय हिंदू आतंकवादियों का प्रमुख निशाना बने। स्थानीय अखबारों में विज्ञापन देकर ‘हिंदुओं को कश्मीर छोड़ने’ की चेतावनी दी गई। इसके बाद कश्मीर घाटी में अफरा-तफरी मच गई। सड़कों पर बंदूकधारी आतंकवादी व कट्टरपंथी कत्लेआम करते हुए व भारत विरोधी नारे लगाते हुए खुलकर मुक्त संचार करते रहे।
धरती पर स्वर्ग माने जाने वाली कश्मीर घाटी धधकने लगी। मस्जिदों में अजान की जगह भड़काऊ भाषण दिए जाने लगे। दीवारों पर पोस्टर लगावाकर हिंदुओं को घाटी छोड़ने के लिए धमकाया गया और हत्या की चेतावनी दी गई। आतंकवादियों व अलगाववादियों ने कश्मीरी हिंदुओं में घबराहट फैलाने के लिए मानवता की सभी सीमाएं लांघ लीं। संवेदनशीलता की पराकाष्ठा यह थी कि हिंदुओं के मारे जाने पर आतंकवादी खुश हो रहे थे। हिंदुओं के कई शवों का अंत्यसंस्कार तक नहीं करने दिया गया। अंततः १९ जनवरी १९९० को निराशा व संघर्ष से जूझने वाले हिंदुओं का धैर्य खत्म हुआ। अपनी जान बचाने के लिए अपना घर, खेती, धन-सम्पदा सब कुछ छोड़कर अपनी जन्मस्थली से पलायन करने का हिंदुओं ने निर्णय किया। लगभग पांच लाख हिंदू निर्वासित हुए।
हिंदुओं पर अत्याचार हो रहे थे और सामान्य कश्मीरी मुसलमान यह पलायन शांतिपूर्वक देख रहा था। जब प्रशासन नामक कोई चीज ही नहीं बची थी, मुसलमान बनो, कश्मीर घाटी छोडो या मरो! यही विकल्प बचे थे, ऐसी स्थिति में हिंदू क्या करते? अंत में अपनी बहू-बेटियों की इज्जत बचाने और अपने वंश को बचाने के लिए हिंदुओं ने वहां से पलायन किया। इस घटना को २४ साल हो चुके हैं, फिर भी आज तक वे अपने ही देश में शरणार्थी के रूप में जीवन बिता रहे हैं।
आज इराक, सीरिया में इस्लामी राज्य स्थापित करने को लेकर जारी नरसंहार से इस्लाम का सच्चा क्रूर चेहरा दुनिया के सामने आ रहा है। शिया-सुन्नी जिस तरह नरसंहार कर रहे हैं, १९९० के दशक में इसी तरह की जिहादी मानसिकता के बलि चढ़े हैं कश्मीर के हिंदू। नेशनल कांफ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला हो या ओमर अब्दुल्ला, अथवा पीडीपी के मुफ्ती मोहम्मद सईद, रूबिना सईद- इन सभी की विचारधारा में धार्मिक कट्टरता ठूंस-ठूंस कर भरी हुई है। वस्तुतः ये सभी इसी साजिश के भागीदार हैं, जिसके कारण कश्मीर घाटी को मुस्लिम बहुल बनाया जा सका। कश्मीर की मूल संस्कृति के एक प्रतीक कश्मीरी हिंदुओं को घाटी से जबरन् भगाए जाने के बाद इस्लामी कट्टरवादियों का एक लक्ष्य पूरा हुआ था। कश्मीर को ‘काफ़िर मुक्त’ तथा हिंदू रहित करने का!
जम्मू-कश्मीर में पहली बार ही भारतीय जनता पार्टी सरकार में सहभागी होने से कश्मीरी हिंदुओं की अपेक्षाएं बढ़ी हैं। पिछले २४ वर्षों में कश्मीरी हिंदुओं के मानवाधिकारों और उन्हें सुरक्षित रूप से उनके घर लौटाने के लिए कभी कोई आवाज नहीं उठाई गई। आज भाजपा कश्मीरी हिंदुओं के पुनर्वसन की कोशिश कर रही है। योजनाएं बना रही हैं। इसलिए कश्मीर घाटी के अलगाववादियों ने हिंसक विरोध के जरिए इन योजनाओं को रुकवाने के प्रयास आरंभ कर दिए हैं। कश्मीर घाटी ‘काफ़िर मुक्त करने’ की साजिश को मोदी सरकार को खत्म करना चाहिए। इसलिए जम्मू-कश्मीर के विधायक इंजीनियर रशीद का बयान ‘मगरमच्छ के आंसू’ से भी बढ़कर हैं। कश्मीर घाटी को ‘हिंदू मुक्त बनाने’ की साजिश का यह भी एक अंग है। ऐसे भड़काऊ व अलगाववादी नेताओं को उनकी उचित जगह दिखाकर, घाटी के अलगाववादियों के विरोध के आगे न झुकते हुए कश्मीरी हिंदुओं का पुनर्वसन करना भाजप की सच्ची परीक्षा होगी। हिंदू हितों का विरोध, राष्ट्रीय मुद्दों को टाल देने वाली पीडीपी से गलाभेंट जारी रखें या उसे उसकी जगह दिखाएं इस संकट की स्थिति में भाजपा का मार्गक्रमण उल्लेखनीय होगा।
 
 

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