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भारतीय सेना ने म्यांमार की सीमा में घुसकर आतंकवादियों का खात्मा किया। यह कार्रवाई भारतीय सेना को मिली एक बड़ी सफलता है। देशभर में इस कार्रवाई का स्वागत किया गया वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान इससे दहल गया। यह घटना घटित होने और उसका आनंद मनाने के पूर्व एक खतरे की घंटी बजी थी। कश्मीर में कुछ अलगाववादियों के आंदोलन और नगालैंड में सेना के जवानों के साथ हुई रक्तरंजित घटना के पीछे यह घटना कहीं छिप गई है। या कहीं हम ही उस घटना की अनदेखी नहीं कर रहे हैं? वह घटना है, ऑपरेशन ब्लू स्टार की ३१वीं वर्षगांठ के अवसर पर खालिस्तान समर्थकों द्वारा जम्मू में जरनैल सिंह भिंडरावाले के पोस्टर लगाए जाने की। वे पोस्टर जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा हटा दिए गए। इस घटना के बाद खालिस्तान समर्थक रास्तों पर उतर आए। पुलिस के साथ उनका जोरदार संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में अर्थात पुलिस की गोलीबारी में एक युवक की मृत्यु हो गई। इसके बाद संघर्ष और भी बढ़ गया। अगले चार दिनों तक पुलिस और खालिस्तान समर्थकों के बीच संघर्ष शुरू रहा। शहर की इंटरनेट सुविधा बंद कर दी गई। यह घटना भले ही छोटी हो, परंतु यह स्पष्ट होता है कि खालिस्तान के अंगारे अभी भी धधक रहे हैं।
पत्रकारिता का एक नियम है कि ‘कम तथ्यों के आधार पर अधिक निष्कर्ष नहीं निकालने चाहिए।’यह भले ही सही हो फिर भी चूंकि यह देश पहले भी खालिस्तानी आतंकवाद का सामना कर चुका है अत: सामान्य सी लगने वाली इस घटना की ओर भी गंभीरता से देखना गलत नहीं होगा। १९७० से १९८५ के कालखंड में पंजाब ने बहुत गहरी चोटें खाईं हैं। इन दो दशकों में पंजाब के साथ ही पूरे भारत में खालिस्तान आंदोलन ने जोर पकड़ा था। प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी, पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह, जनरल अरुण कुमार वैद्य इत्यादि महत्वपूर्ण व्यक्ति इस आंदोलन का शिकार हो गए थे। इन दो दशकों में पंजाब में आतंकवाद के कारण मरने वालों की संख्या लगभग ४० हजार है। इसमें २ हजार पुलिस और आठ हजार आतंकवादियों का समावेश है। पंजाब में आतंकवाद का नंगा नाच खेलने वाले इन आतंकवादियों का और उनके मुखिया जरनैल सिंह भिंडरावाले को रोकना बहुत आवश्यक था। स्वर्ण मंदिर में डेरा डाल कर बैठे ये आतंकवादी शस्त्र संधि, चर्चा या स्वर्ण मंदिर की मुक्तता इत्यादि किसी के लिए भी तैयार नहीं थे। पंजाब के आतंकवाद ने इतना भीषण रूप धारण कर लिया था कि उसके कारण सारे देश के रोंगटे खड़े हो गए थे। ऐसे समय में आतंकवादियों के शिकंजे से पंजाब को मुक्ति दिलाने के अलावा कोई रास्ता शेष नहीं था। ऑपरेशन ब्लू स्टार की कार्रवाई करके ३ से ६ जून १९८४ में स्वर्ण मंदिर को मुक्त किया गया। उसके बाद पाकिस्तान द्वारा पोषित खालिस्तानी आतंकवाद पर स्थानीय जनता की मदद से और पुलिस तथा सैनिकी कार्रवाई कर कुछ हद तक काबू पा लिया गया।
