जम्मू कश्मीर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान

एक समय था जब डोडा और अनंतनाग से खबरें आती थीं कि आज इतने हिन्दू लोगों को आतंकवादियों ने गोली से उड़ा दिया । हफ्ते भर बाद बस जगह, तारीखें और लाशों की संख्या भर बदलती थी बाकी मारने वाले वही लोग थे और मरने वाले भी । आज भी वहां के हालात सामान्य नहीं हैं । मुस्लिम आतंकी वहां नित रोज अपना तांडव कर रहे हैं ।

आजादी के तुरन्त बाद तो हालात और भी बदतर थे । हत्या, लूटपाट और रेप बस यही तो कहानी थी धरती के स्वर्ग कश्मीर की । ऊपर से हमारे महान नेता गण । क्या जानते हैं आप कि एक समय था जब जम्मू कश्मीर में जाने के लिए वीजा की जरूरत पड़ती थी ।

ऐसे में एक सवा पसली का आदमी जम्मू कश्मीर में बिना वीजा के प्रवेश करता है । वहाँ की सरकार उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल देती है । पूरे देश मे विरोध होता है । बाद में उस व्यक्ति को जेल में ही मार दिया जाता है ।

नेता के निधन से क्षुब्ध जनता उग्र होती है । सत्ता को झुकना पड़ता है और मुखर्जी का बलिदान व्यर्थ नहीं जाता । देश के प्रधान को जम्मू कश्मीर में प्रवेश के लिए वीजा का प्रावधान हटाना पड़ता है ।

आज जो ये काश्मीर में हम बुलेट पे सवार हो हवा से बातें करते हुए लद्दाख की सैर करते हैं तो ये उसी महापुरुष की बदौलत है । ये उस व्यक्ति की विचारधारा का सशक्त हस्ताक्षर ही है जो आज काश्मीर में 370 और 35A दोनों अनुच्छेद हटा दिए गए । एक दिन हम PoJK, PoL, CoL की एक एक इंच जमीन भी वापस लेकर रहेंगे यह संकल्प भी मुखर्जी की उसी विचारधारा का है ।

नमन है ऐसे वीर पुरुषों को जिन्होंने अपना बलिदान दिया पर सत्ता की गलत नीतियों के समक्ष नहीं झुके । नमन उन्हें जिनकी वजह से आज काश्मीर की क्यारियाँ मेरे भारतवर्ष के लिए केसर उगाती हैं । नमन उन्हें जो गर न होते तो शायद काश्मीरी ललनाओं के हाथ पाकिओं के लिए पश्मीना शॉल बुनते ।

डल झील के शिकारे के आखिरी कोने पर खड़ा एक हिंदुस्थानी आपके बलिदान को नमन करता है श्यामा प्रसाद मुखर्जी ।

जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी वो काश्मीर हमारा है
वो काश्मीर हमारा है वो सारा का सारा है ।।
-अनुज अग्रवाल

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