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***संगीता जोशी***
गर्मी का मौसम हम जैसा तैसा सह लेते हैं; है न? लेकिन मन में एक ही उम्मीद लेकर, कि अब आनेवाली है बरखा ॠतु। आकाश में जब छोटे मोटे बादल दिखने लगते हैं तो हमें खुशी होती है। एक बात यह तो है कि किसानों को फसल की चिंता रहती है। सिर्फ किसानों की ही परेशानी क्यों? हम सब का जीवन ही इस ॠतु पर निर्भर है! ये तो हुई वैज्ञानिक बातें। जरा याद करें, अपनी वह ‘बाली उमर’! जब बारिश का मौसम हमें आकाश और धरती का प्रेमभरा मिलन लगता था। धरती, आकाश की प्रेमधाराओं का इन्तजार करती महसूस होती थी। और मिलन के उस मौसम से हरीभरी होकर फूली नहीं समाती थी! लेकिन ये सब तो आज भी होता है। यह जादू कुछ उम्र का और ज्यादा इस मौसम का है। आज भी धरती को आकाश से प्रेम है; बादलों की प्रतीक्षा है; और मिलन की आस है।
शायद यही वजह है कि बारिश का मौसम प्रेमियों को एक दूसरे की याद दिलाता है। साथ साथ होने की आस दिलों में जगाता है। मन में यादों का हुजूम लगता है।
शैलेन्द्र लिखते हैं,
रिमझिम के तराने लेके आई बरसात
याद आए किसी से वो पहली मुलाकात…..
पहली मुलाकात में शायद प्यार का इजहार न हो पाया हो; लेकिन बारिश का रसीला मौसम दिलों का हौसला बढ़ा देता है।
भीगे तनमन पड़े रस की फुहार
प्यार का संदेसा लाई बरखा बहार
मैं ना बोलू आखें करे अखियों से बात…
प्रेमी कहता है, कि उसे बहुत कुछ कहना तो है, पर बात होठों तक आकर रुक जाती है। दोनों साथ साथ हैं, तो कुछ बोलने की जरूरत ही क्या है? कभी आंखें तो कभी हल्का सा स्पर्श सब कुछ कह लेता है।
‘काला बाजार’ में देव आनंद और वहीदा का प्यार ऐसी बारिश में ही रंग लाता है।
लेकिन जब प्रेमी साथ ना हो तो प्रेमिका की हालत क्या होती है? वह बात भी शैलेंद्र ही लिखते हैं
घर आ जा घिर आए बदरा सावरिया
मोरा जिया धक धक रे चमके बिजुरिया …
घने बादल छाए हैं और बिजलियॉं डरा रही हैं। ऐसे में तुम कहा हो, मेरे साजन? अब तो घर आ जाओ; यह मौसम दूर रहने का नहीं है।
प्रेमिका कितनी व्याकुल है देखिए-
सूना सूना घर मोहे डसने को आए रे
खिड़की पे बैठे बैठे सारी रैन जाए रे
टिप-टिप सुनत मैं तो भई रे बावरिया….
साजन के बगैर घर उसको सिर्फ सूना नहीं लग रहा; घर ‘डसने’ को होता है। क्या खूब शब्द का प्रयोग कवि ने किया है! इस एक शब्द से ‘अकेलेपन’ की गहराई या इन्टेन्सिटी बराबर अभिव्यक्त हुई है।
इस गीत का पहला बंध इस प्रकार है-
लहराके आए हवा दियरा बुझाए रे
लागे मोहे अंगवा बदन कांप जाए रे
चुटकी ले पूछे काहे आए ना सावरिया…
सृष्टि का हर विभ्रम हमें वैसा ही महसूस होता है, जैसा हमारे मन का भाव हो। जैसे, यहां, हवा दिया बुझा देती है; और इस तरह तेज बहती है कि प्रेमिका का बदन कांप उठता है; हवा मानो यह भी पूछती है ‘क्यों? तुम अकेली हो इस समय? तुम्हारा प्रेमी नहीं आया? क्या उसे तुम्हारी परवाह नहीं?’
प्रेमिका जवाब नहीं दे पाती। उसे लगता है कि शायद उसके प्यार को किसी बैरन की नजर लग गई!! इस बात को सिर्फ एक मुहावरे की तरह लीजिए! कवि कोई अंधश्रद्धा वाली बात नहीं करना चाहता है।
‘छोटे नवाब’ फिल्म १९६१ में रिलीज हुई थी। इसकी विशेषता यह है कि आर. डी. बर्मन की यह पहली फिल्म थी, जिसका संगीत उन्होंने बनाया था। और यह गाना उनका पहला गाना था जो पूरा पूरा शास्त्रीय संगीत पर आधारित था। लता जी ने यह गाना बड़े प्यार से गाया है। पचपन सालों के बाद भी यह गाना पुराना नहीं हुआ!!
शैलेंद्र का लिखा एक ‘बारिशवाला’ गाना छोड़ कर हम आगे जा ही नहीं सकते।
संगीत सलील चौधरी का था और लताजी को खुद के जो गाने पसंद हैं उनमें से यह एक है।
ओ सजना, बरखा बहार आई
अखियों में प्यार लाई, रस की फुहार लाई….
तुम को पुकारे मेरे मन का पपीहरा
मीठी मीठी अग्नि में जले मोरा जियरा
…ओ सजना..
ऐसी रिमझिम में ओ सजन

