चक्रव्यूह में फंसा लोकपाल

लोकपाल विधेयक का चक्रव्यूह खत्म नहीं होने वाला है। भ्रष्टाचार खत्म करने की मंशा के बजाय राजनीतिक दांवपेंच में वह उलझ गया है। सत्तारू़ढ कांग्रेस ने प्रस्ताव का जो प्रारूप पेश किया है वह एक तरह से दंतहीन लोकपाल का है। अण्णा टीम और सरकार के बीच विवाद के जो मुद्दे थे वे लगभग वैसे ही हैं। केवल खूबी से मलमली लखनऊ चादर उ़ढा दी गई है। इससे बाहर से लोकपाल खूबसूरत दिखाई देता है, लेकिन अंदर से उसका चेहरा एक तरह से नाकारा है। इस तरह भ्रष्टाचार से ल़डने की कांग्रेस की ही मंशा पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।

अण्णा का जनलोकपाल विधेयक भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर और एकमुश्त विधेयक की बात करता है तो कांग्रेस ने उसका तीन स्वतंत्र विधेयकों में बंटवारा कर दिया है। न्यायपालिका जवाबदेही विधेयक, नागरिक घोषणापत्र विधेयक और भ्रष्टाचार की जानकारी देने वाले को अभय ये तीन विधेयक हैं। बातें वही हैं, टुक़डों में हैं। सीधे लोकपाल के अधीन करने के बजाय घूमफिरकर लोकपाल तक पहुंचेगी और शायद तब तक मूल मुद्दा ही समाप्त हो जाए। यही राजनीति का खेल है।
तीन मुद्दें मुख्य रूप से विवाद के थे। प्रधान मंत्री, ग्रुप सी और डी कर्मचारियों और सीबीआई को लोकपाल के दायरे में लाना। प्रधान मंत्री को कुछ शर्तों के साथ दायरे में लाया ही गया है, जो शायद बहुत विवाद का मुद्दा अब न हो। सी और डी कर्मचारियों को वेंâद्रीय सतर्वâता आयुक्त के माध्यम से लोकपाल तक लाया जाएगा अर्थात लोकपाल की इस मामले में उपयोगिता शून्य हो जाएगी। सब से बड़ा विवाद का मुद्दा सीबीआई को दायरे में लाने का है। सरकार ने इसे बिल्कुल नहीं माना। बदले में वह सीबीआई को दो भागों में- जांच और अभियोजन- में बांटना चाहती है। मतलब लोकपाल शून्य। इस तरह बिना जांच के अधिकार वाला लोकपाल महज शोभा की वस्तु बन जाएगा। प्रश्न है, और एक शोभा की वस्तु क्यों? राजपथ बनाने के बजाय चोर गलियां क्यों बनाई जा रही हैं?
कदम-दर-कदम हीलाहवाला, संसद की स्थायी समिति को प्रारूप के लिए कहना, सर्वदलीय बैठकों की नौटंकी और फिर धीरे-धीरे एक एक पर कथित सहमति का मार्ग खोलते जाना, विपक्ष के कई नेताओं का अण्णा के मंच पर आकर समर्थन करना और सर्वदलीय बैठक में जाकर या तो मौन रहना या और कोई पुछल्ला छो़ड देना, हर मुद्दे पर करवटें बदलते रहना या कोई मामूली नुक्स निकालकर मुद्दे को लम्बा खिंचवाना ये सारे राजनीतिक चक्रव्यूह की रणनीति के ही हिस्से माने जाने चाहिए। राजनीतिक दल यह दिखाना चाहते हैं कि वे भ्रष्टाचार को मिटाने के प्रति कटिबध्द हैं, कठोर लोकपाल लाना चाहते हैं। सरकारी पक्ष और विपक्ष दोनों इसीके हिस्से हैं। फिर मुलायम क्या और कठोर क्या इस पर बहस छि़डती है। अण्णा दहाड़ लगाते हैं कि उनका ही विधेयक जस के तस लाया जाए। उनका लोकपाल निरंकुश लोकपाल होगा। निरंकुशता गुमान और भ्रष्टाचार की जननी है। अत: निरंकुश लोकपाल से भी भ्रष्टाचार मिटेगा ऐसा कोई दावे के साथ नहीं कह सकता।
अब विधेयक संसद के समक्ष है। हमेशा की तरह हल्ला-गुल्ला होगा जिसे हमारी भाषा में हम बहस कहते हैं। कुछ संशोधन पेश किए जाएंगे, जिनमें से एकाध पर सत्ता पक्ष सहमत हो सकता है। इस तरह लोकसभा में सत्ता पक्ष के बहुमत के कारण विधेयक का पास होना ही है। हां राज्यसभा में सत्ता पक्ष के अल्पमत के कारण दिक्कत आ सकती है। कांग्रेस को इसकी िंचता नहीं है। राज्यसभा में विधेयक रुकता है तो वह आसानी से विपक्ष पर दोष म़ढ देगी।
आगे का रास्ता और जटिल दिखाई देता है। एक ओर तो अण्णा का आंदोलन और दूसरी ओर कानून बनने पर प्रशासनिक अमल की समस्या। चुनावों से लेकर तो रोजमर्रे के प्रशासन तक यह समस्या खड़ी होने वाली है। जब तब मामले बढ़ते जाएंगे और उसका निपटारा करने की प्रशासन के पास या लोकपाल के पास कोई क्षमता नहीं होगी। जिससे असंतोष और नए आंदोलन जन्म लेंगे।
असल में भ्रष्टाचार की जड़ों और स्त्रोतों पर आघात करने की जरूरत है। इसके मूल में है हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली। इससे पाqश्चम का अंधानुकरण, बाजारूपन, दूसरे से आगे निकलने की अंधी दौ़ड और हर तरीके से धन कमाने की स्पर्धा ने जन्म लिया है। धर्म और अधर्म की बात वृध्दों की विरासत मानी जाने लगी है। चरित्रसम्पन्न होना धर्म है और उसका क्षरण अधर्म है यह बात नई पी़ढी तक पहुंचाने की आवश्यकता है। यह बहुत लम्बा रास्ता है, लेकिन इसके सिवा कोई विकल्प दिखाई नहीं देता।
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