हम सभी भारतीय इस भ्रम में हैं कि ८० के दशक में उभरा खालिस्तानी आंदोलन खत्म हो गया। परंतु दो वर्ष पहले लेफ्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह ब्रार पर इंगलैंड में हुए खूनी हमले के माध्यम से फिर एक बार यह बात सबके सामने आ गई कि खालिस्तानी आंदोलन अभी भी पूरा शांत नहीं हुआ है। पिछले २० सालों में पंजाबी युवकों ने खेती, उद्योगों की ओर रुख किया। उसके कारण पंजाब राज्य की उन्नति हुई। अलगाववाद और आतंकवाद से कैसे मुकाबला किया जाता है इसके उत्तम उदाहरण के रूप में पंजाब का नाम लिया जाने लगा। खालिस्तान आंदोलन थम जरूर गया था परंतु खत्म नहीं हुआ है। ‘‘सन १९८४ की घटना को भुलाया नहीं जाएगा और न ही उसके लिए माफ किया जाएगा।’’ इस तरह के नारे पंजाब में आज भी गूंजते सुनाई देते हैं। पंजाब में भले ही इस खालिस्तानी आंदोलन को अधिक समर्थन न मिल रहा हो परंतु, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड में खालिस्तान समर्थकों का जाल फैला हुआ है। साथ ही सन १९४७ से भारत द्वेष रूपी तवे पर अपनी रोटियां सेकने वाला पाकिस्तान कभी पंजाब, कभी कश्मीर तो कभी उत्तर-पूर्वी प्रांतों में आतंकवादियों का पोषण करने में मदद करता रहता है। पकिस्तान की कुख्यात आईएसआई खालिस्तान रूपी राक्षस को फिर से बोतल से बाहर निकालने का प्रयत्न कर रही है। पंजाब को फिर से खालसा राज का लालच देकर भारत में सिख आतंकवाद के पैर जमाने का प्रयत्न हो रहा है। आईएसआई की कार्रवाइयों से स्पष्ट होता है कि पंजाब में अनेक वर्षों से दबाए गए सिख आतंकवाद को फिर बढ़ावा देने का प्रयत्न किया जा रहा है। असंख्य बलिदानों की कीमत पर पंजाब को आतंकवादियों से मुक्त कराया गया है। अत: खालिस्तान के नाम पर होने वाली छोटी-छोटी घटनाओं को भी गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।
स्वर्ण मंदिर का ब्लू स्टार आपरेशन और इंदिरा गांधी हत्या के बाद सिख हत्याकांड इन घटनाओं का बार-बार उल्लेख करके सामान्य पंजाबी युवकों के मन में देश के प्रति द्वेष भरा जाए या फिर नई शुरूआत करके उन्हें राष्ट्रीय प्रवाह में शामिल किया जाए; यह विचार पंजाब के प्रत्येक नागरिक को करना होगा। हजारों की जान लेकर, भारी मात्रा में लहू बहाने के बाद भी बदले की आग को भड़काए रखने में जिन लोगों को दिलचस्पी है, उन लोगों को रोके रखना सरकार की जिम्मेदारी है। कश्मीर में पाकिस्तानी झंड़े और जम्मू में खालिस्तानी पोस्टर सामान्य बात नहीं है। क्या पंजाब सहित पूरे देश को अलगाववाद की खाई में धकेलने का षड्यंत्र रचा जा रहा है? जम्मू में घटी घटना संपूर्ण देश के लिए चिंता का विषय है। फिलहाल देश के सामने कई चुनौतियां हैं। प्रांतवाद की समस्या, आतंकवाद, नक्सलवाद की समस्याएं बढ़ रही हैं। इस पार्श्वभूमि पर देश में पुन: खालिस्तान का भूत सक्रिय हुआ तो देश यह सहन नहीं कर पाएगा। इससे एक प्रकार से प्रांतवाद को ही बल मिलेगा। ऐसे समय में जब देश अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, देश की एकता को टिकाए रखने के लिए कठोर कदम उठाना आवश्यक है। खालिस्तान आंदोलन को काबू में लाना ही राष्ट्र के हित में होगा। पंजाब के साथ ही सारे देश की जनता जिस शांति की अपेक्षा करती है वह इसी माध्यम से प्राप्त हो सकेगी।

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