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***संगीता जोशी***

मशहूर शायर निदा फाज़ली हिंदी, उर्दू और गुजराती में लिखते थे। वे देश में एकात्मता के उद्घोषक थे। भारत का विभाजन उन्हें मंजूर नहीं था। विभाजन के बाद उनके माता-पिता पाकिस्तान चले गए, लेकिन उन्होंने हिंदुस्तान में ही रहना पसंद किया। उनके जाने से सूनापन तो आया; लेकिन उनकी शायरी एकात्मता और भाईचारे की रौनक जगाती ही रहेगी।

भी जा’ यह गाना है ‘सुर’ नामक हिंदी फिल्म का है। अभी अभी आपने पढ़ा होगा कि इस गाने को और गीतकार को २००२ का ‘बेस्ट लिरिक्स’ और गीतकार को ‘बेस्ट लिरिसिस्ट’ का फिल्मफेअर अवॉर्ड मिला था। हां, वही गीतकार और शायर निदा फाज़ली अब हमारे बीच नहीं रहे। इस गाने की दो पंक्तियां हैं–
आ भी जा ऐ सुबहा,
रात को कर विदा, दिलरुबा…
‘आभी जा..ऽ ‘ शब्द सुन कर पहली बार हमें लगता है, कि गायिका अपने आशिक को ही पुकार रही होगी। लेकिन ‘ऐ सुबह…’ ‘रात को कर विदा’ ये आगे के शब्द जब हम सुनते हैं तो एहसास होता है कि इस गीत का आयाम कितना बडा है!
सुबह आती है, तो अंधेरा छट जाता है; सभी जगह उजाला ही उजाला हो जाता है। अब ‘सुबह’ का अर्थ व्यापक हो सकता है; जैसे ज्ञान का सवेरा, अच्छे दिनों का सवेरा, अच्छे प्रशासन का सवेरा, दुनिया में भाईचारे का नाता स्थापित होने का सवेरा…और भी ऐसे कितने सवेरों की विश्व में जरूरत है। शायर ने यह बात कहके अपनी प्रतिभा का प्रत्यय पाठकों को दिया है।
निदा फाजली ऐसे ही ऊंचे विचारों के शायर थे। हां, वे पहले शायर थे और गीतकार बाद में। उनका कहना था कि गीत लिखने में शायर पर बहुत बंधन आते हैं। स्र्किप्ट की डिमांड, सिचुएशन की जानकारी, तथा डिरेक्टर की सूचनाएं इत्यादि ध्यान में रख कर लिखना पडता है। फिर भी गीत मूलतः कविता ही है, इसलिए उन्होंने गीत लिखना भी मंजूर किया। क्योंकि रोजमर्रा की जिंदगी जीने के लिए पैसों की जरूरत होती है। पैसों से स्थिरता आने पर मन में लिखने की प्रेरणा जागती है। खाली पेट में कला कैसे उभर सकती है? इसी विचार के साथ गीत लिखना उन्होंने स्वीकार किया।
पहली बार फिल्म ‘रज़िया सुलतान’ के कुछ गीत लिखने का अवसर उन्हें मिला। उस फिल्म की यह मशहूर गजल….
आई जंजीर की झनकार खुदा खैर करे
दिल हुआ किस का गिरफ्तार खुदा खैर करे…