प्यासे प्यासे मेरे नयन…तेरे ही ख्वाब में खो गये
सांवली सलोनी घटा जब जब आई
अखियों में रैना गई, निंदिया न आई
…ओ सजना…
बरखा ॠतु प्रेम की भावना मन में इस प्रकार जगाती है कि प्रेमिका रातभर सो नहीं सकती। अपने प्रिय व्यक्ति को मन ही मन पुकारती रहती है। रिमझिम फुहार तो बरस रही है, लेकिन नैन तो प्यासे ही हैं। उसे देखने के लिए।
फिल्म थी ‘परख’ (१९६०)। इसका संगीत सलिल चौधरी जी ने किया था और स्टोरी भी उन्हीं की थी। इसकी एक विशेषता यह थी की हिरॉइन साधना को बिल्कुल ही ‘मेकअप’ नहीं दिया था। उसकी सादगी ही बहुत सुंदर लगती है पर्देपर। इसमें से एक और गीत ‘मेरे मन के दिये, यूं ही घुट घुट के जल तू मेरे लाडलेऽ ’ भी अति सुंदर था। इस फिल्म में मोतीलाल हीरो थे। वे साधना के प्रेमी नहीं थे। कौन थे, यह जानने के लिए फिल्म जरूर देखनी चाहिए।
एक और गाना जो दिल में बसा है, वह इस वक्त बहुत याद आता है।
मेघा रे, मेघा रे, मत परदेस जा रे
आज तू प्रेम का संदेसा बरसा रे….
सुरों के हिसाब से यह गाना तार-षड्ज पर शुरू होता है।क्यों कि दोनों प्रेमी मेघ को पुकार रहे हैं; जो दूर आकाश पर है, उसे बुला रहे हैं। धीमी आवाज में तो नहीं बुला सकते न! संगीतकार का यह विचार उसकी काबिलियत का सबूत है। सैल्यूट टू लक्ष्मी-प्यारे! प्यासा सावन, १९८१, की फिल्म थी।
बारिश का मौसम और मोर का संबंध तो सभी जानते हैं।
मन का मयूरा आज मगन हो रहा है
उमंगों का सागर उमड़ने लगा है
बाबुल का आंगन बिछडने लगा है
न जाने कहां से हवा आ रही है
उड़ा के ये हम को लिये जा रही है
चलो और दुनिया बसाएंगे हम-तुम
ये जन्मों का नाता निभाहेंगे हम-तुम…
मेघा रे..
मन का मोर नाचने में मगन है; मन में प्यारभरे उमंग उठ रहे हैं; यह बारिश की हवा हमें जहां ले जा रही है, वहीं हम अपनी नई दुनिया बसाएंगे। यह कहते कहते प्रेमिका का मन एक तरफ दुखी भी हो रहा है, कि बाबुल को (पीहर को) छोड़ना पड़ेगा। फिर भी दो प्रेमी अब अलग होना नहीं चाहते। मेघ की साथ मांग रहे हैं, क्यों कि यही है मिलन का मौसम! सुरेश वाडकर और लता जी के सुर में गाते हैं जितेंद्र और मौशमी चटर्जी।
इस बारिश के मौसम को हमें इतना प्यार क्यों हैं? क्यों कि यही है सृष्टि के हर्षोल्लास का मौसम। उसकी तृप्ति का मौसम!

मो. : ९६६५०९५६५३

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