रज़िया के मन में हबशी गुलाम के लिए मुहब्बत पैदा होती है, जो कि कैदी है। उस कैदी का भी दिल ‘गिरफ्तार’ हो जाता है; यह शब्द ‘कैदी’ से जो संबंध दिखाता है उससे शेर की सुंदरता बढ़ती है। दिल को भी जैसे प्यार की जंजीरों ने जकड़ लिया है; और प्यार की आहट देने वाली ‘जंजीर की आवाज’ याने झनकार जो रब्त दिखाती है उससे शेर ज्यादा सुंदर लगता है। हबशी खुद जंजीरों से जकड़ा हुआ ही तो है!
जाने ये कौन मेरी रूह को छू कर गुजरा
इक कयामत हुई बेदार खुदा खैर करे….
रज़िया हिंदुस्तान की मलिका थी। उससे एक मामूली हबशी कैदी मोहब्बत करने लगे तो प्रजा में खलबली (कयामत) तो मच ही जाएगी!
लम्हा लम्हा मेरी आंखों में खिंची जाती है
इक चमकती हुई तलवार खुदा कैर करे….
रज़िया के सौंदर्य से प्रभावित होकर हबशी उसको ‘चमकती तलवार’ की उपमा देकर उसकी सराहना करता है।
खून दिल का न छलक जाए मेरी आंखों से
हो न जाए कहीं इजहार खुदा खैर करे…..
‘खून दिल का’ कहने का कारण है कि अगर दिल मोहब्बत से ‘जख्मी’ है तो खून निकलना यानी नजरों से अनजाने में प्रेम प्रकटना तो साधारण सी बात है। हबशी को डर है कि ऐसा हुआ तो उस से प्यार का इजहार न हो जाए।
निदा फाज़ली ने बॉलिवुड के लिए लिखा यह पहला गाना था; लेकिन शायर तो वे १४-१५ साल की उम्र से थे। १२ अक्टूबर १९३८ में दिल्ली में जन्मे मुक्तदा हसन ( यह उनका असली नाम था) की पढ़ाई ग्वालियर में हुई। उन्हीं दिनों वे जब एक मंदिर के पास से गुजर रहे थे तो वहां से भजन सुनाई दिया। सूरदास का वह भजन १५ साल के इस किशोर को बहुत भा गया, जिसमें राधा और गोपियों की अवस्था का वर्णन किया था जब श्रीकृष्ण गोकुल छोड़ कर उद्धव के साथ मथुरा चले गए थे। कविता में मन को छूने की कितनी ताकत होती है, इसका पता मुक्तदा हसन को हुआ। तभी से उनके मन में कविता जागी और वे शायर बन गए। पढ़ाई के बाद १९६४ में नौकरी ढूंढने वे बंबई (अब मुंबई) में आए। वहां ‘धर्मयुग’ और ‘ब्लिट्ज’ में कुछ समय तक लिखा करते थे। उनकी काव्यात्म भाषा और शायरी पर नजर पड़ी, तो फिल्मवालों ने उन्हें चुन लिया और उनका नाम होने लगा। वैसे मुशायरों का सिलसिला तो पहले से ही शुरू था और लोकप्रिय शायर बन चुके थे।
जाने माने गज़ल गायक जगजीत सिंह निदा फाज़ली की शायरी को बहुत पसंद करते थे और उनकी गज़लें-गीत महफिल में गाते थे। उनकी शोहरत बढ़ने लगी थी। निदा फाज़ली (उनका कविनाम या तखल्लुस) के सीदे-सादे शब्द समझने में श्रोताओं को आसानी होती थी। सादगी में भी गहरा अर्थ हुआ करता था। पर्शियन कल्पना मिश्रित दिखावे की भाषा से दूर रह कर अपनी शायरी के लिए आम बोलचाल की भाषा उन्हों ने इस्तेमाल की। इसका मतलब यह नहीं कि उनके काव्य का स्तर कम था। बोझिल भाषा का प्रयोग उन्होंने जानबूझकर टाल दिया था। यह शेर देखिए-
घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए….
‘रोते हुए बच्चे को हंसाना’ इन शब्दों में बहुत कुछ अर्थ समाया है। उस बच्चे को बहला कर, अगर भूखा है तो उसे खिला कर, अगर लावारिस है तो उसे अपना कर या उसको किसी तरह से अच्छी जिंदगी देकर हम वही पुण्य कमा सकते हैं, जो मस्जिद या मंदिर में ईश्वर की आराधना करके मिलेगा। इन दो पंक्तियों में जो ऊंचा विचार सीधे शब्दों में प्रकट होता है, वही शेर की कामयाबी है। एक और जगह वे लिखते हैं-
मस्जिद से बेहतर किसी नादान की खुशी है
एक बच्चे की हंसी है…
बच्चों के लिए उनका दिल काफी संवेदनशील था।
जिन चरागों को हवाओं का खौफ नहीं
उन चरागों को हवाओं से बचाया जाए…
इन चरागों को हवाओं से डर नहीं लग रहा है। क्योंकि वे अभी नादान उम्र के हैं। उन्हें हवाओं से क्या खतरा है; कि वे बुझा दिए जा सकते हैं, इसका पता ही नहीं। इसी वजह से उन्हें बचाना जरूरी है। हम देख और सुन रहे हैं कि आजकल आतंकवादियों का ध्यान भी बच्चों की तरफ गया है। अब मासूम बच्चों को ट्रेनिंग देकर उनके हाथों गुनाह कराने का इरादा आतंकियों ने स्पष्ट किया है। ऐसी स्थिति में उन चरागों को ऐसी खतरनाक हवाओं से बचाना कितना जरूरी है यह हमें समझना चाहिए। शायर ने केवल एक शेर में हमें सावधान किया है।
निदा फाज़ली हिंदुस्तानी तहजीब के पुजारी थे। बंधुता, प्रेम, निःस्वार्थता और सहिष्णुता ये हमारी संस्कृति के चार स्तंभ हैं। शायर लिखता है-
तारों में चमक फूलों में रंगत न रहेगी
कुछ भी न रहेगा जो मुहब्बत न रहेगी….
प्रेम भावना तो विश्व की सब से अहम भावना है। ‘फूलों’ की रंगत से शायर जमीन का जिक्र करते हैं; और ‘तारे’ यह बिंब है आसमान का। अगर प्रेम नहीं रहा तो जमीन से आसमां तक कुछ भी न रहेगा; इस पंक्ति में तो शायर ने पूरा विज्ञान भर दिया है। परमाणु को ही लीजिए; अगर प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन में खिंचाव, कशिश याने प्रेम न रहेगा, तो परमाणु का अस्तित्त्व ही नहीं रहेगा। विश्व की हर सजीव या अजीव चीज सिर्फ परमाणु से बनती है। तो हम समझ सकते हैं कि प्रेम ही सृष्टि का आधार है। इन्सान के बारे में सोचें तो प्रेम का बहुत बड़ा व्यापक अर्थ है। किसी ने कहा है-
दुनिया में मुहब्बत का अदना सा फसाना है
सिमटे तो दिले आशिक फैले तो जमाना है….
निदा फाज़ली ने सायन्स के तौर में वही बात कह दी है। ऐसा प्रेम दिलों में पनपे इसलिए शायर ईश्वर की करुणा मांगता है-

 गरज-बरस प्यासी धरती को, फिर पानी दे मौला…
चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड़दानी दे मौला
फिर रौशन कर जहर का प्याला, चमका नई सदी भी
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला…
फिर मंदिर से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला….
तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों है
जीनेवालों को मरने की आसानी दे मौला….

 मानव जाति के लिए संत ज्ञानेश्वर ‘पसायदान’ (वरदान/कृपा) मांगते हैं। उसी तरह निदा फाज़ली प्रार्थना करते हैं। चिड़ियों से बच्चों तक कोई भी भूखा न रहे। दूसरे शेर में जिस जहर के प्याले का निर्देश है, वह प्याला है सुकरात का या मीरा का। सुकरात लोगों को सच सिखाना चाहते थे। इसी कारण उनको हेमलॉक जैसा अति तीव्र ज़हर पीना पड़ा। मीरा अपने प्रेम और भक्ति पर अटल रही इसलिए उसने भी ज़हर का प्याला अपना लिया। ज़हर के ऐसे प्यालें फिर रौशन करना यानी सत्य और प्रेम के लिए ऐसी दृढ़ता रखने वाले लोग इस सदी में भी पैदा होने की जरूरत है, शायर यही कहता है।
ईश्वर के होते हुए मानवता के दुश्मन इन्सानों को मार रहे हैं, यह कर्म मानवता के मुंह पर कालिख़ लगाने जैसा है। ऐसी मौत किसी को न मिले। मरने की आसानी याने कुदरती मौत मिलना यह सबका हक है।
हम दुआ तो मांगते हैं; लेकिन क्या सभी को सबकुछ मिल जाता है? शायर ने लिखा है-
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता
कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता….
किसी को भी पूर्ण रूप से कुछ नहीं मिलता। कमियां तो होती ही हैं। उदाहरण के तौर पर, किसी कलाकार को देखिए। उसकी कला की प्रशंसा हुई, लेकिन उससे व्यवहारी फायदा नहीं हुआ। उसके पास रहने के लिए अच्छा घर भी नहीं है। ये तो हुआ कि ईश्वर ने कला के रूप में उसे आसमान तो दिया; लेकिन जमीन की कमी रह गई। दूसरा उदाहरण किसी ऐसे रईस का लीजिए, जिसके पास बड़ा मकान, पैसा, गाड़ी सबकुछ है पर उसे चाहनेवाला, उसका अपना कोई नहीं।
जिसे भी देखिए वो अपने आप में गुम है
जुबां मिली है मगर हमजुबां नहीं मिलता….
हमजुबां का मतलब है बोलने वाला या आपकी बात को सम्मति दर्शाने वाला। याने मित्र।
भुला सका है भला कौन वक्त के शोले
ये ऐसी आग है जिस में धुआं नहीं होता….
यहां वक्त यानी जिंदगी। जिंदगी के गम छिपाकर रखने पडते हैं। वे दिल को जलाते हैं। लेकिन गम की आग का किसी को पता ही नहीं चलता। धुआं दिखने पर लोग आग का अंदाजा लगा लेते हैं। मगर धुआं ही नहीं होगा तो लोग समझेंगे तो कैसे? इसलिए सांत्वना की गुंजाइश ही नहीं होगी। आखरी शेर है-
तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो
जहां उम्मीद हो इसकी, वहां नहीं मिलता….
ईश्वर की बनाई दुनिया में प्यार तो है ही; लेकिन जिससे प्यार की उम्मीद हम करते हैं उससे मिलेगा इस बात का भरोसा नहीं।
निदा फाज़ली ने २४ किताबें लिखीं, जिनमें हिंदी, उर्दू और गुजराती भाषा की किताबें शामिल हैं। वे एकात्मता के उद्घोषक थे। स्वतंत्रता के साथ भारत का विभाजन उन्हें मंजूर नहीं था। विभाजन के बाद उनके माता-पिता पाकिस्तान चले गए, लेकिन उन्होंने हिंदुस्तान में ही रहना पसंद किया। साम्प्रदायिक तनाव, फसाद, कट्टरवाद जैसे संकुचित विचारों की वे निंदा करते थे; इन विषयों पर लिखते रहते थे। उन्हें ‘नेशनल हार्मनी अवॉर्ड’ भी दिया गया था। १९९८ में साहित्य अकादेमी पुरस्कार, २००३ में ‘स्टार स्क्रीन अवॉर्ड’ भी दिए गए थे।
निदा फाज़ली के जाने से शायरी की दुनिया सूनी हो गई है। यह दुनिया उन्हें कभी भूल नहीं पाएगी; उनकी शायरी में उन्हें ढूंढ़ती रहेगी।

 अपनी मर्जी से कहां अपने सफर के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर है उधर के हम हैं….
वक्त के साथ है मिट्टी का सफर सदियों से
किस को मालूम कहां के हैं किधर के हम हैं?….

 मो. : ९६६५०९५६५३

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